Description
राष्ट्रबोध की पृष्ठभूमि पर लिखे गए इस विचारोत्तेजक श्रेष्ठ हिन्दी नाटक में आज से ढाई हजार साल पहले हुए तक्षशिला के आचार्य चणक, उनके पुत्र चाणक्य तथा मौर्य राजकुमार चंद्रगुप्त के जीवन चरित्रों को आधार बनाया गया है जिन्होंने मगध के शक्तिशाली नंदराज्य को नष्ट करके भारत का प्रथम राजनैतिक एकीकरण किया था। इस नाटक में राष्ट्र की प्रजा को सुखपूर्वक रहने के लिए आवश्यक तत्वों पर गंभीर चिंतन प्रस्तुत किया गया है। जब विरोधी प्रवृत्ति वाली दो संस्कृतियां एक ही राष्ट्र में निवास करें, एक दूसरे को संदेह और प्रतिस्पर्धा की दृष्टि से देखें और अपना-अपना वर्चस्व स्थापित करने के लिये राष्ट्र को क्षति पहुंचायें तो ऐसा देश सुखी नहीं रह सकता। विरोधी प्रवृत्ति वाली संस्कृतियां अनन्तकाल तक परस्पर संघर्ष करती रहेंगी जिससे राष्ट्र में सदैव क्लेश व्याप्त रहेगा और राष्ट्र- लक्ष्मी रुष्ट होकर शत्रुओं के पास चली जाएगी। भारत की आत्मा के वास्तविक दर्शन करने वाले इस महान् नाटक को भारत के प्रत्येक नागरिक को अवश्य पढ़ना चाहिए।




