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देखे हुए दिन (कश्मीर में आतंकवाद पर लिखी गई एक विचारोत्तेजक कहानी)

देखे हुए दिन/ कहानी/डॉ. मोहनलाल गुप्ता

लकड़ी की सीढ़ियाँ फिर बज रही हैं। खट, खट, खट…। कोई ऊपर आ रहा है। मैं प्रिया को हिलाता हूँ, ‘अब क्या है?’ वह नींद खराब कर देने का उलाहना देती है।
‘उठकर बैठ जाओ।’ मैं फुसफुसाता हूँ।

‘क्या फिर कोई आतंकवादी…’ वह मजाक सा बनाती है।

‘भगवान के लिये चुप हो जाओ’ भय के कारण ठण्डी होती मेरी पसलियाँ प्रिया की मूर्खता से भभक उठती हैं।

मैं क्रोध और भय के आवेश में पूरी शक्ति लगाकर अपनी हथेली उसके मुँह पर रख देता हूँ।

यह तीसरी बार है। पहले भी दो बार कोई ऊपर आया था किन्तु गलियारे के उस मोड़ से ही वापस लौट गया था। इस बार भी वहीं पहुँच कर आवाज बन्द हो गई है। शायद कोई जीने की आखिरी सीढ़ी पर खड़ा होकर सोच रहा है कि अब क्या करना चाहिये। मैं कुर्सी का हत्था लेकर दरवाजे के पास जा खड़ा होता हूँ।

‘लकड़ी के इस टुकड़े से करोगे तुम हमारी रक्षा?’ वह धीमे से हँसती है।

कैसी औरत है यह? भय नहीं लगता इसे? अभी कोई आतंकवादी रायफल लिये दरवाजा तोड़कर कमरे में आ घुसेगा। सबसे पहले मुझे मारेगा। फिर कनु को और उसके बाद…। नहीं-नहीं इसे नहीं मारेगा। ऐसी गोरी, चमड़ी की औरत और कहाँ मिलेगी उन्हें? बिल्कुल कश्मीरी लगती है। वे इसे मारेंगे नहीं। उठाकर ले जायेंगे। और बारी-बारी से…। मैं पसीने से नहा उठता हूँ। क्या यह तब भी यूँ ही हँसती रहेगी?

नहीं-नहीं, मैं इसे उनके हाथ नहीं पड़ने दूँगा। मरने से पहले इसे तो मार ही दूँगा। मैं हाथ के डण्डे को तोलता हूँ। कहाँ मारना ठीक रहेगा। सिर में ही मारूँगा। एक ही चोट में लुढ़क जायेगी। लेकिन मैं इसे क्यों मारूँ? जब यही मेरी मौत का कारण बनेगी तो मैं क्यों इसके बारे में सोचूँ? ले जायें वे इसे उठाकर और नोच खायें इसके शरीर
को…। मैं आवेश में जाने क्या-क्या सोच जाता हूँ।

आवाज फिर शुरू हो गई है। मैं हाथ का डण्डा कसकर पकड़ लेता हूँ। आवाज की दिशा मुड़ गई है। खट, खट, खट…। कोई ऊपर की तरफ जा रहा है। मेरी साँस लौट आती है। देह ढीली पड़ जाती है। मैं ‘हे भगवान।’ कहकर निढाल सा बिस्तर पर गिर जाता हूँ। बुरी तरह से हाँफने लगा हूँ मानो कई मील दौड़ कर आया हूँ।

प्रिया उठकर बत्ती जलाती है। उसके गाउन के हुक खुले हुए हैं। शायद कनु को दूध पिलाते-पिलाते ही आँख लग गई थी उसकी। मेरा गुस्सा फिर सिर उठाता है। मैं वहाँ दरवाजे पर मौत से जूझने के लिये खड़ा था और यह आराम से हुक खोले हुए उनकी प्रतीक्षा कर रही थी कि आओ मैं तुम्हारे लिये ही बैठी हूँ। इस आदमी से पेट भर गया मेरा। पता नहीं क्यों यह ऐसा कर रही है? इससे पहले इसने ऐसा व्यवहार कभी नहीं किया। क्या सचमुच ही यह मुझे मरवा डालना चाहती है?

वह कनु का कम्बल ठीक करती है और गाउन के बटन लगाती हुई बाथरूम में घुस जाती है। ‘खूबसूरत नागिन।’ मैं बड़बड़ाता हूँ। पता नहीं क्यों मुझे सबसे ज्यादा गुस्सा उसी पर आ रहा है। इससे पहले मुझे उस पर कभी गुस्सा नहीं आया। सदैव उसके प्यार में अभिभूत सा ही रहा हूँ। उसके रंग-रूप, हाव, भाव, उठने, बैठने, बोलने और चलने का ढंग, उसकी एक-एक चीज पर तो फिदा रहा हूँ। यहाँ तक कि उसकी समझ पर भी नाज रहा है मुझे। कनु के होने से पहले भी रात में वह गाउन  के हुक बन्द किये बिना सो जाती थी।

कई बार बाथरूम के लिए उठने पर मैंने हुक बन्द किये हैं। कनु के होने के बाद तो अक्सर ही वह दूध पिलाते-पिलाते सो जाती है। कभी इस तरह गुस्सा नहीं आया मुझे उस पर। बल्कि नींद में बेखबर उसकी देह को देखना अच्छा लगता है मुझे। किन्तु आज उसकी एक-एक बात जहर का काम कर रही है। वह बोलती है तो लगता है पसलियों में नश्तर घुसा रही है। ऐसा क्यों कर रही है यह? या मैं ही डर और गुस्से से अपनी बुद्धि से नियन्त्रण खो बैठा हूँ।

‘धड़ाक’

मैं उछल पड़ता हूँ। नीचे कहीं गोली चली है। कुछ लोगों के तेजी से दौड़ने की आवाज आती है।

‘यू रास्कल।’ सन्नाटे को चीरती हुई किसी फौजी अफसर की आवाज पूरे चौक में फैल गई है। फिर एक साथ गोलियों की बौछार सी हुई है। कई जोड़ी जूते फिर से तेजी से दौड़ते हुए सुनाई देते हैं। मैं वैसे ही पड़ा रहता हूँ। मिलिट्री के होने का अनुमान कर कुछ राहत सी होती है। प्रिया बाथरूम से निकल आई है। इस बार उसके चेहरे पर तनाव है।

‘शायद गोली चली है कहीं…?’

‘तुम बत्ती बन्द कर दो…’ मैं बोलता नहीं हूँ, सिर्फ बत्ती की तरफ संकेत करता हूँ।

‘नहीं, बत्ती जली रहने दो, अन्धेरे में डर लगेगा।’

तो अब गोलियों की आवाज सुनकर इसे लगा है कि डरने की कुछ बात है।

‘कमरे में उजाला होगा तो वे हमें बाहर किसी सुराख से देख सकते हैं कि हम डरे हुए हैं। अँधेरे में हम अपनी सुरक्षा बेहतर कर सकते हैं।’ मैं उसके कान में फुसफुसाता हूँ और बत्ती बन्द कर देता हूँ।

इस समय ढाई बजे हैं। पहली बस सुबह पाँच बजे है। दो घण्टे होटल में किसी तरह और बिताने हैं। लेकिन उसके बाद… होटल से बस स्टेण्ड तक किस तरह जायेंगे?

शायद चौक में तो कर्फ्यू लग गया होगा। तब की तब देखी जायेगी। पहले तो वर्तमान से निबटना है। सुबह पाँच बजे तक जिन्दा बचे, तभी तो बस स्टेण्ड जाने की जरूरत पड़ेगी।

ठण्ड पूरे जोर पर है। अगस्त में भी अच्छी खासी ठण्ड है श्रीनगर में। मैं कम्बल को गर्दन तक खींच लेता हूँ। हालाँकि मेरी बनियान पसीने से पूरी तरह भीग गई है। प्रिया मुझसे सट जाती है। बीच में दब जाने के कारण कनु कुनमुनाता है। मैं पीछे खिसक कर उसके लिये जगह बनाता हूँ। प्रिया उसे थपकी देती है।

यदि यह रो पड़ा तो कोई न कोई आतंकवादी जरूर आ धमकेगा। अभी तो शायद वे अपनी उधेड़बुन में हैं किन्तु कनु की आवाज सुनकर उन्हें हमारा ध्यान आ जायेगा। कनु हाथ-पाँव फेंकने लगता है। मैं कम्बल के अन्दर ही हाथ लगाकर इशारा करता हूँ, प्रिया उसे दूध से लगा लेती है। दूध पीकर कनु सो गया है। मैं उसे दूसरी तरफ सरका कर प्रिया को खींच लेता हूँ।

‘क्या कर रहे हो?’ मेरी उँगलियों को गाउन के बटन टटोलते जानकर प्रिया चौंकी।

‘कुछ नहीं।’ मैं सारे बटन खोल देता हूँ।

‘कोई आ गया तो।’

‘इसीलिए तो यह सब कर रहा हूँ, कि कोई आ जायेगा।’

‘क्या मतलब?’

‘कोई आ गया तो वैसे भी जिन्दा नहीं छोड़ेगा। मरने से पहले कम से कम एक बार…’ बात अधूरी छोड़कर मैं उसकी देह को अपने शरीर में कस लेता हूँ।

‘कमाल के आदमी हो तुम, मौत के बीच ये सब… नीचे गोलियाँ चल रही हैं।’

‘शायद किसी गोली पर हमारा भी नाम लिखा हो।’ मैं हरकत में आ जाता हूँ।

‘तुम्हारी सब बातें उल्टी होती हैं।’ कहकर वह भी सहयोग की मुद्रा में आ गई है।

शादी के बाद के पिछले दो सालों में जाने कितनी बार यह सब हुआ है किन्तु धमनियों में इतना तनाव इससे पहले कभी अनुभव नहीं किया मैंने। कौन जाने यह सचमुच ही आखिरी बार हो। वह भी हमेशा की तरह व्यवहार नहीं कर रही है, भूखी शेरनी सी टूट पड़ी है।

अगस्त में मौसम भी अच्छा रहता है और भीड़ भी अधिक नहीं होती, यही सोचकर मैंने अपने सहकर्मी गोयल साहब और पड़ोसी प्रमोद जी के साथ वैष्णो देवी का कार्यक्रम बना लिया था। किन्तु ऐन वक्त पर प्रमोद जी को पथरी का दर्द हो गया और गोयल साहब हमेशा की तरह अपनी पत्नी का मूड ठीक नहीं कर सके। छुट्टियाँ बड़ी मुश्किल से मिलती हैं, यह सोचकर मैंने अपना कार्यक्रम यथावत रखा। प्रिया तो वैसे भी घूमने का कोई अवसर हाथ से नहीं जाने देती।

वैष्णो देवी तक आये हैं तो श्रीनगर कौनसा दूर रह जाता है यहाँ से। कुल सात-आठ घण्टों की ही तो बात है। इस बहाने शेखावतजी से भी मिलना हो जायेगा। चार-पाँच साल हो गये उनसे मिले हुए। अचानक पहुँच कर उन्हें सरप्राइज देंगे। यह सोचकर श्रीनगर का भी कार्यक्रम बना लिया। शेखावतजी मेरे सहपाठी रहे हैं और आजकल एम. ई. एस. में गैरीसन इंजीनियर हैं। पिछले एक साल से श्रीनगर में हैं। इससे पहले देहरादून थे, तब भी बुलाते रहते थे किन्तु हमारा जाना नहीं हो पाया था।

शाम लगभग चार बजे श्रीनगर पहुँचे। ढूँढ़ते-ढूँढ़ते शेखावतजी के घर पहुँचे तो ताला लगा हुआ था। पड़ोसियों ने बताया कि वे आज सुबह ही उदयपुर गये हैं। मैंने अगली बस पकड़ कर जम्मू लौटने का सुझाव दिया किन्तु प्रिया ने कहा कि अब आये ही हैं, तो श्रीनगर घूम ही लेना चाहिये। फिर पता नहीं कब आना हो। वैसे भी कनु लम्बी यात्रा से ढीला सा हो चला था और रात में उसे आराम की आवश्यकता थी।

इधर-उधर पता किया तो मालूम हुआ कि शहर की स्थिति नाजुक है और किसी भी समय कर्फ्यू लग सकता है। बटवाड़ा में कन्टोनमेंट के सामने तीन बजे ही फायरिंग हो चुकी है। बेहतर यह है कि जितनी जल्दी हो श्रीनगर छोड़ दें। लेकिन इस पूछ-ताछ में आखिरी बस निकल गई और पहली बस सुबह पाँच बजे थी। अतः होटल में शरण लेने के अतिरिक्त कोई चारा नहीं था।

सुबह तक कर्फ्यू लग गया तो बस स्टेण्ड तक पहुँचना कठिन हो जायेगा, यह सोचकर लाल चौक में ही ठहरे। होटल से नीचे उतरते ही बस स्टेण्ड है। किन्तु एक मुसीबत खड़ी हो गई। लाल चौक पर हिन्दुओं का कोई होटल नहीं मिला। सारे होटल मुसलमानों के हैं, यह जानकर मेरे पैरों के नीचे से जमीन खिसक गई। पता नहीं कौन आतंकवादी से मिला हो या किस होटल में आतंकवादी डेरा डाले पड़े हों। पर्यटकों के नाम पर मुझे केवल मैं और प्रिया ही दिखाई पड़े। पूरे चौक में नीरव शान्ति छाई हुई थी।

हमने पूरा चौक छान मारा, चारों तरफ कई-कई मंजिले होटल हैं किन्तु हिन्दुओं का एक भी होटल नहीं मिला। किसी ने एक हिन्दू धर्मशाला के बारे में बताया तो जान में जान आई।

धर्मशाला में घुसते ही चक्कर आ गया। बेहद गन्दी, उजड़ी हुई और मनहूस सी थी वह। कमरे यात्रियों के ठहरने के लिये नहीं बल्कि कैदियों के लिये यातनागृह बनाये गये प्रतीत होते थे। जैसी धर्मशाला थी वैसा ही उसका मैनेजर निकला। गन्दे-चौखटे कपड़ों में लिपटा। चेचक के दागों ने उसकी भयावहता में कोई कमी नहीं छोड़ी थी। प्रिया को देखते ही लपक कर केबिन से बाहर आ गया। उसकी आँखों से लगता था कि उसने इससे पहले कोई स्त्री नहीं देखी। उसका बस चलता तो आँखों से ही प्रिया को निगल जाता।

तेजी से दाँत चलाता हुआ वह पान चबाता जाता था और घूम-घूम कर हमें कमरे दिखाता जाता था। हर कमरे के सामने पहुँच कर कहता – ‘यह कमरा ठीक रहेगा आपके लिये और बहिनजी को तो इसमें कोई दिक्कत होगी ही नहीं।’

किसी न किसी बहाने से वह प्रिया को छू लेता। कभी पीछे घूमकर उससे टकरा जाता। एक बार तो उसने प्रिया के कन्धे पर हाथ रख दिया। मुझे उसके बजय प्रिया पर गुस्सा आ रहा था। कैसी मूर्ख है यह। आदमी की नीयत को जरा भी नहीं पहचानती।

कैसे हँस-हँस कर बातें कर रही थी उससे। कहाँ के रहने वाले हो? यहाँ कब आये? तुम अपनी धर्मशाला साफ क्यों नहीं रखते… वगैरा-वगैरा।

मैं प्रिया का हाथ पकड़ कर लगभग घसीटते हुए उसे धर्मशाला से बाहर ले आया।

‘नहीं, यहाँ नहीं। कोई और जगह देखेंगे।’

‘बाकी सब तरफ मुसलमान हैं बाबूजी। हिन्दुओं की तो यही बस एक धर्मशाला है। यहाँ बहिनजी की सुरक्षा रहेगी।’

‘बहिनजी की सुरक्षा की सारी जिम्मेदारी तुमने ले ली है क्या?’ मैंने चिढ़कर जवाब दिया और रिक्शा वाले को आगे बढ़ने का संकेत किया।

काफी दूर तक उसकी आँखें मुझे प्रिया की नंगी पीठ पर चिपकी हुई जान पड़ी। ये औरतें भी बस। कैसे-कैसे कपड़े पहनती हैं। मैं मन-ही-मन खीझ उठा।

आदमियों की तरह गले तक कॉलर वाली शर्ट्स और एड़ियों तक मोहरी वाली पेन्ट नहीं पहन सकती। कहीं से गला चमकायेंगी तो कहीं से पीठ। कोई नाभि तक पेट दिखायेगी तो कोई स्लीव लैस के नाम पर ऐसा ब्लाउज पहनेगी कि बगल में से होकर सब-कुछ दिखता रहे। इनसे तो देहात की स्त्रियाँ कितनी अच्छी हैं? शरीर की कहीं कोई प्रदर्शनी नहीं। सब कुछ मर्यादा में दब-ढंक कर।

‘ढंग से ओढ़ो शॉल को।’ मैंने सख्त किन्तु धीमे स्वर में कहा ताकि रिक्शावाला नहीं सुने।

‘ठीक ही तो है।’

कैसी मूर्खा है यह! मेरी खीझ बढ़ गई। अवसर की नज़ाकत नहीं समझती।

‘कनु को ठण्ड लग जायेगी, पीठ से घुमाकर ओढ़ो शॉल को।’ मुझे अब भी धर्मशाला के मैनेजर की आँखें प्रिया की पीठ पर चिपकी हुई जान पड़ती। शॉल ठीक करने के बहाने मैंने उसकी पीठ पर नीचे तक हाथ फेर दिया।

‘क्या कर रहे हो?’ वह चिहुँक पड़ी।

इसे हनीमून की ठिठोली सूझ रही है। मैंने गुस्से से जवाब नहीं दिया। रिक्शेवाले ने पीछे मुड़कर देखा।

‘सामने देखकर चलाओ रिक्शा।’ मैं लगभग चीख पड़ा।

रिक्शेवाला मुस्कराया किन्तु बोला कुछ नहीं।

‘यह होटल ठीक है। बस स्टेण्ड के भी पास है और यहाँ खतरे वाली कोई बात नहीं।’ रिक्शेवाला एक होटल के सामने रुक गया। ‘कहीं फँसा तो नहीं रहा यह?’ मैंने शंका की दृष्टि से देखा उसे।

होटल का मालिक बेहद रुखा और ठण्डा प्रतीत हुआ। उसके चेहरे पर ऐसे भाव थे मानो ग्राहक को देखकर कोई प्रसन्नता नहीं हुई उसे। बस स्टेण्ड की नज़दीकी और होटल की साफ-सफाई को देखकर मैंने इसी होटल में ठहरना तय कर लिया। आखिर कहीं न कहीं तो ठहरना ही था।

पता नहीं क्यों पिताजी की नसीहत याद नहीं आई मुझे उस समय। वे हमेशा कहा करते हैं कि आपत्ति के समय रेलवे स्टेशन सबसे ज्यादा सुरक्षित होता है। वहाँ सरकारी आदमी होते हैं। जरूरत पड़ने पर पुलिस नहीं तो कम से कम रेलवे के सुरक्षा कर्मी तो होते ही हैं। यदि कभी ऐसी स्थिति आ जाये तो रेलवे स्टेशन पर ठहरना चाहिये। किन्तु तनाव और भय से मेरी बुद्धि ने बिल्कुल ही काम करना बन्द कर दिया था।

‘यहाँ होटल में बैठे-बैठे तो ब्लड प्रेशर बढ़ता रहेगा तुम्हारा। चलो कहीं घूम आयें।’ कुछ देर सुस्ताने के बाद प्रिया ने प्रस्ताव रखा तो मुझे ठीक ही लगा। दिन अभी बाकी था। एक तो बाहर निकलने से शहर के हालात भी मालूम पड़ेंगे और दूसरे शायद कोई अपरिचित ही मिल जाये।

‘डल’ भी मुश्किल से घूम पाये। असुरक्षा की भावना इस कदर अन्दर तक बैठ गई थी कि जरा सा अन्धेरा होते ही मुझे बाहर रहना ठीक नहीं लगा। प्रिया ने कहा भी कि इतने सारे लोग तो हैं यहाँ पर। खाना खाकर चलते हैं, वहाँ न जाने कैसा मिले। किन्तु मैं जल्दी से जल्दी लाल चौक पहुँचना चाहता था इसलिए मैंने भोजन अपने होटल
में करना ही ठीक समझा।

होटल में जब डाइनिंग हॉल में जाने लगे तो मैंने कनु के लिये खरीदी गई खिलौना पिस्तौल शर्ट के नीचे पेट में खोंस ली।

‘क्या कर रहे हो यह?’ हँसी के मारे प्रिया पेट पकड़ कर दोहरी हो गई।

‘चुप रहो तुम?’ मैं दाँत पीच कर रह गया।

‘इससे मुकाबला करोगे ए.के. सैंतालीस का?’

‘धीरे बोलो कोई सुन लेगा।’ मैं चाहता था कि वह चुप रहे किन्तु वह लगातार बोले जा रही थी।

‘इतना क्यों घबरा रहे हो?’

‘क्योंकि मैं तुम्हारी तरह महाराणा प्रताप के खानदान में पैदा नहीं हुआ।’

‘इसी कारण खिलौने से मन को दिलासा देना चाहते हो कि मैंने बीवी की सुरक्षा में कोई कमी नहीं छोड़ी।’

‘मैं क्या करना चाहता हूँ और क्या नहीं, यह मुझ पर छोड़ दो और भगवान के लिये कल सुबह तक अपना मुँह बन्द रखो। सुबह बस में बैठने के बाद जो तुम्हारी मर्जी आये बकना। मैं तुम्हें नहीं रोकूँगा।’

‘अच्छा बाबा चलो। बहुत भूख लग रही है।’

डाइनिंग हॉल में ज्यादा भीड़ नहीं थी फिर भी भरा-भरा सा लग रहा था। पूरे हॉल में आदमी ही थे, औरत एक भी नहीं। पता नहीं कैसे अजीब से लग रहे थे सब। इनमें कम से कम आधे लोग तो उग्रवादी होंगे ही। मैंने मन में सोचा। किन्तु आधे क्यों? सारे ही आतंकवादी होंगे। आतंकवादियों के बीच में शरीफ, लोग आकर थोड़े ही बैठेंगे।

कितनी ही नज़रें हमें घूर रही थीं। मैंने प्रिया को देखा, वह मेनू पढ़ने में व्यस्त थी। सारी भूख उसे आज ही लग आई थी। शायद जानबूझ कर यह अपने कपड़ों का ध्यान नहीं रख रही। मैंने उसे शॉल ठीक से ओढ़ने का संकेत किया तो उसने मुस्कुराकर गर्दन झटका और शॉल ठीक से लपेट लिया। किसे रिझाने के लिये अदा मार रही है।
मैं खीझ पड़ा।

जैसे-तैसे खाना खत्म करके ऊपर कमरे में आये। आखिरी सीढ़ी तक लोगों की नज़रें हमारा पीछा करती रहीं।

कमरे में सुरक्षा का कोई साधन नहीं था। रात में आतंकवादियों ने आकर गोली मार दिया तो? सब को मालूम तो है ही कि इस कमरे में एक आदमी अपनी खूबसूरत और जवान बीवी के साथ ठहरा हुआ हूँ। उस घड़ी को कोस रहा था, जिसमें श्रीनगर आने का निर्णय लिया था। सौभाग्य से एक कुर्सी का हत्था उखड़ा हुआ था, मैंने उसी को अपना हथियार मान लिया। खट, खट, खट…। ऊपर की सीढ़ियों पर से किसी के नीचे उतरने की आवाज़ आ रही है। मैं फिर संभल कर बैठ जाता हूँ। हाथ के डण्डे पर कसाव बढ़ा देता हूँ। सीढ़ियाँ खत्म कर आवाज़ गलियारे में हमारे कमरे की ओर ही मुड़ गई है।

लकड़ी का गलियारा रात की खामोशी में बड़ी मनहूस आवाज़ कर रहा है। कितने आदमी होंगे? मैं अन्दाज़ लगाने का प्रयास करता हूँ। शायद एक ही है। एक से तो मैं फिर भी निबट लूँगा। शायद होटल वाला ही हो। पैरों की आवाज़ हमारे दरवाजे के सामने आकर रुक गई है।

मेरे मस्तिष्क में खून तेजी से चक्कर लगाने लगा है। प्रिया ने सहम कर कनु को छाती से चिपका लिया है। ‘इसे पलंग के नीचे सुला दो और तुम जाकर बाथरूम को अन्दर से बन्द कर लो। मैं इसे यहाँ संभालता हूँ।’

नाइट लैम्प के लाल प्रकाश में प्रिया भय से काँपती हुई साफ दिखाई देती है। ‘जल्दी करो।’ कहकर मैं बिल्ली की तरह छलांग लगाकर दरवाजे के पीछे खड़ा हो जाता हूँ। मेरे हाथों में न जाने कहाँ से ताकत आ गई है। शायद प्रिया को काँपते हुए देखकर। मैं शायद प्रिया को इस स्थिति में बहुत पहले देखना चाहता था। अब कहीं
जाकर यह सही पोज में आई है।

मुसीबत जितनी दूर हो, आदमी उससे उतना ही ज्यादा डरता है। किन्तु वह जब ठीक सिर पर आ धमके तो आदमी भी उससे जूझ-मरने के लिये तैयार हो जाता है। शायद इसीलिये कहा जाता है कि आपत्काल में सब नियम बदल जाते हैं।

प्रिया जल्दी से कनु को पलंग से नीचे छिपा देती है। दरवाजे पर किसी ने थपकी दी है। मेरी साँस थमकर दरवाजा टूटने की प्रतीक्षा करने लगी है। प्रिया सहम कर मेरी ओर देखती है। कौन जाने यह आखिरी बार का देखना हो। मैं डण्डे से बाथरूम की ओर संकेत करता हूँ। कमरे पर फिर किसी ने थपकी दी है। ‘साहब साढ़े चार बज गये। उठ
जाइये आपकी बस का समय हो रहा है।’

मेरी साँस लौट आती है। यह तो होटल वाले की आवाज है। ‘हाँ हम उठ गये हैं।’ मैं जल्दी से जवाब देता हूँ।

‘आप तैयार होकर नीचे आ जाइये। मैं आपको बस स्टेण्ड तक छोड़ दूँगा।’ भारी कदम रखता हुआ वह लौट जाता है।

मैं घड़ी देखता हूँ। सचमुच ही साढ़े चार बज रहे हैं। शायद आँख लग गई थी। प्रिया दौड़कर मुझसे लिपट जाती है। लकड़ी का फर्श जोर से बज उठता है। पलंग के नीचे कनु जागकर रोने लगा है।

जल्दी-जल्दी तैयार होकर हम नीचे पहुँचते हैं। होटल वाला बिल लिये बैठा है। मैं भुगतान करता हूँ। वह सूटकेस उठा लेता है। ‘चलिए आपको बस स्टेण्ड तक छोड़ आऊँ। इस समय रिक्शा तो मिलेगा नहीं। वैसे भी चौक में कर्फ्यू लग गया है।’ मैं कृतज्ञता से अवाक् रह जाता हूँ।

बाहर निकलते ही मिलिट्री के दो जवानों ने रोक लिया। ‘वहीं रुक जाओ, वरना गोली मार दूँगा।’ एक ने कड़क कर कहा। चौक के सोडियम लैम्प का उजाला यद्यपि कोहरे के कारण जमीन तक नहीं पहुँच पा रहा फिर भी मुझे उनकी स्टेनगनें हमारी ओर तनी हुई साफ दिखाई देती हैं। होटल वाला उन्हें समझाता है। मिलिट्री के जवान हमारे
साथ हो लेते हैं।

जम्मू की बस तैयार खड़ी है। एक भी मिनट की देरी हो जाती तो हम बस चूक जाते। कण्डक्टर प्रिया को बस में चढ़ने में मदद करता है। मैं होटल वाले से सूटकेस लेता हूँ और बस में चढ़ जाता हूँ। झटके के साथ बस चल पड़ती है।

‘ईश्वर तुम्हारा भला करे।’ मैं गर्दन खिड़की से बाहर निकाल कर चिल्ला उठता हूँ। मेरी आवाज बस की घुर-घुर को चीरकर दूर तक फैल जाती है। सारे यात्री चौंक कर मेरी ओर देखते हैं और मैं कोहरे में ढके सोडियम लैम्प के उजाले में निःशब्द खड़े होटल मालिक और मिलिट्री के जवानों को देखता रहता हूँ जो मोड़ आते ही आँखों से ओझल हो गये। पता नहीं मेरी आवाज उन तक पहुँची भी होगी या नहीं।

कहानी संग्रह ‘ देखे हुए दिन ’ की पहली कहानी

इस कहानी के लेखक डॉ. मोहन लाल गुप्ता राजस्थान साहित्य अकादमी की सरस्वती सभा के सदस्य रहे हैं।

देखे हुए दिन कहानी की विस्तृत समीक्षा

डॉ. मोहनलाल गुप्ता की कहानी ‘ देखे हुए दिन ’ उनके इसी नाम के कहानी संग्रह की आधारशिला है। यह कहानी केवल स्मृतियों का दस्तावेज़ नहीं है, बल्कि बदलते समय, टूटते मूल्यों और आधुनिकता की अंधी दौड़ में पीछे छूटते मानवीय संवेदनाओं का एक मार्मिक चित्रण है। यहाँ इस कहानी की विस्तृत समीक्षा प्रस्तुत है:


1. कथानक और विषय-वस्तु

यह कहानी वर्ष 1986 में लिखी गई थी, जब काश्मीर में आतंकवाद अपने चरम पर था। पूरी घाटी बंदूक की गोलियों से गूंज रही थी। ऐसे में एक दम्पत्ति अपने एक साल छोटे बच्चे के साथ लाल चौक पहुंचता है और उसे कर्फ्यू के साए में एक होटल में रात गुजारनी पड़ती है।

2. परिवेश और वातावरण चित्रण

रात में जब लाल चौक पर पर गोलियां चलती हैं तो होटल में ठहरा हुआ दम्पत्ति भयभीत हो जाता है। इस कहानी में मुख्यतः उस भय का ही चित्रण किया गया है। कहानी का घटनाक्रम इस प्रकार गूंथा गया है कि घटनाएं आंखों के सामने घटती हुई दिखाई देती हैं।

3. चरित्र चित्रण और संवेदना

कहानी के पात्र किसी काल्पनिक लोक के नहीं, बल्कि हमारे आस-पास के ही लगते हैं। मुख्य पात्र (कथावाचक) की व्याकुलता उस हर व्यक्ति की व्याकुलता है जो अपनी जड़ों से कट गया है। पात्रों के माध्यम से यह संदेश मिलता है कि भौतिक सुख-सुविधाओं ने मनुष्य को समृद्ध तो बनाया है, लेकिन उसकी आंतरिक शांति और संतोष को छीन लिया है।

4. भाषा-शैली

डॉ. मोहनलाल गुप्ता की भाषा सहज, प्रवाहमयी और बिंबात्मक है। उन्होंने तत्सम शब्दों के साथ-साथ आंचलिक शब्दावली का भी सुंदर प्रयोग किया है, जिससे कहानी में मिट्टी की सोंधी खुशबू बनी रहती है। छोटे-छोटे वाक्य और आत्मीय संवाद शैली पाठक को सीधे कथा से जोड़ लेते हैं।


निष्कर्ष

देखे हुए दिन भारत की आजादी के बाद काश्मीर घाटी में पाकिस्तान समर्थित आतंकवाद का कच्चा चिट्ठा खोलती है तथा बताती है कि कश्मीर का आम मुसलमान किस प्रकार रोजी-रोटी की चाह में शांति चाहता है किंतु कट्टरपंथियों ने पूरी घाटी को भय, आतंक और रक्त से सान दिया है।

“बीता हुआ समय कभी वापस नहीं आता, लेकिन स्मृतियाँ वह पुल हैं जो हमें हमारे अस्तित्व की पहचान कराती रहती हैं।”

यह कहानी अपनी संवेगात्मक गहराई और सामाजिक सरोकारों के कारण हिंदी कहानी साहित्य में एक विशिष्ट स्थान रखती है।

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