ऑपरेशन/हिन्दी कहानी/डॉ. मोहनलाल गुप्ता
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आज वह फिर थक गयी है। थक तो वह रोज ही जाती है। इतना ही नहीं वह दिन में दस-दस बार थक जाती है। कितनी बार चाहा है उसने वह न थके किन्तु चाहने से ही सब थोड़े ही हो जाता है। रह रहकर थकना और उस अनचाही थकान को जीना, जैसे उसकी नियति बन गयी है।
कभी-कभी तो उसे लगता है वह सदा-सदा के लिये स्थाई रूप से थक गई है, जैसे पेन से स्याही झटक देते हैं, लगभग उसी मुद्रा में थकान झटक देने के लिये उसने सिर हिलाया तो दृष्टि खिड़की से बाहर निकलकर नीचे के फ्लोर पर खुले सामने के कॉरीडोर में जा गिरी। उसने चाहा कि दृष्टि को उठाकर जल्दी से अपनी आंखें खिड़की से हटा ले किन्तु वह जिद्दी बच्चे की तरह वहीं पसर गई।
कॉरीडोर की तरफ वह कभी नहीं देखना चाहती इसलिये खिड़की को सदा बंद ही रखती है किन्तु इस खब्ती वर्दी पर रखी सफेद टोपी वाले का क्या करे ? जाने क्यों इसे बार-बार खोल जाता है।
वह मना करती है तो पीले दांत निकालकर कहता है – खिड़की तो खुली ही रहनी चाहिये। मेम साब। खिड़की बनती ही इसलिये है कि उसे खोला जाये। नहीं तो यहाँ दीवार ही बना देते। एक बात बताऊं मेम साब जिसके कमरे की खिड़की खुली रहती है उसके दिल की खिड़की खुली रहती है। और जिसके दिल की खिड़की खुली रहती है उसकी तकदीर की खिड़की खुली रहती है।
बात पूरी करते-करते उसकी आंखें पूरी तरह चौड़ा जाती है मानों उसने अपनी आंखों को खिड़की समझकर पूरा-पूरा खोल दिया हो। ये आदमी जिसे चपरासी कहना चाहिये, पूरा दफ्तर चतुर्थ श्रेणी अधिकारी और कोई-कोई तो सिर्फ अधिकारी या अफसरजी कहकर बुलाता है, पता नहीं इस एक बात को कितनी बार कह चुका है।
उसने कॉरीडोर में पड़ी दृष्टि को एक बार फिर से उठाना चाहा किन्तु वह जिद्दी बच्चे की तरह ही उठकर कॉरीडोर में बने आखिरी दरवाजे के बाहर लगी पीतल की चमचमाती प्लेट पर जा बैठी। पीतल की प्लेट के अक्षर तो उसे यहाँ से दिखाई नहीं देते किन्तु फिर भी वह मन ही मन…दुहराती है “एस. पॉल”। पहले तो नाम दुहराते हुए शरीर में सिहरन सी दौड़ जाती थी अब कुछ भी नहीं होता।
ऐसे कई दरवाजे कॉरीडोर के इस छोर से उस छोर तक बने हैं जिनके पीछे मिस्टर पॉल जैसे कई अन्य मिस्टर बैठते हैं। सारे दरवाजे कभी कभार को छोड़कर लगभग यूँ ही बंद रहते हैं हर दरवाजे के बाहर पीतल की चमचमाती प्लेट लगी है।
वैसे तो हर प्लेट पर अलग-अलग नाम लिखे हैं किन्तु उसके लिये उस हर एक नाम का एक ही अर्थ है – बॉस ! इसी कारण कई बार वह मिस्टर रॉय के बुलाने पर मिस्टर दयाल के कमरे में और मिस्टर दयाल के बुलाने पर मिस्टर पॉल के कमरे में चली जाती है।
जब भी वह इस तरह की गलती करती है, कभी कोई उसे यह नहीं कहता कि उसने उसे नहीं बुलाया। हर बार हर व्यक्ति इस तरह बात करता है जैसे उसी ने उसे बुलाया हो। कई बार तो वह सही कमरे में पहुँच कर भी यही सोचती रहती है कि वह कौनसे कमरे में घुस आयी है। सामने बैठा व्यक्ति कौन है – मिस्टर पॉल, मिस्टर रॉय या फिर मिस्टर दयाल।
उसे याद है पहला दिन, जब उसने लेखाधिकारी के पद पर इस एडवरटाईजिंग कम्पनी में जॉइन किया था। रामेश्वर बाबू ने पूरे स्टाफ से उसका परिचय करवाया था। रामेश्वर बाबू यहाँ हेडक्लर्क हैं। परिचय क्या था, एक तरह की मूक यातना थी। छोटी बड़ी अनगढ़ मूर्तियों के सामने एक असहाय व्यक्ति की कराह।
प्रत्येक कमरे में एक अपरिचित चेहरा कुर्सी से ऊपर निकला हुआ था। उनमें से कोई मेज पर झुका हुआ था तो कोई फोन पर। आगे-आगे रामेश्वर बाबू मिठाई का डिब्बा लेकर घूमते और उनके पीछे छिप जाने का व्यर्थ सा प्रयास करती हुई वह हाथ जोड़कर खड़ी हो जाती। सबसे पहले मिस्टर पॉल से परिचय हुआ।
‘सर ये है मिस शर्मा। हमारी नई ए.ओ.’ रामेश्वर बाबू ने मिठाई का डिब्बा आगे बढ़ाया।
मिस्टर पॉल ने एक टुकड़ा उठा लिया और खड़े होकर बोले – ‘आईये मिस शर्मा। हमारे कार्यालय में आपका स्वागत है।’ और उन्होंने बड़े अनौपचारिक भाव से मिठाई का टुकड़ा उसके मुंह की तरफ बढ़ा दिया। मिस्टर पॉल के इस व्यवहार पर वह भौचक्की रह गई।
“सर आप खाईये।”
‘आप नहीं खायेंगी तो हम कैसे खायें ? क्यों रामेश्वर बाबू ?’ पॉल ने मिठाई उसे मुंह में लगभग ठूंस ही दी। उसे लगा कि मिस्टर पॉल के हाथ में कुछ लिपिस्टिक चिपक गई है।
‘आप ठीक कहते हैं साहब। रामेश्वर बाबू ने मिस्टर पॉल का समर्थन किया।’
‘आप भी खाईये न सर।’ किसी तरह शब्द उसके गले से बाहर निकले।
‘अपने हाथ से खिलाइये मिस शर्मा, जैसे हमने खिलाई है। आपसे पहले जो लेडी ए.ओ. थीं क्या नाम था उनका ?’ मिस्टर पॉल ने रामेश्वर बाबू की तरफ देखा।
‘जी सक्सेना मैडम।’
‘हाँ-हाँ मिस सक्सेना। वे भी तो हमें अपने हाथों से ही खिलाया करती थी।’
‘जी सर। वह फिर अवाक्का गई।’
‘सर मिस शर्मा अभी नई है ना, इसीलिये जरा संकोच करती है। धीरे-धीरे सब…।’ आगे की बात रामेश्वर बाबू ने जानबूझकर अधूरी छोड़ दी।
मिस्टर पॉल को मिठाई खिलाये बिना ही वह कमरे से बाहर आ गयी। उसके पीछे-पीछे रामेश्वर बाबू भी चले आये। उसने देखा कि मिस्टर पॉल रामेश्वर बाबू को ने जाने कैसा संकेत कर रहे थे।
‘क्या बात है मैडम, नाराज हो गई ?’ रामेश्वर बाबू ने चश्मे के पीछे से छोटी-छोटी आँखों से छोटा सा सवाल फेंका, पर बोले कुछ नहीं।
‘रामेश्वर बाबू !’
‘जी मैडम।’
‘क्या आज ही सबसे परिचय कराना आवश्यक है ?’
‘जी यहाँ की परम्परा तो यही है।’
‘क्या ये ऑफिशियल है ?’
‘जी ऑफिशियल तो नहीं है।’
‘तो यह मिठाई आप बाबू लोगों में बंटवा दीजिये। मैं साहब लोगों से बाद में परिचय कर लूंगी।’
‘लेकिन मैडम…’
‘लेकिन-वेकिन कुछ नहीं। मैंने कहा है वैसा ही कीजिये।’
रामेश्वर बाबू की झपकती आँखों से टपकते आश्चर्य को यूँ ही कॉरीडोर में बिखरता छोड़कर वह अपनी सीट तक लगभग दौड़ती हुई पहुँची। परिचय ! हूँ ! तो ये हैं इनका परिचय ! अधिकार की डोरी पर चढ़कर बदतमीजी करना। पहले वाली लेडी ए.ओ. अपने हाथ से खिलाती थी। मेरी खिलायेगी जूती। इतना भी नहीं जानते। लेडीज से कैसे बात करते है मैं कोई स्टेनो हूँ ? पी.ए. हूँ ? असिस्टेन्ट हूँ ? प्राइवेट सेक्रेटरी हूँ ? मेरे साथ इस तरह कर सकता क्या मजाक है ? पता नहीं कितना बड़बड़ाई वह भीतर ही भीतर।
अभी अपनी बड़बड़ाहट से उबर भी न पाई थी कि मिस्टर रॉय का बुलावा आ गया। हल्के हरे रंग की छोटी सी स्लिप और गहरे हरे रंग से ही लिखे गये छोटे-छोटे सुंदर अक्षर। बाद में मालूम हुआ कि मिस्टर रॉय को हरा रंग बहुत पसंद है। बदकिस्मती से वह उस दिन हरे रंग की साड़ी पहने थी।
‘आपने मुझे बुलाया सर।’ दरवाजा खोलकर वह वहीं खड़ी रही।
‘अ..हाँ मिस शर्मा।’ आइये- आइये। बैठिये।
‘जी शुक्रिया।’ वह कुर्सी थोड़ा पीछे खींचकर बैठ गई।
‘ज्वाईन कर लिया आपने ?’
‘यस सर।’
‘गुड आज आपका.यदि तुम्हारा कहूँ तो कोई एतराज तो नहीं ?’
उन्होंने बात अधूरी छोड़कर प्रश्न सरका दिया।
‘जी एतराज की क्या बात है आप मुझे बेटीनी कह सकते है आप बड़े है। मेरे पिता समान।’
‘ओह नो। आई एम नॉट सो ओल्ड। आई लुक जस्ट लाइक योअर फ्रेंड, डोन्ट यू थिंक सो ?’
‘यस सर। यू आर राइट।’
‘हाँ तो मैं कह रहा था..ईफ यू डोन्ट माइन्ड एक सिगरेट लगा लूँ ?’
बात दुबारा से अधूरी छोड़कर उन्होंने नया प्रश्न सरका दिया।
‘नहीं सर मुझे कोई एतराज नहीं है।’
‘आप लेंगी ?’
‘नो सर। मैं सिगरेट नहीं पीती।’
‘गुड। वैसे डॉक्टर्स ने मुझे भी मना कर रखा है किन्तु क्या करूं ? इसके बिना काम नहीं चलता। हाँ तो मैं कह रहा था कि आज तुम्हारा फर्स्ट डे है सबसे इण्ट्रोडक्शन कर लो और कल से काम सीरियली शुरू कर दो। अगले हफ्ते से तुम्हें इन्डिपेंडेंटली काम संभालना है।’
‘यस सर। मैं काम सीख लेती हूँ इण्ट्रोडक्शन तो होता ही रहेगा। फार्मेलिटीज की क्या जरूरत है ?’ इण्ट्रोडक्शन के नाम पर उसका मुँह कसेला हो आया।
‘इट मीन्स यू डोन्ट बिलीव इन फार्मेलिटीज’
‘यस सर।’
‘बट फार्मेलिटीज आर एसेंशियल फॉर ऑफिशियल डेकोरम।’
‘यस सर बट आई डिडन्ट मीन दैट।’
‘ओ..। इट मीन्स यू बिलीव इन फार्मेलिटीज’
‘यस सर आई डू बट…’
‘लीव दीज बट्स। कम ऑन मिस शर्मा इट्स ऑफिस। इट्स नॉट योअर होम। यू कांट बिंहैव फ्रीली। आर आई शुड से यू कांट विथ आउट एप्रेकेस’’
उसे लगा उससे बहुत बड़ा अपराध हो गया है। मिस्टर रॉय ने घंटी बजाई।
काखी सी दिखने वाली खाकी वर्दी पर सफेद टोपी धरे कृत्रिम विनम्रता से चपरासी अंदर आया।
‘कॉल मिस्टर बड़ा बाबू।’
खाकी वर्दी ने सैल्यूट बजाया और कुछ ही मिनटों में रामेश्वर बाबू आ खड़े हुए। वे खाकी वर्दी से भी अधिक विनम्र दिख रहे थे किन्तु इस विनम्रता में कृत्रिमता अपेक्षाकृत कम थी।
‘ये लो रामेश्वर, एक किलो मिठाई मंगवालो और मिस शर्मा का सबसे इण्ट्रोड्यूस करवाओ।’ उन्होंने सौ का नोट पर्स से निकालकर रामेश्वर बाबू की ओर बढ़ाया। उसका ध्यान मिस्टर रॉय के बैंगाली लहजे पर गया।
‘सर मिठाई आ गयी है मिस शर्मा तो खुद ही आपके पास आ रही थी।’ उन्होंने मिठाई का डिब्बा आगे बढ़ाया।
रामेश्वर बाबू मिठाई का डिब्बा साथ ही लेकर आये हैं इस ओर उसका ध्यान ही नहीं गया था।
ये सब क्या हो रहा है ? उसने सोचा। लगता है किसी फिल्म की शूटिंग हो रही है सब भी प्लान शॉट्स हैं।
‘अरे आप तो बहुत शर्मीली है मिस शर्मा। बताया नहीं तुमने।’
‘जी वो..वो..’
‘मुबारक हो तुम्हारा नौकरी।’ मिठाई मुँह में ठूँस कर उन्होंने अपना हाथ आगे बढ़ाया।
‘जी धन्यवाद।’ उसने झिझकते हुए दोनों हाथ जोड़ दिये।
‘शेक हैण्ड्स मिस शर्मा।’ उनका हाथ और आगे बढ़ आया।
‘यस सर।’ जाने कैसे उसका हाथ अपने आप उठा और मिस्टर रॉय के हाथ में चला गया।
रामेश्वर बाबू मिठाई का डिब्बा बड़ी विनम्रता से उठाकर बाहर चले गये।
‘हाऊ स्वीट योर लिटिल हैण्ड।’
‘जी..’ उसने हाथ छुड़ाना चाहा। मिस्टर रॉय ने हाथ छोड़ दिया। वह उठकर बाहर चली आई। जल्दी-जल्दी सीढ़ियाँ चढ़कर वह भागती हुई सी अपने कमरे में पहुँची और निढाल होकर गिर गई। धौंकनी की तरह चलती सांस के साथ फूलना-पिचकना उसे अच्छा नहीं लगा।
उसे लगा ईश्वर ने भी ऐसा बनाकर उसके साथ साजिश की है। वह हँसी न होकर पुरुष हुई होती तो ये सब नहीं झेलना पड़ता। उसने साड़ी के पल्ले से अच्छी तरह अपने आपको ढंका। उसे अपने आप से डर लगने लगा कहीं वह खुद अपने साथ पॉल या रॉय की तरह की कोई बदतमीजी न कर बैठे। अकेली लड़की के साथ कोई भी कभी भी न जाने किस नियत के साथ पेश आये।
खिड़की की चटखनी खुलने की आवाज से उसका ध्यान टूटा। देखा चपरासी खिड़कियाँ खोल रहा है।
‘क्या है ?’ उसने खीझ कर पूछा। अपनी आवाज पर वह चौंकी। उसने सोचा कहीं वह चीख तो नहीं रही है।
‘दयाल साहब आपको सलाम भेजते हैं।’
‘…………….’ उसने कोई जवाब नहीं दिया।
‘मैं जाऊँ मैमसा’ब ?’
‘हाँ तुम जाओ।’
‘दयाल साब से क्या कहूँ ?’
‘कुछ कहने की जरूरत नहीं है।’
‘जी वो क्या है मैम साब कि…’
उसने घूर कर चपरासी को देखा।
‘क्या है मैमसा’ब कि आप तो जानती हैं कि दयाल “सा”ब यहाँ के सबसे बड़े अफसर हैं।’
‘तो ?’
‘तो ये कि उनके बुलाने पर तुरंत जाने में ही फायदा है।’
‘क्या फायदा है ?’ आवाज की तल्खी छिपाये नहीं छिप रही थी।
‘ये तो मुझे पता नहीं, किन्तु सुना ऐसा ही है।’
‘अच्छा तुम जाओ…और सुनो, मेरे फायदे नुकसान के बारे में सोचना छोड़कर जितना तुम्हारा काम है उतने में ही मन लगाओ।’
‘जी मैम सा’ब।’ चपरासी बाहर जाने के लिए मुड़ा तो रामेश्वर बाबू कमरे में घुस रहे थे।
‘दयाल सा’ब से और मिल लें मैडम तो सीनियर ऑफिसर्स से इण्ट्रोडक्शन का काम पूरा हो जायेगा।’
वह असहाय सी उठी जैसे पशु वध्यस्थल की ओर जाने के लिये उठता है किन्तु कुछ सोचकर पुनः बैठ गई और रामेश्वर बाबू से बोली – ‘चपरासी कह रहा था कि दयाल साहब यहाँ के सबसे बड़े अफसर है लेकिन मुझे तो बताया गया था कि मिस्टर पॉल ही एम.डी. है।’
‘इन चपरासियों का क्या है साहब, चाहे जो बोल दें।’
‘ऐसा कैसे हो सकता है कुछ बात अवश्य है।’
‘कोई बात नहीं है मैडम, चपरासियों के दिमाग का क्या ठिकाना।’
‘देखो रामेश्वरजी ठिकाने पर तो मुझे यहाँ किसी का भी दिमाग नहीं मिला। एक आप पर कुछ विश्वास हुआ है इसलिये आप से ही पूछ रही हूँ आप नहीं बताना चाहते तो रहने दीजिये।’ वह उठ खड़ी हुई।
‘मैंने सोचा कि यह आपका पहला दिन है धीरे-धीरे तो सब कुछ पता लगेगा ही किन्तु आप जोर दे रही है इसलिये बता रहा हूँ।’
‘वह फिर बैठ गई।’
‘कहिये।’
‘ये बात ठीक है कि मिस्टर पॉल इस कम्पनी के एम.डी. है किन्तु मिस्टर दयाल असिस्टेन्ट डायरेक्टर होने के बावजूद सबसे ज्यादा प्रभावशाली है क्योंकि वे मिसेज आहूजा के बहुत निकट हैं।’
‘मिसेज आहूजा कौन ?’
‘इस कम्पनी के मालिक की पत्नी।’
‘ओह !’
‘चले हम…’
‘आप रहने दीजिये मैं खुद ही चली जाती हूँ किन्तु एक बात और बताइये।’
‘जी।’
‘मिस्टर दयाल और मिसेज आहूजा के संबंध किस प्रकार के हैं।’
‘जी बहुत निकट के संबंध है।’
‘बहुत निकट के का मतलब ?’
‘जी आप स्वयं समझदार है मैं अपने मुँह से कैसे कहूँ।’
‘ठीक है आप जाइये मिस्टर दयाल से मैं अकेले मिल लूँगी।’
‘जैसा आप ठीक समझें।’
रामेश्वर बाबू के जाने के बाद वह उठी और गिलास का पूरा पानी एक सांस में पीकर दृढ़ कदमों से नीचे की ओर चल दी।
‘मे आई कम इन सर ?’ अपने स्वर की दृढ़ता से वह आश्वस्त हुई। वह कर सकेगी उसने सोचा।
‘आईये।’ मिस्टर दयाल फोन पर झुके थे माथे पीछे पर हाथ रखकर उन्होंने उसे बैठने को कहा।
‘हो तो मिस शुक्ला आपने ज्वाइन कर लिया ?’ रिसीवर रखते हुए उन्होंने कहा।
उनके चेहरे से लग रहा था कि बात अधूरी छोड़ देनी पड़ी है।
‘यस सर। बट आई एम नंदिनी शर्मा नॉट शुक्ला।’
‘एक ही बात है शर्मा और शुक्ला। कौन सा ब्राह्मण हो तुम ?’
‘सर वी आर गौड़ ब्राह्मन्स।’
‘हिन्दुस्तानी मैम होकर ये अंग्रेजी क्यों गिटपिटाती हो ? मुझे बड़े रोब डालने के लिये !’ चौड़े दांत निकालकर वे हो हो करके हँस पड़े। वह चुप रही। अजीब खोपड़ियाँ है इस ऑफिस में। कोई अंग्रेजी में ही बकबास झुकता है तो कोई अंग्रेजी को रोब डालने के लिये गिटपिटाना कहता है।
जैसे तैसे बीता वह दिन। शाम को घर पहुँची तो लगा जैसे कई सदियों तक लगातार नौकरी करते रहने के बाद घर लौटी है। कल फिर जाना है वहीं। यही बात उसके मस्तिष्क में चक्कर काटती रही। रात भर वह न जाने किन जालों-उलझनों में फंसी रही। उसने देखा कि गोल घुमावदार सीढ़ियाँ हैं वह लगातार उन्हीं पर चक्कर काट रही है। नीचे की सीढ़ी पर मिस्टर पॉल खड़े है। सबसे ऊपर की सीढ़ी पर मिस्टर दयाल खड़े है। मिस्टर रॉय उसके साथ चक्कर लगा रहे हैं। वह समझ नहीं पाती कि उसे कहाँ जाना है।
मिस्टर रॉय उसका हाथ पकड़ते है – “हाऊ स्वीट लिटिल हैण्ड” वह छिटककर अलग हो जाती है।
मिस्टर दयाल आगे बढ़ते हैं – “इस अंग्रेज के बच्चे के साथ क्या कर रही हो मेरे साथ आओ मैं तुम्हें मिसेज आहूजा बना दूंगा, इस कम्पनी की मालकिन। करोड़ों में खेलेगी, लाखों थूकेगी और लाखों खासकर फेंक देगी। वह उसकी कमर में हाथ डालते है।
नीचे से मिस्टर पॉल चिल्लाते है – “यू कांट मिस बिहेव विद मिस शर्मा। आई एम एम.डी.। यू बोथ आर सिम्पली असिस्टेंट डायरेक्टर। आई विल सी यू। ये मिसेज आहूजा नहीं है जो तुम जैसे बूढ़े पर थूकेगी। मिस शर्मा इज नाट सेक्स हंगर।”
रामेश्वर बाबू आते हैं, उनके मुँह पर खून लगा है। वे दोनों हाथ फैलाकर उसकी ओर बढ़ते हैं। वह पलट कर भागती है किन्तु भाग नहीं पाती। चपरासी से टकरा जाती है वह उसे दबोच लेता है। ‘नहीं..तुम ऐसा नहीं कर सकते।’ वह चीख पड़ती है। आंख खुल जाती है सामने माँ खड़ी है।
‘क्या बात है नंदिनी कोई सपना देख रही थी ?’
‘सपना नहीं माँ असलियत। वह पलंग पर बैठ जाती है।’
‘क्या ? माँ उसे पकड़ कर हिलाती है।’
‘ओह ! मेरा मतलब…सपना ही तो देख रही थी..कितने बज गये ?’
‘एक बजा है।’
‘बस एक ही बजा है। अच्छा तुम सो जाओ। मैं बाथरूम होकर आती हूँ।’
बाथरूम के लिये उठी तो बाहर गली में अचानक कुत्ते भौंके। इतनी जोर से क्यों भौंक रहे हैं ये ? सड़क पर कुछ लोगों के दौड़ने की आवाजें आई। हवा को चीरती हुई चौकीदार की सीटी खामोश रात का सन्नाटा तोड़ गई। चोर, चोर, चोर, चोर पकड़ो-पकड़ो की आवाजों और इस बार कुछ ज्यादा लोगों के दौड़ने की आवाजों। वह बर्फ की तरह चारपाई के पास ही जम गई। चोर कहीं यहाँ आ जाये तो ? तो क्या ? क्या ले जायेगा यहाँ से। घर में है ही क्या, माँ के और उसके अतिरिक्त। मान लो वो उसे ही ले जाये तो ? उसके शरीर से सिहरन सी दौड़ गई। चोर उसे ले जाये तो क्या होगा ?
बाहर गली में फिर से सन्नाटा हो गया था। उसने बत्ती जलाई। प्रकाश में भय कम हो जाता है, पता नहीं क्यों उसे अंधेरे से इतना डर लगता है। कई बार सोचती है तो लगता है वह बेकार में ही अंधेरे से डरती है। प्रकाश में क्या कुछ नहीं होता ? वैसे भी अंधेरे में आज तक कुछ भी ऐसा उसे के साथ नहीं हुआ जिससे वो डर सके।
बाथरूम से लौटी तो बाहर सड़क पर कुत्ते फिर से भौंकने लगे। क्या बात है, चोर फिर से आ गये क्या ? वह बत्ती खुली छोड़कर ही चारपाई पर जा लेटी। मान लो चोर यहाँ आ जाये और फिर उसे ले जाये तो…। उसके दिमाग की सुई फिर वहीं आकर अटक गई। अच्छा होगा, इस नौकरी से तो छुटकारा मिलेगा।
क्या ऐसा नहीं हो सकता कि वह ये नौकरी छोड़ दे। लेकिन कैसे ? कैसे भरेंगे फिर ये दो पेट ? पापा जिंदा होते तब तो रिस्क उठाई जा सकती थी किन्तु अब किसके दम पर उठाये रिस्क ? ग्रेजुएट कम्पनी दो छोटी सी नौकरी देती ही कितना थी। पापा को और उस पर उन्होंने पापा के मरते ही आँखें फेर ली। उसने चाहा कि पापा के बाद उसे कम्पनी में नौकरी मिल जाये किन्तु उन्होंने तो जैसे कसम खा ली थी।
बड़ी मुश्किल से वो लोग तैयार भी हुए तो उस नौकरी के लिए वह हाँ नहीं कर सकी। कम्पनी के शो रूम में एक लेडी डमी की आवश्यकता थी। उसका चेहरा मोहिता और जरूरत देखकर वो लोग तैयार हुए थे। उस जगह के लिए भी कई लड़कियाँ चक्कर लगा रही थीं। बचपन में उसने एक पुलिस लेडी देखी थी क्या रोबदार चेहरा-सिर पर कैप, वर्दी, हाथ में डण्डा। नौकरी हो तो पुलिस की। वह सोचा करती।
पुलिस की नौकरी नहीं मिली तो कोई बात नहीं। वे सब सपने तो पापा के साथ ही चले गये किन्तु शो डॉल बनकर लखपतियों-करोड़पतियों के सामने पूरी देह को विज्ञापन का होर्डिंग बना लेना भी उससे नहीं हो सकेगा ये सब। वह घृणा से उबकर चली आई थी। बाद में कितना पछताई थी वह। दूसरी कोई मिली नहीं और जो मिली वह भी हाथ से जाती रही।
कितनी पहचान और सिफारिशों के बाद इस कम्पनी में नौकरी मिली है और यहाँ…पता नहीं कैसे निभ पायेगा। कैसे-कैसे लोग भरे पड़े है ? क्या करे वह ? नौकरी पर तो जाना ही पड़ेगा। नई नौकरी ढूंढ सके जितनी ताकत उसमें नहीं रह गई। तो क्या करे वह ? इन भेड़ियों का शिकार हो जाये ?
ऐसा कैसे कर लें लोग वो लोग ? क्या टूट ही पड़ेंगे ? आखिर वो सब पढ़े लिखे लोग है कोई जंगली रीछ तो नहीं है। बचपन में उसने एक कहानी पढ़ी थी। एक औरत को एक रीछ उठाकर ले गया था। कुछ दिनों बाद जब वो घर लौट कर आई तो उसने एक रीछ बच्चे को जन्म दिया। पैदा होते ही वो रीछ बच्चा मर गया। सैकड़ों लोग उस रीछ बच्चे को देखने पहुँचे थे।
‘क्या रीछ से औरत को बच्चा पैदा हो सकता है ?’ उसने टीचर से प्रश्न किया तो बहुत जोर से हँसी थीं टीचर।
‘रीछ से औरत को बच्चा नहीं पैदा हो सकता किन्तु औरत से रीछ पैदा हो सकता है।’
‘वो कैसे ?’
‘जब तुम लोग बड़ी क्लास में आ जाओगे तब क्रोमोसोम्स तथा जीन्स के बारे में पढ़ोगे। ये क्रोमोसोम्स तथा जीन्स भ्रूण निर्माण के समय हुई उथल-पुथल में दुर्घटनावश कुछ टूट-फूट जाते हैं इससे जीव के जीनोटाइप तथा फीनोटाइप बदल जाते हैं। करोड़ों में कोई एक केस होता है, जिसमें औरत से रीछ या बकरी से बंदर पैदा हो जाते हैं। ऐसे बच्चे जीवित नहीं रहते।’
‘लेकिन मैडम उस औरत को रीछ उठाकर ले गया था।’
‘ये सब अफवाहें होती हैं, जो बाद में उड़ा दी जाती है। रीछ उठाकर ले भी जाये तो भी वह औरत को मजबूर नहीं कर सकता।’
जो बातें उसकी सहेलियाँ पास पड़ोस के लोग उन दिनों कर रहे थे ये उन बातों से अलग बात थी।
अंदर ही अंदर सहमत नहीं होते हुए बाहर से वह सहमत हो गई थी। आज यदि वह टीचर उसे मिल जाती तो उसे वह दिखा देती कि देखो रीछ औरतों को किस तरह मजबूर कर लेते हैं। क्या इंसै औरत को बच्चे नहीं हो सकते ?
उसे पूरा विश्वास है कि यह बात सुनकर टीचर उसकी हँसी उड़ाती – ये रीछ नहीं आदमी है। चाहे वह पूरी ताकत से चीख-चीख कर कह दे कि ये आदमी नहीं रीछ है भेड़िये है, तो भी कौन मानेगा उसकी बात।
न जाने कब आंख लगी। सुबह उठी तो सूरज आकाश में दो हाथ चढ़ आया था। जल्दी-जल्दी तैयार होकर ऑफिस पहुँची तो भी दस मिनट लेट हो गई। टेबल पर मिस्टर रॉय की चिट्ठी पड़ी थी।
‘मे आई कम इन सर ?’ आज वह फिर जानबूझकर हरे रंग की साड़ी बांध कर आई थी।
‘यस यस कम इन, व्हाट इज द मैटर ? आर यू ऑल राइट ?’
‘सॉरी सर आई एम लेट।’
‘नो-नो-नो आई डिडन्ट मीन दैट। ऑफिसर्स के आने का कोई समय नहीं होता वो सब तो बाबू लोगों के लिये है। मैं तो तुम्हारी तबीयत के बारे में पूछ रहा था। चेहरा भारी-भारी लग रहा है।’
‘नहीं सर ऐसी कोई बात नहीं है मैं ठीक हूं।’
‘गुड। अच्छा एक बात बताइये क्या तुम्हें हरा रंग बहुत पसंद है।’
‘यस सर।’
‘आई ऑल्सो लाइक इट। इट्स रियली ए चार्मिंग कलर। इजन्ट इट ?’
‘यस सर।’
‘तुम क्या हमेशा साड़ी ही पहनती हो।’
‘यस सर।’
‘इतनी उम्र तो नहीं तुम्हारी। इस उम्र की लड़कियां तो जाने कितनी तरह के कपड़े पहनती है। एकदम चुप। साड़ी में औरत ढोली बाली सी लगती है।’
‘……….’ कोई जवाब नहीं दे पाई वह।
‘घर में भी साड़ी पहनती हो ?’
‘यस सर।’
‘गाउन, नाईटी, मैक्सी कुछ नहीं ?’
‘मैं चलूँ सर।’
‘चले जाना। अभी से इतना काम आ गया तुम्हारे पास ? हाँ तो मैं कह रहा था कुछ अच्छी ड्रेसेज सिलवाओ। मिसेज आहूजा को देखा है इस उम्र में भी तीन एजर लगती है एकदम कसी वसी…।’ मिस्टर रॉय को अपनी बात अधूरी छोड़ देनी पड़ी। कमरे का दरवाजा खुला और मिसेज आहूजा धड़धड़ाती चली आई। स्कर्ट ब्लाउज से उसने आसानी से मिसेज आहूजा को पहचान लिया। मिस्टर रॉय उठकर खड़े हो गये। वह अपनी कुर्सी में ही जमी रही। पता नहीं क्यों वह खड़ी नहीं हो सकी।
‘गुड मॉर्निंग मैम।’
‘गुड मॉर्निंग मिस्टर रॉय।’ मिसेज आहूजा ने आगे बढ़कर मिस्टर रॉय को किस किया।
‘आज इतनी मेहरबानी कैसे ?’ मिस्टर रॉय मिसेज आहूजा की इस अप्रत्याशित कृपा से बौखरा गये।
हद होती है बेशर्मी की। वह उठकर खड़ी हो गई।
‘हू इज शी ?’ मिसेज आहूजा का ध्यान नंदिनी की ओर गया।
‘मिस नंदिनी शर्मा अवर न्यू ए.ओ।’
‘ओ..हाऊ स्वीट।’ मिसेज आहूजा ने अपना हाथ नंदिनी की ओर बढ़ाया।
गर्दन झटक कर नंदिनी कमरे से बाहर चली आई। मिस्टर रॉय और मिसेज आहूजा का सम्मिलित ठहाका उसे सीढ़ियों पर सुनाई दिया।
न जाने कितनी देर तक वह गुमसुम सी बैठी रही।
‘साहब बुलाते हैं।’ चपरासी की आवाज से उसकी तन्द्रा टूटी।
‘कौन से साहब ?’
‘रॉय साहब।’
‘क्या काम है ?’
‘ये तो पता नहीं।’
‘पूछकर आओ।’
‘उन्होंने बुलाकर लाने को कहा है।’
‘कह दो मैं नहीं आती।’
‘साहब से नाराज हैं आप ?’
‘तुमसे मतलब ?’
‘हमसे तो कोई मतलब नहीं, वैसे ही पूछ लिया।’
थोड़ी ही देर में मिस्टर रॉय उसके सामने खड़े थे।
‘क्या बात है मिस नंदिनी, तबीयत ठीक नहीं तुम्हारी ?’
उन्होंने नंदिनी के माथे पर हाथ रखा। अवकचाकर उसने अपना सिर पीछे किया।
‘ठीक हूं मैं।’
‘तो फिर बुलाने पर आई क्यों नहीं।’
‘आप अच्छी तरह जानते हैं।’
‘किस बारे में ?’
‘बनिये मत मिस्टर रॉय।’
‘रिकॉग्नाइज योर लिमिट्स। आई एम योर बॉस।’
‘मैं अपनी सीमाओं को अच्छी तरह पहचानती हूं किन्तु आप भी अपनी सीमाओं में रहें। भरसक प्रयत्न करने पर भी वह अपने आपको फटने से नहीं रोक सकी।’
‘मिस नंदिनी। एक ही दिन में तुमने दो गलतियाँ की है, जबकि ये तुम्हारा दूसरा दिन ही है।’
‘मैंने कोई गलती नहीं की।’
‘तो तुम अपनी गलतियों मानने को तैयार नहीं ?’
‘क्या किया है मैंने ?’
‘एक तो मिसेज आहूजा का अपमान और दूसरा मेरे आईडियाज को इस ओछे ढंग.. यू नो, यू आर ऑन प्रोबेशन ? यू कैन वी सिम्पल विदाउट एनी एक्सप्लेनेशन।’
‘आप मुझे धमकी देते हैं ?’
‘मैं तुम्हें सच्चाई दिखा रहा हूँ।’
‘कौनसी सच्चाई। जो मिसेज आहूजा ने दिखाई थी, उसकी बात कर रहे हैं
आप ?
‘अपनी मालकिन का नाम तमीज से लेना सीखो।’
‘वह मेरी नहीं, इस कम्पनी की मालकिन है।’
‘और तुम इस कम्पनी की नौकर हो।’
आगे बोलने के लिए कुछ नहीं रहा नंदिनी के पास।
‘देखो नंदिनी, हमें मालूम है कि तुम एक मिडिल क्लास फैमिली में पली हो जहाँ जीवन में कदम-कदम पर कुण्ठाएँ पालना सिखाया गया है। नाओ यू आर इन रिच अटमॉस्फीयर। लिव यू फस्ट्रेशन्स। ये प्रगति का रास्ता नहीं है। यदि नौकरी में बने रहना चाहती हो तो अपने आपको उसका दावेदार सिद्ध करो।’
‘मैं अपने काम से सिद्ध कर दूंगी कि मुझे नौकरी में बने रहने का पूरा अधिकार है।’
‘काम से तो मशीनों की कैपेसिटी नापते हैं।’
‘और मेरी कैपेसिटी ?’
‘तुम्हारी कैपेसिटी इस बात से नापी जायेगी कि तुम हमें कितना खुश रखती हो।’
‘खुश रखने का मतलब ?’
‘नौकरी में तुम्हें रहना है, मतलब भी तुम्हीं समझो।’
‘सर मैं ये सब तो नहीं कर पाऊंगी।’
‘क्या सब ?’ मिस्टर रॉय के चेहरे पर एक चालाक हँसी कूदी।
‘सर यही सब।’ वह शब्द नहीं ढूँढ पाई।
‘हाँ हाँ कहो। तुम क्या नहीं कर सकती ?’
‘सर वो…।’ उसने सिर झुका लिया।
‘ये तुम नहीं तुम्हारे घटिया संस्कार है जो तुम्हें हर तरह से कमजोर बनाये हुए हैं। न तुम कुछ कर सकती हो, और न कुछ कर सकती हो।’
घटिया संस्कार ! हाँ शायद उसके संस्कार घटिया ही हैं जो उसे कहीं भी, कभी भी मजबूर नहीं देते। उल्टे उसके जीने का हर रास्ता बंद कर देते हैं।
‘मैं तुम्हें एक चांस और देता हूं यदि तुमने प्रोपरली बिहेव नहीं किया तो तुम अपने आपको फायरड ही समझो।’ झटके से अपनी बात पूरी कर मिस्टर रॉय चले गये।
नौकरी छोड़ देगी वह। उसने घर जाते हुए कई बार दोहराया। कोई न कोई रास्ता निकल ही आयेगा। क्या सब अपनी इज्जत बेचकर ही नौकरी करते हैं ? तो फिर वही क्यों अपनी इज्जत का सौदा करे ? बर्तन मांज लेगी कहीं। कहीं कपड़े सीने का काम नहीं मिल जायेगा उसे।
कितनी विचित्र है दुनिया, उसने सोचा। यदि वह बर्तन मांज कर पेट भरे तो इज्जत का सवाल उठायेगी और यदि हजार डेढ़ हजार की साड़ी बांधकर बगल में भारी भरकम सा पर्स झुलाती हुई लोगों का बिस्तर गर्म करती फिरे तो मैमसा-ब कहलायेगी। इज्जत आबरू वाली कहलायेगी।
मोटी छोटी धोती पहनकर गुजर करे तो उसका कोई स्थान नहीं और जिस तिस के सामने नंगी होती फिरे तो लाखों में खेले। सब भूखे हैं जनम-जनम के भूखे। पेट की भूख कम है देह की भूख ज्यादा है। जिसे देखो वही भूखा। पता नहीं कैसी आदिम भूख है कभी मरती ही नहीं। उसका बस चले तो…। बस के झटके के साथ विचारों की श्रृंखला टूटी।
गली में मुड़ते ही घर के सामने उसे भीड़ का छोटा सा टुकड़ा दिखाई दिया। क्या बात है ? उसका दिल जोर से धड़कने लगा। लोग हमारे घर के सामने क्यों जमा है ? कहीं माँ को तो कुछ नहीं हो गया ?
‘नंदिनी आ गयी।’ किसी ने उसे पहचाना।
‘जल्दी करो बेटी।’ पास के शर्माजी ने भीड़ में से रास्ता बनाया।
‘क्या हुआ ?’ वह बदहवास सी माँ के पास पहुँची।
‘अभी तक तो होश में थी। शायद बेहोश हो गई है।’
‘डॉक्टर साहब जरा जल्दी करो।’ शर्माजी ने डॉक्टर को स्टेथोस्कोप हटाते हुए देखकर कहा।
‘इन्हें तुरन्त हॉस्पीटल ले जाना होगा।’
‘क्या हुआ कोई कुछ बोलता क्यों नहीं ?’
‘शांत रहिये इन्हें हार्टअटैक हुआ है।’
‘हार्टअटैक का नाम सुनकर उसके हाथ पांव उठे हो गये।’
‘इनका बाई पास करना होगा। अस्पताल पहुँच कर डॉक्टर बोला।’
‘तो कीजिये ना, मुझसे क्यों पूछ रहे हैं ?’
‘यह बहुत महंगा ऑपरेशन है।’
‘ऐसे समय में सस्ता महंगा देखा जाता है, या आदमी की जान देखी जाती है।’ वह डॉक्टर पर बिफर पड़ी।
‘रिलेक्स मिस नंदिनी। हड़बड़ाने की जरूरत नहीं। अभी उन्हें आक्सीजन दी जा रही है कुछ टेस्ट करने होंगे। ऑपरेशन में कम से कम डेढ़ लाख रुपया खर्च होगा।’
डेढ़ लाख। वह आसमान से गिरी। घर की सफाई तो बाबूजी की बीमारी में ही हो गई थी। वह अकेली, खाली हाथ, कहाँ से करे डेढ़ लाख रुपयों का इंतजाम ? कौन देगा ?
‘क्या सोच रही हैं आप ?’
‘जी, एक साथ इतने सारे रुपयों का इंतजाम ?’
‘आप सोच लीजिये। हम मरीज को बचाने की पूरी कोशिश कर रहे हैं लेकिन बाई पास जरूरी है।’
उसे लगा माँ तो गई। कहीं कोई उम्मीद नहीं। कुछ देर बाद वह दुनिया में बिलकुल अकेली होगी। अपना कहने वाला कोई नहीं होगा। चारों तरफ खूंखार भेड़ियों, गिद्धों और रीछों के झुण्ड उसे नोच-नोंच कर खा जाने को तैयार। कब तक बचेगी वह ? किस-किस से ? कुछ तो करना ही होगा। लेकिन क्या ?
उसने मिस्टर रॉय को डायाल किया।
‘इज इट थी टू फाईव नाइन टू डबल एट’
‘यस।’ शुक्र है कि मिस्टर रॉय घर पर ही थे।
‘सर आय एम नंदिनी’
‘यस नंदिनी व्हाट ”स द प्राब्लम ?’
‘सर आय वांट टू सी यू।’
‘यू कैन सी मी इन ऑफिस, टुमारो मॉर्निंग।’
‘नो सर आई कांट वेट टिल नेक्स्ट मॉर्निंग, मैं अभी मिलना चाहती हूं।’
‘ठीक है चली आओ। कम्पनी के बैंगलो तो तुमने देखे ही है।’
‘यस सर आय“म कमिंग’
कुछ ही देर में वह मिस्टर रॉय के फ्लेट पर थी। सारी बात सुन लेने के बाद मिस्टर रॉय ने कहा ‘देखो नंदिनी तुम कम्पनी में बिलकुल नयी हो, तुम्हें कोई अधिक जानता भी नहीं। कोई तुम्हे डेढ़ लाख रुपया क्यों देगा ?
‘सर मैं हर कीमत चुकाने को तैयार हूं। ये मेरी माँ की जिंदगी का सवाल है।’
‘हर कीमत माने।’
‘सर जो आप कहेंगे ?’
‘डेढ़ लाख रुपयों के बदले में देने के लिये क्या है तुम्हारे पास ?’
‘सर। एक लड़की के पास जो सबसे कीमती चीज होती हैं मैं वह भी…।’
‘सबसे कीमती चीज। जानती हो वह बाजार में सिर्फ सौ रुपये में मिलती है।’
‘सर…।’ वह अपमान और क्रोध से चीख पड़ी।
‘इसमें चीखने की कोई बात नहीं मिस नंदिनी। सच्चाई यही है। कौन बेवकूफ होगा जो सौ रुपये का माल डेढ़ लाख रुपये में खरीदेगा ?’
नंदिनी के पैर कांपने लगे। आंसुओं का तीव्र आवेग आंखों से फूट पड़ा। दुनिया के बाजार में उसने बेचा भी तो क्या ? और कीमत भी क्या लगी ? सिर्फ सौ रुपये। जिसको बचाने के लिये वह हजार रुपये के कपड़े पहनती है, उसकी कीमत सिर्फ सौ रुपये। कितना भ्रमण्ड था उसे अपनी इज्जत पर। उसी के बल पर ही दुनिया खरीदने चली पड़ी थी।
वहीं फूट-फूट कर रो पड़ी वह। चुप हो जाओ नंदिनी। हमें मालूम है हर चीज की कीमत सौ रुपये नहीं होती। तुम्हें डेढ़ लाख मांगने है डेढ़ लाख ही मिलेंगे। लेकिन एक बार फिर सोच लो। कहीं तुम्हारे संस्कार आड़े आये तो क्या करोगी ?
‘सर मैं जान गयी हूं मेरे संस्कारों की कीमत सौ रुपये से अधिक नहीं है। मेरे संस्कार मेरी माँ की जान नहीं बचा सकते। मेरा पेट संस्कारों से नहीं भर सकता। आप जल्दी कीजिये प्लीज।’ आशा की किरण फिर से चमकी तो उसने उछलकर उसे कसकर पकड़ लिया।
‘ठीक है मैं डॉक्टर को फोन कर देता हूं वह मेरा परिचित है। कल सुबह कम्पनी से मेडिकल एडवांस का डेढ़ लाख का चैक ले लेना।’
‘थैंक्यू सर, थैंक्यू वेरीमच। मैं चलूँ ?’
‘कहाँ ?’
‘माँ को देखूं।’
‘डॉक्टर लोग है वहाँ, मैं अभी फोन किये देता हूँ। तुम मुझे देखो। और हाँ कल जरा उस बूढ़े दयाल को भी देख लेना, कम्बख्त इस उम्र में भी…रोज नई टांगें चाहिये उसे।’
बाहर अंधेरा अपनी परतें मोटी करने में लगा था और अंदर एक-एक कपड़ा बेड के कोने पर रखती हुई नंदिनी अपने आपको बहुत हल्का अनुभव कर रही थी। उसे लगा संस्कारों की भारी गठरी को वर्षों तक ढो चुकने के बाद आज उसे सिर से उतार कर फेंकने में उसने देर की है हालांकि बहुत देर नहीं हुई है।
ट्रिन ट्रिन..ट्रिन-ट्रिन…ट्रिन-ट्रिन। बेडरूम के सन्नाटे को टेलीफोन की घंटी ने झिंझोड़ कर रख दिया। ओफ्फो। सब मूड खराब कर दिया कम्बख्त ने। मिस्टर रॉय ने बेड पर से ही हाथ बढ़ाकर चोंगा उठाया।
‘सर वो औरत, जिसके लिये आपने फोन किया था वो मर गई।’
‘मर जाने देते उसे, सुबह नहीं बता सकते थे ?’
मिस्टर रॉय ने खीझकर चोंगा पटक दिया।
‘क्या हुआ, कौन मर गया ?’ न जाने क्यों नंदिनी की आवाज कांप आयी। अरे इतनी बड़ी दुनिया है कोई न कोई मरता ही रहता है। आओ तुम। ऐसे वक्त पर बेकार बातों से मूड खराब नहीं करते। मिस्टर रॉय ने नंदिनी को इतनी जोर से कसा कि उसकी चीख निकल गई।
हंस पड़े मिस्टर रॉय। क्या हुआ, इतने से दबाव में चीख निकल गई। दयाल का क्या करोगी, इस बुढ़ापे में भी इतनी जोर से भींचेगा कि हड्डियाँ टूट पड़ेंगी तुम्हारी तो। पस्त सी नंदिनी बेड पर पसर गई। मिस्टर रॉय अपनी भूख में एक-एक कौर बड़ी बेसब्री से झोंकने लगे।
–डॉ. मोहनलाल गुप्ता के कहानी संग्रह देखे हुए दिन से
ऑपरेशन कहानी की समीक्षा
सृष्टि में स्त्री-अस्तित्व का मार्मिक दस्तावेज ऑपरेशन
डॉ. मोहनलाल गुप्ता के कहानी-संग्रह ‘देखे हुए दिन’ की कहानी ऑपरेशन समकालीन शहरी मध्यवर्गीय स्त्री-जीवन की त्रासदी, कार्यस्थल पर स्त्री-शोषण, आर्थिक विवशता और नैतिक द्वंद्व का अत्यंत सशक्त एवं यथार्थपरक चित्रण प्रस्तुत करती है। यह कहानी केवल एक युवती नंदिनी शर्मा की व्यक्तिगत पीड़ा नहीं है, बल्कि भारतीय समाज की उस व्यापक संरचना का उद्घाटन है जिसमें स्त्री की योग्यता से अधिक उसकी देह का मूल्य आँका जाता है।
यह कहानी अपने शीर्षक ऑपरेशन के माध्यम से केवल हृदय-शल्य चिकित्सा (बायपास ऑपरेशन) का संकेत नहीं करती, बल्कि यह नायिका के आत्मसम्मान, संस्कार, नैतिकता और अस्तित्व पर किए जा रहे सामाजिक ‘ऑपरेशन’ का भी प्रतीक बन जाती है।
कथानक
ऑपरेशन कहानी की नायिका नंदिनी शर्मा एक शिक्षित, आत्मसम्मानी, मध्यमवर्गीय युवती है, जिसे एक विज्ञापन कम्पनी में लेखाधिकारी (A.O.) के पद पर नौकरी मिलती है। पिता की मृत्यु के बाद घर की आर्थिक जिम्मेदारी उसी पर है और उसकी वृद्ध माँ ही उसका एकमात्र सहारा है।
ऑफिस में प्रवेश के साथ ही उसे यह अनुभव होने लगता है कि यह केवल कार्यस्थल नहीं, बल्कि पुरुष वर्चस्व, सत्ता और यौन-शोषण का अड्डा है। मिस्टर पॉल, मिस्टर रॉय और मिस्टर दयाल जैसे अधिकारी उसे उसकी योग्यता से नहीं, बल्कि एक स्त्री-शरीर के रूप में देखते हैं। ‘इंट्रोडक्शन’ के नाम पर उसकी गरिमा का हनन किया जाता है।
नंदिनी अपने संस्कारों और आत्मसम्मान के साथ इस वातावरण का प्रतिरोध करती है। वह समझौता नहीं करना चाहती। लेकिन तभी उसकी माँ को हार्ट अटैक आता है और डॉक्टर डेढ़ लाख रुपये के महंगे बायपास ऑपरेशन की बात करता है। आर्थिक रूप से असहाय नंदिनी के सामने कोई विकल्प नहीं बचता।
वह सहायता के लिए मिस्टर रॉय के पास जाती है, जो उसकी विवशता का लाभ उठाकर उसके आत्मसम्मान की अंतिम दीवार भी तोड़ देता है। अंततः नंदिनी अपनी माँ की जान बचाने के लिए स्वयं को समर्पित कर देती है—लेकिन विडंबना यह है कि उसी समय फोन आता है कि उसकी माँ मर चुकी है।
यहीं कहानी अपने सबसे तीव्र, मार्मिक और करुण बिंदु पर पहुँचती है।
शीर्षक की सार्थकता
ऑपरेशन शीर्षक अत्यंत बहुस्तरीय और प्रतीकात्मक है।
पहला अर्थ—माँ के हृदय का बायपास ऑपरेशन।
दूसरा अर्थ—नंदिनी के आत्मसम्मान, संस्कार और नैतिक चेतना का ऑपरेशन।
तीसरा अर्थ—पूरे समाज के नैतिक पतन का ऑपरेशन, जिसमें मानवता मर चुकी है।
यह शीर्षक कहानी के समूचे भावबोध को अत्यंत प्रभावशाली ढंग से समेटता है।
साहित्यिक मूल्य
1. यथार्थवाद
ऑपरेशन कहानी का सबसे बड़ा साहित्यिक गुण इसका तीखा यथार्थवाद है। इसमें कोई कृत्रिम आदर्शवाद नहीं है। कार्यालयी जीवन, सत्ता-संबंध, स्त्री के प्रति पुरुष दृष्टि, आर्थिक असुरक्षा—सब कुछ अत्यंत वास्तविक है।
यह कहानी पाठक को असुविधा देती है, क्योंकि यह सच्चाई को बिना सजावट के प्रस्तुत करती है।
2. मनोवैज्ञानिक गहराई
लेखक ने नंदिनी के भीतर चल रहे मानसिक संघर्ष को अत्यंत सूक्ष्मता से पकड़ा है। उसकी थकान, भय, घृणा, आत्मसंघर्ष, सपने, असुरक्षा और अंततः टूटन—सबका चित्रण अत्यंत प्रभावशाली है।
विशेषतः उसका बार-बार ‘रीछ’, ‘भेड़िये’, ‘गिद्ध’ जैसे प्रतीकों के माध्यम से पुरुषों को देखना उसके मानसिक आतंक को गहराई देता है।
3. सामाजिक चेतना
ऑपरेशन कहानी स्त्री-विमर्श की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है। यह दिखाती है कि आर्थिक निर्भरता किस प्रकार स्त्री की स्वतंत्रता को सीमित कर देती है।
यह केवल व्यक्तिगत चरित्रों की बुराई नहीं, बल्कि व्यवस्था की क्रूरता का दस्तावेज है।
4. प्रतीकात्मकता
ऑपरेशन कहानी में अनेक प्रतीक हैं—
- खुली खिड़की → स्त्री की निजी सीमा का उल्लंघन
- कॉरीडोर → असुरक्षा और सत्ता का गलियारा
- पीतल की नेमप्लेट → पद और पुरुष सत्ता
- रीछ/भेड़िये/गिद्ध → वासना और शोषणकारी पुरुष
- ऑपरेशन → जीवन और नैतिकता की शल्यक्रिया
ये प्रतीक कहानी को बहुस्तरीय बनाते हैं।
भाषा और शैली
डॉ. मोहनलाल गुप्ता की भाषा अत्यंत स्वाभाविक, प्रवाहमयी और प्रभावपूर्ण है। भाषा में कृत्रिम साहित्यिकता नहीं, बल्कि जीवन की सच्चाई है।
भाषा की विशेषताएँ
सरलता
ऑपरेशन कहानी की भाषा सहज है, जिससे कहानी सीधे पाठक के भीतर प्रवेश करती है।
संवादप्रधानता
संवाद कहानी को जीवंत बनाते हैं। विशेषकर ऑफिस के दृश्य अत्यंत प्रभावशाली बनते हैं।
व्यंग्यात्मक तीखापन
कई स्थानों पर तीखा सामाजिक व्यंग्य दिखाई देता है—विशेषकर ‘इज्जत’, ‘संस्कार’ और ‘मैमसाब’ जैसी सामाजिक अवधारणाओं पर।
अंग्रेज़ी-हिन्दी मिश्रण
ऑफिस संस्कृति को वास्तविक बनाने के लिए अंग्रेज़ी संवादों का प्रयोग अत्यंत सफल है। इससे पात्रों की मानसिकता भी स्पष्ट होती है।
शब्दावली
शब्दावली परिस्थितिनुकूल है। कहीं शहरी दफ्तर की भाषा है, कहीं मध्यवर्गीय घरेलू संवेदना, कहीं मनोवैज्ञानिक बेचैनी।
“भेड़िये”, “रीछ”, “गिद्ध”, “भूख”, “ऑपरेशन”, “संस्कार”, “इज्जत”—ये शब्द केवल शब्द नहीं, पूरी वैचारिक संरचना निर्मित करते हैं।
कहानी की प्रासंगिकता
ऑपरेशन कहानी आज के समय में और भी अधिक प्रासंगिक हो गई है।
कार्यस्थल पर स्त्री उत्पीड़न, यौन शोषण, शक्ति-संबंध, आर्थिक विवशता और ‘मी टू’ जैसी सामाजिक बहसों के संदर्भ में यह कहानी अत्यंत समकालीन प्रतीत होती है।
आज भी अनेक नंदिनियाँ इसी संघर्ष से गुजर रही हैं—योग्यता और देह के बीच चुनाव करने को विवश।
इस दृष्टि से यह कहानी कालजयी महत्व रखती है।
कहानी का फलितार्थ
कहानी का सबसे बड़ा संदेश यह है कि— सिर्फ व्यक्तिगत नैतिकता पर्याप्त नहीं, जब सामाजिक संरचना ही शोषण पर आधारित हो।
नंदिनी हारती नहीं, उसे हराया जाता है। उसका पतन उसका व्यक्तिगत अपराध नहीं, सामाजिक विफलता है।
कहानी यह प्रश्न उठाती है—
क्या स्त्री की इज्जत वास्तव में उसकी अपनी होती है?
या समाज केवल उसकी देह का बाजार मूल्य तय करता है?
यह कहानी पाठक को भीतर तक विचलित करती है।
निष्कर्ष
‘परेशन केवल एक कहानी नहीं, बल्कि स्त्री-अस्तित्व की करुण चीख है। यह मध्यवर्गीय संस्कार, सामाजिक पाखंड, पुरुष सत्ता और आर्थिक असमानता की निर्मम परतें खोलती है।
डॉ. मोहनलाल गुप्ता ने बिना किसी उपदेशात्मकता के, अत्यंत कलात्मक ढंग से एक ऐसी कहानी रची है जो पाठक को लंबे समय तक परेशान करती रहती है।
ऑपरेशन कहानी पढ़कर हम केवल नंदिनी को नहीं देखते—हम अपने समाज का चेहरा देखते हैं।
और शायद यही किसी महान कहानी की सबसे बड़ी सफलता होती है।
-कहानी के लेखक डॉ. मोहनलाल गुप्ता राजस्थान साहित्य अकादमी की सरस्वती सभा के सदस्य रहे हैं।
