मोरिया/ हिन्दी कहानी/ डॉ. मोहनलाल गुप्ता/ कहानी संग्रह – देखे हुए दिन!
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बनवारीलालजी की सांस भीतर ही अटकने लगी (ठीक वैसे ही जैसे वायु का गोला अक्सर उनकी पसलियों में अटक कर छटपटाया करता है) बाई छाती पर उन्हें भारी वजन अनुभूत हुआ। शरीर की सारी शक्ति सिमटकर जैसे कण्ठ में आ गयी। हे भगवान कण्ठ में अटकी हुई ये शक्ति कहीं प्राण तो नहीं। हथेलियों और माथे पर पसीना छलक आया। नहीं-नहीं आज कैसे मर सकते हैं वे ? आज तो रेखा का ब्याह है।
करवट बदल कर उठना चाहा उन्होंने किन्तु उठ नहीं सके। पांव हिलाने की सारी चेष्टा बेकार गई। मन प्राण का पूरा जोर लगाकर आंखों की पुतलियाँ घुमाई तो वे तेजी से इधर-उधर घूम गई जैसे लिसौड़े के बीज इधर-उधर फिसल जाते हैं फिर भी पलंग के पास बैठे कांति को उन्होंने तुरंत पहचान लिया। कौन, कांति ? उन्होंने बोलना चाहा किन्तु बोल नहीं सके। गोंगों की विचित्र सी ध्वनि उनके गले से निकली।
‘क्या बात है भईया, अब कैसी तबीयत है ?’ बनवारीलालजी को पलकें झपकाते देखकर कांति उन पर झुक आया। कब आया रे तू ? उन्होंने पूछना चाहा किन्तु फिर वही गोंगों। उनकी छटपटाहट और बढ़ गई। कनपटियों के नीचे गर्म लावे सा कुछ तेजी से चक्कर काटने लगा।
‘जी घबरा रहा हो. तो पानी पिलाऊं ?’
बनवारी बाबू की बेबस आंखें झर झर झरने लगीं।
‘जी क्यों छोटा करते हैं भैया। आप बिलकुल ठीक हो जायेंगे। रेखा के ब्याह की फिकर है आपको। सब काम हो ही रहा है। जब हाथ पांव ही नहीं चल रहे तो किसी का क्या जोर है, वरना क्या आप करते नहीं अपने हाथों से काम ?’
नि:शब्द बनवारी बाबू ने एक बार फिर जोर लगाया, बोलने के लिये किन्तु वहीं गोंगों की ध्वनि। अचानक बाई और जैसे किसी ने शूल चुभाया। कनपटियों के नीचे का लावा मानो चमड़ी फाड़ कर बाहर बह निकला।
उनका हाथ अपने आप छाती पर चला गया। कैसे हिला ये हाथ। दर्द की बड़ी सी लहर किसी शिलाखण्ड से टकरा कर वापस लौटी और ढेर सारे पानी की तरह इधर उधर फैल गई।
‘कांति…।’ पीड़ा से तड़पकर चीखे वह।
अचानक जैसे चमत्कार हुआ उन्हें लगा कि वे बोल पाये हैं।
‘हाँ भईया। क्या हुआ ?’ कांति के जवाब ने उन्हें आश्वस्त किया।
‘अपनी भाभी को बुला कांति जल्दी कर।’ उन्हें डर हुआ कि आवाज कहीं वापस न जाती रहे।
कांति उठकर बाहर दौड़ा। दरवाजा खुला तो बाहर के शोर का टुकड़ा भृंगों के बादल की तरह तेजी से कमरे में घुस आया। बड़ी चीख पुकार सी मच रही थी। शायद बारात आने का समय हो गया था। कैसे चीख-चीख कर बोल रहे है सब। जैसे बारात के आने से पहले इनका चीख-चीख कर बोलना बहुत जरूरी है।
इतना भी ध्यान नहीं किसी को कि अंदर कमरे में इस घर का मालिक अपनी आखिरी हड्डियाँ गिन रहा है। पिलपिला सा गुस्सा उनके मन में खदबदाया। अच्छा हुआ जो वे इस झूठे संसार को छोड़कर जा रहे है ये भी अच्छा हुआ कि जाते-जाते उनकी आवाज फिर लौट आई है।
कुछ कहने-सुनने लेकर नहीं जायेंगे वे। यहाँ का हिसाब यहीं चुका देंगे। कितने सालों से चक्की सी पिसती रही है उनकी छाती पर। आज सारा बोझ उतार कर फेंक देंगे।
कांति के पीछे-पीछे हाँफती हुई माया देवी कमरे में घुसी।
‘क्या हुआ ? क्या हुआ जी तुम्हें ?’ वह बुरी तरह घबरा गई थी।
‘माया।’ बड़ी कठिनाई से बोल पाये वे। छाती में पाँच के इंजन सी धकधक होने लगी। ऐसे लगा जैसे पसलियाँ तेजी से ऐंठकर अंदर घुस जायेंगी।
‘क्या बात है ? बोलते क्यों नहीं..बहुत तकलीफ है ?’
‘चाची के जेवर कांति को दे देना माया, मैं…।’ उनकी बात पूरी होने से पहले ही दरवाजा खुला और शोर का लंबा भभका झटके से कमरे में घुस आया। दरवाजा खोलकर बड़ी लड़की सुरेखा देहली के बीच में खड़ी हो गई।
कांति के संकेत करने पर उसने दरवाजा बंद किया।
‘क्या है ?’ मायादेवी ने पूछा।
‘मेरी लिपिस्टिक नहीं मिल रही। तुम्हारे पास डार्क मेहरून है क्या ?’
‘इस कमरे में तुझे लिपिस्टिक दिखाई दे रही है। जा किसी और से मांग।’ माँ से झिड़की खाकर उसने बुरा सा मुँह बनाया और दरवाजा खोलकर बाहर चली गई।
कांति ने मुड़कर देखा, बनवारीलालजी का मुँह खुला हुआ है और वे बड़ी धीमी गति से सांस ले रहे हैं। कांति तेजी से उनकी छाती पर झुका, देखा-सांस में घरघराहट सी हो रही है।
‘अस्पताल ले चलना होगा भाभी। लगता है हार्ट अटैक हुआ है छाती से हाथ हटाते नहीं।’
‘कैसे करें लालाजी कुछ समझ नहीं आता ? बारात दरवाजे पर आने वाली है। कहीं कुछ अनर्थ हो गया तो रेखा का जीवन बर्बाद हो जायेगा।’
‘मनोज कहाँ है ?’
‘मनोज तो आया ही नहीं लालाजी। सूरज पता नहीं कहाँ लगा हुआ है। वही तो संभाल रहा है। हे भगवान। क्या होगा अब ?’ मायादेवी सिर पकड़कर वहीं बैठ गयी।
‘घबराओ मत भाभी। तुम आरती की तैयारी करो देखो बारात दरवाजे पर पहुँच गई। तुम्हारी पुकार हो रही है। मैं इन्हें लेकर अस्पताल जाता हूँ। ब्याह नहीं बिगाड़ना है लड़की का।’
‘कमाल है मम्मीजी। आप यहाँ बैठी है और उधर दूल्हा दरवाजे पर खड़ा है। आरती नहीं करनी क्या ?’ सूरज की बहू आँधी तूफान की तरह कमरे में घुसी।
‘चल चल जल्दी कर मैं वहीं तो आ रही थी। तेरे ससुर की तबीयत जरा…।’
‘पिताजी को बाद में संभाल लेना मम्मीजी। मौके की नजाकत नहीं समझती क्या आप ?’
जिस तेजी से वह आई थी उसी तेजी से बाहर निकल गयी। सूरज की बहू को पहचानता नहीं था कांति। कौन होगी यह। संबंधों से तो ऐसे लग रहा था जैसे मनोज या सूरज की बहू हो किन्तु उसकी वेशभूषा इस घर की बहू होने में संदेह पैदा करती थी।
कंधे तक झूलते बाल, नाभि से नीचे बंधी साड़ी और जब मुड़ी तो पीठ पर ब्लाउज की सिर्फ एक पतली पट्टी ही नजर आई। पूरी कमर नंगी। धत्त। गर्दन को एक झटका दिया कांति ने। कैसा छिछोरापन है यह ? भईया मरणासन्न है और वह अपने ही घर की पता नहीं किस बहू बेटी के कपड़ों को नाप तोल रहा है।
बनवारी बाबू उसी अवस्था में मुँह खोले हुए पड़े थे। कांति की इच्छा हुई कि भईया को कंधों पर बैठा ले और दौड़ता हुआ हॉस्पीटल पहुँच जाये। ठीक वैसे ही जैसे बचपन में भईया उसे कंधों पर बिठाकर कितनी ही दूर तक दौड़ते चले जाते थे। कितने पास का रहा होगा वह।
सात-आठ साल का, शायद इससे भी छोटा। अब तक याद है उसे अपने बचपन की एक-एक बात। बचपन की स्मृतियाँ ही तो पुरखों की संपत्ति की तरह से बड़े यत्न से संभाल रखी है उसने। और है ही क्या उसके पास संभाल कर रखने को।
विचारों में गँवाने के लिए अधिक समय नहीं था। उसने लपककर अचेत बनवारी बाबू को बलिष्ठ बाहों में उठा लिया और तेजी से पीछे के दरवाजे की ओर दौड़ा। पूरा घर खाली था। सब लोग बारात की अगवानी करने सामने के दरवाजे पर थे।
पीछे की गली से ही वह टैक्सी स्टेण्ड पर आया बैण्ड की आवाजें तेजी से पीछे छूट गई।
‘विक्टोरिया। जरा जल्दी करना भाई।’
विक्टोरिया के सामने टैक्सी रुकते ही पचास का नोट टैक्सी वाले की तरफ फेंक कर वह बनवारी बाबू को उठाये कैजुअल्टी वार्ड की तरफ दौड़ा।
‘क्या हुआ इसको ?’ वार्ड में घुसते ही नर्स की कठोर आवाज उसके पैरों से चाबुक की तरह लिपट गई।
‘शायद हार्टअटैक है।’
‘अरे बाबा क्या बोलता है इस तरह लेकर आया है हार्टअटैक के पेशेंट को। ये तो मर गया होगा।’
‘सिस्टर..’ उसकी चीख से पूरा वार्ड थर्रा गया।
सबने चौंक कर उसकी तरफ देखा वह खुद भी अपनी आवाज से सहम गया। कैसे निकली इतनी तेज आवाज उसके गले से।
‘मेरा मतलब था, एम्बुलेंस नहीं मंगवा सकता था क्या ?’ नर्स की आवाज में सिटपिटाहट घुली थी इस बार।
‘प्लीज सिस्टर सवाल मत करो। डॉक्टर को बुलाओ जल्दी।’
डॉक्टर ने आते ही बनवारी बाबू को आई.सी. में शिफ्ट किया। आक्सीजन, इंजेक्शन, नलियां, सुइयां, गोलियां, न जाने क्या-क्या मंगवाता रहा वह एक के बाद एक। चकरी की तरह घूम कर रह गया कांति। वह तो ठीक था कि शादी में आया था और चलते समय पता नहीं क्या सोचकर बैंक से रुपये निकाल लाया था वरना कैसे होता ये सब।
घड़ी की सुइयां हुई सुइयां डर-डर कर कदम धरती हुई मंजिल के बारहवें माले पर कब जा पहुँची पता ही नहीं चला। जिस समय वह कुछ फ्री हुआ अस्पताल के गजर ने बारह बजाये।
अजीब बात है, उसने चौंक कर घड़ी देखी, बारह बज गये और कोई आया नहीं घर से। आता भी कौन, मनोज तो ब्याह में आया ही नहीं। सूरज और भाभी काम में लगे होंगे। इसके अलावा और किसे जरूरत है जो बनवारीलालजी या कांति के बारे में सोचे कि कहाँ हैं ये दोनों। ब्याह का उत्सव, सबकी अपनी-अपनी कम्पनी, अपनी-अपनी मौज, मस्तियाँ और ठहाके। वैसे-वैसे क्षण आते हैं आदमी के जीवन में। वहाँ बेटी की शादी हो रही है और यहाँ बाप अस्पताल में मौत से जूझ रहा है।
बाहर लॉन में आकर सिगरेट लगा ली उसने। पता नहीं वह भईया को लौटाकर घर ले भी जा पायेगा या नहीं। ये दिन भी आखिर आना ही था। जीवन में बचपन की छोटी-छोटी कल्पनाओं से लेकर आज की बड़ी-बड़ी तार्किकताओं तक के, कई संग
साल सर्प से उसके मन में छतरों की तरह कमानियाँ तान कर खड़े हो गये। जगह-जगह खोते लगा उस का बदरंग पर्दा उन कमानियों पर अटकता हुआ फड़फड़ा रहा था।
गांव का कच्चा मकान, खेत, चाची, किशोरावस्था की दहलीज लांघ कर युवावस्था में कदम रख चुके भईया को कद्दियल देह, गांव का स्कूल, चक्की, चामुंडा वाला पीपल, उसके मन में तेजी से चक्कर लगाने लगे वेग से बहती नदी में पत्ते हुए भंवर एक लहर से उठकर दूसरी लहर में समा जाते हैं। कुछ धुंधले और कुछ एकदम साफ चित्र।
‘तुम्हारा पेशेंट होश में आ गया है।’ ऊँची एड़ियों पर उचक-उचक कर चलती हुई नर्स उसे ढूंढ़ती-ढूंढ़ती लॉन तक आ पहुँची।
‘कैसा आदमी है तुम ? तुम्हारा पेशेंट वहाँ आई.सी.यू. में है और तुम यहाँ मजे से सिगरेट पी रहे हो।’ नर्स की फटकार का खौलापन अंदर तक दबा गया उसे। जैसे भारी भरकम बोझ से साँप की रिसिंग पूरी अंदर तक धंस जाती है।
कांति को अंदर आया देख, बनवारीलालजी ने मुस्कुराने का प्रयत्न किया, किन्तु होंठ हिले ही नहीं, जैसे किसी ने टेप से चिपका दिये हों या धागे से सिल दिये हों। मुस्कुराते भी कैसे ? मुँह में तो आक्सीजन की नली लगी थी उन्होंने नली हटाने का संकेत किया।
‘इसे लगी रहने दो भईया, तुम्हें सांस लेने में कठिनाई होगी।’ बनवारीलालजी ने नली हटाने के लिये फिर संकेत किया।
‘थोड़ी देर रहने दो भईया, कुछ तबियत ठीक होते ही हटा दूंगा।’
अजीब सी छटपटाहट के साथ बनवारीलालजी उठ बैठे और पूरी ताकत से उन्होंने नली निकाल कर फेंक दी। स्टेण्ड पर लटकी ड्रिप की बोतल तेजी से इधर उधर नाची, हाथ की सुई भी निकाल कर फेंक दी उन्होंने।
‘अरे रे..’ करता रह गया कांति। नर्स को बुलाने के लिए उठा तो बनवारीलालजी ने हाथ जोड़ दिये। उनकी कातर आँखें कांति से देखी नहीं गई। कैसी तीव्र वेदना हुई उन आंखों को देखकर, जैसी चाची (माँ) को देखकर हुई थी उस दिन। कांति चुपचाप उनके सिरहाने बैठ गया।
‘पानी’ हाथ से संकेत किया उन्होंने।
कांति ने पानी पिलाया।
‘कांति’ — उनकी क्षीण आवाज मोमबत्ती की लौ की तरह कांपी।
‘बोलो मत भईया कुछ आराम कर लो। सुबह तक – बिल्कुल ठीक हो जाओगे।’
‘आज भर बोलने दे, फिर कभी नहीं..।’ बात अधूरी छोड़ दी उन्होंने।
‘बीड़ी है ?’ बनवारीलालजी ने हाथ होठों से लगाकर संकेत किया।
‘बीड़ी पियोगे ?’
‘हाँ’
‘ऐसी स्थिति में ?’
‘बस एक’ की मुद्रा में उन्होंने अंगुली उठाई।
‘बीड़ी नहीं है, सिगरेट है।’
‘चलेगी’ की मुद्रा में उन्होंने सिर हिलाया।
‘नर्स और डॉक्टर लड़ेंगे।’
याचक की मुद्रा में उन्होंने हाथ फैला दिये। विवश होकर कांति ने सिगरेट जलाकर उनके मुँह से लगा दी। जिस सिगरेट को जीवन भर भईया से छिपाया था वही आज अपने हाथों से अपनी जेब से निकालकर भईया के मुँह से लगाई कांति ने। उसे बचपन की घटना रह रह कर याद आ जाती। वह मंदिर के पिछवाड़े में चुपचाप बैठा बीड़ी फूंक रहा था कि अचानक भईया आ निकले। पीटते-पीटते घर ले गये उसे किन्तु चाची से कुछ नहीं कहा।
दो सूटे खींचकर बनवारीलालजी ने सिगरेट कांति की तरफ बढ़ा दी।
‘बस’
‘हाँ।’
कांति की जान में जान आई। कर्कशा नर्स का बड़ा डर लग रहा था उसे। यदि वह इस बीच आ जाती तो सिर फोड़े बिना नहीं रहती उसका।
सिगरेट पीकर कुछ ताकत सी आ गई बनवारीलालजी के शरीर में। तकिये का सहारा लेकर थोड़े से उठकर बैठ गये वे।
‘आखिरी वक्त तेरा हाथ लग गया। मेरी मिट्टी सार्थक हो गई कांति।’
‘कैसी बातें कर रहे हो भईया। अभी बहुत लंबी उम्र है आपकी।’
‘मैंने बड़ा अन्याय किया तेरे साथ लेकिन तूने अच्छा किया जो आ गया। अब चाची के पैर पकड़ कर माफी मांगने के लायक हो गया हूँ। तेरी भाभी को कह दिया है चाची के सारे जेवर दे देगी तुझे..मनोज और सूरज को मत बताना..। जैसे मेरे कर्म थे वैसे ही पूत पैदा हुए कमबख्त..।’ बोलते बोलते हांफने लगे वे।
‘ज्यादा बोलने से तबियत खराब हो जायेगी तुम्हारी।’
‘कितने साल रूठा रहा रे तू मुझसे।’
‘मेरी अकल पर पत्थर पड़े थे जो बाप जैसे भाई को छोड़कर वहाँ पड़ा रहा परदेश में। औरतें जो न करवायें सो थोड़ा है।’ कांति ने बनवारीलालजी के पांव पकड़ लिये।
‘औरतों को क्यों दोष देता है ? पाप तो मेरे मन में था। कैसा सा मुँह लेकर जाऊँ ऊपर..। चाची पूछेंगी तो क्या जवाब दूंगा ?’
‘बातें भूल जाओ भईया, मुझे जेवर नहीं चाहिये..।’
‘बुद्धि भ्रष्ट हो गई थी मेरी। तेरी भाभी कोई बुरी औरत नहीं है, बेटों की ममता ने बोरा रखा है उसे।’
मरणासन्न भाई से जेवरों की बात करना अच्छा नहीं लग रहा था कांति को।
‘थोड़ी देर सो लो भईया। तबियत कुछ सुधर जायेगी। ये ड्रिप लगा देता हूँ। आक्सीजन की जरूरत नहीं है तो उसे रहने देते हैं।’
‘अब तेरी मर्जी आये सो कर, अब मुझे कोई फिकर नहीं है। तुझसे माफी नहीं मांगता तो बड़ा बोझ लेकर जाता।’
कांति ने स्टेण्ड लेकर नीडिल फिर से हाथ में लगा दी और ड्रिप चालू कर दी। बनवारीलालजी तो सोया जान वह भी नीचे फर्श पर लंबा हो गया। पिछली रात भी सफर के कारण से नहीं सो सका था वह। लेटते ही नींद आ गयी। आधा घंटा मुश्किल से हुआ होगा कि नर्स की कर्कश आवाज से उसकी आँख खुल गयी।
‘तुम इधर सोता है, उधर तुम्हारा भाई मर गया।’
उस किसान की तरह झटके से उठकर खड़ा हुआ कांति, जिसे अपने खेत में नीलगायों के घुस आने की सूचना मिल गई हो। ‘क्या बकती है यह ?’ बनवारीलालजी शांत मुद्रा में सो रहे थे। सोते हुए भी उनके होंठों में मुस्कान की क्षीण रेखा दबी हुई थी।
“क्या कह रही हो सिस्टर, ये तो सो रहे हैं”
“सॉरी मैन, ये हमेशा के वास्ते सो गया अब। पता नहीं कैसा लोग आ जाता है। पेशेंट मर जाये। अपना नींद नहीं छोड़ सकता। बाद को बोलेगा कि डॉक्टर ने मार दिया। सिस्टर ने मार दिया” वह बड़बड़ाती हुई बाहर चली गई।
सचमुच ही बनवारीलालजी अब इस दुनिया में नहीं थे। कांति ने हाथ उठाया तो ठण्डी लकड़ी के समान उठा वह। उसने घड़ी देखी ढाई बजे थे।
एक घंटे में सारी औपचारिकताएँ पूरी कर डॉक्टर ने बॉडी को डिस्चार्ज कर दिया। पोस्टमार्टम रिपोर्ट भी दे दी हाथों हाथ।
कांति को लगा आज वह सचमुच ही अनाथ हो गया। पिता की स्मृति नहीं थी
उसे। उनके स्थान पर सदैव भईया को ही देखा था। चाची मरी तब कांति पढ़ रहा था। मरते वक्त खेती-बाड़ी नोहरे-होरे और ढोर-डंगर के साथ उसे भी चाची भईया के हाथ सौंप गई।
चाची के मुँह से उसने पिता की मृत्यु का किस्सा कई बार सुना था। छोटी-मोटी आंधी आती तो माँ कांप जाती। घंटों उसका रंग चूने की तरह सफेद रहता और जब तक उस घनघोर काले दिन का किस्सा नहीं कह लेती तब तक सामान्य नहीं होती। गांव में कोई किसान या चरवाहा “जीरा” गाता हुआ निकल जाता तब भी उसकी यही स्थिति रहती।
उस शाम बड़ा भारी तूफान आया। ऐसा बनवो अंधेरा छा गया कि हाथ को हाथ नहीं सूझा। बैलों से बंधे छक्कड़े उड़ गये। सांड़ (मादा ऊंट) पर सवार लोगों को तो पता ही नहीं चला। भेड़ों के रेवड़ आकाश में रुई के फाहे की तरह उड़ गये। बाजसा झपट्टा हुआ तूफान साक्षात मौत का पंजा फैलाये हुए आया तो कोई नहीं संभल सका। खेतों से लौटता हुआ उनका परिवार भी तूफान में घिर गया। सब लोग ट्रैक्टर में बैठे हुए थे।
कांति के पिता नहर के किनारे-किनारे ट्रैक्टर चलाते हुए उच्च स्वर में जीरा गा रहे थे। कांति की माँ कई बार उनसे मोरिया गाने को कह चुकी थी किन्तु वे जीरा और “चिरमी” को छोड़कर मोरिया गाने को तैयार नहीं थे। जब भी कोई उन्हें “मोरिया” गाने को कहता वे पता नहीं क्यों चिढ़ से जाते।
कहते – “मोरिया गाने का मतलब है गीतों की समाप्ति और अभी तो मैं चिरमी तक भी नहीं पहुँचा।” वैसे भी जीरा ही उन्हें अधिक पसंद था। उनके जीरे को सुनकर आधा मील दूर खड़ा आदमी भी बता देता था कि कन्हैया गा रहा है। दूर-दूर तक उनकी आवाज ऐसे फैल जाती जैसे नहर का तेज बहाव वाला पानी खेत की क्यारियों में फैल जाता है।
किस्सा सुनाते-सुनाते चाची खुद भी गाने लगती —
पीळो ओढ़ जीरा में चाली
जीरो पड़ गयो पीळो रे
मत बाओ म्हारा परण्या जीरो।
ओ जीरो जीव रो बैरी रे
मत बाओ म्हारा परण्या जीरो।
आंसुओं की मोटी-मोटी गरम बूंदें कांति के हाथ-मुँह पर टप-टप गिरने लगती। गाना छोड़कर चाची जोर-जोर से रोने लगती। कांति को भींचकर छाती में भर लेती – “तू कभी जीरा मत गाना कांति” ऐसे समय में कांति को चाची के पागल होने का संदेह होता।
‘फिर क्या हुआ चाची ?’ उसके दोनों कंधे पकड़ कर हिलाता वह। आगे का किस्सा चाची बड़ी मुश्किल से कह पाती। जिसमें केवल दो चार पंक्तियां होती। तूफान घड़घड़ाता हुआ छाती पर चढ़ आया और देखते ही देखते ट्रैक्टर को उसने अपने कब्जे में ले लिया। और वह जैसे उठकर नहर में जा गिरा। कोई किसी को देख भी नहीं
पाया। कुछ सुन पाने का तो प्रश्न ही नहीं था। लाखों करोड़ों मुँह से गरजता हुआ तूफान अपनी लपलपाती जिह्वाओं में न जाने कितनी जाने ले गया।
चाची का जब होश आया तो वह नहर के किनारे पड़ी थी। साल भर का कांति उसकी छाती से बंदर की तरह चिपका हुआ था। ट्रैक्टर और ट्रैक्टर में बैठे कांति के पिता, बनवारी के माता पिता और दो मजदूरों में से किसी का कोई पता नहीं था।
‘और बनवारी भईया कैसे बचे चाची ?’
‘बनवारी खेतों पर नहीं जाता था। स्कूल में पढ़ने जाता था और लौटकर सीधा घर ही आता। उसे खेत में काम करना कभी अच्छा नहीं लगा।’ यहां तक आते-आते चाची सामान्य हो जाती।
‘ऊँह।’ ढेर सारा काम पड़ा है। ‘तू तो बाबूनी हो गया है। एक ही किस्सा बार-बार लेकर बैठ जाता है’ और किस्सा सुनाने का सारा दोष कांति पर मढ़कर चाची अपने काम में लग जाती।
माता-पिता के अचानक यूं चले जाने के बाद बारह साल के बनवारीलालजी अपनी चाची का पल्ला पकड़ कर ही बड़े हुए। बनवारीलालजी के प्रत्येक काम की नकल करने वाला कांति भी माँ को चाची ही कहता। चाची ने बच्चों को शहर के एक स्कूल में ही पढ़ाया। बनवारीलालजी का ब्याह वे अपने हाथों से कर गयी। जब कांति स्कूल छोड़कर कालेज में आया तो एक दिन अपने वंश, रक्त, जमीन जायदाद सबका ट्रस्टी बनवारीलालजी को बनाकर वे कांति के पिता के पास चली गई।
मरते समय बहुत दुखी नहीं थीं वे फिर भी कांति की ओर से दिल कुछ कच्चा था। बनवारी और कांति बस ये दो ही तो आंखें थीं उनकी। एक आंख तो मजबूती हो चली थी किन्तु दूसरी आंख अभी कच्ची थी और देखने वाला सदा के लिये देखना छोड़ रहा था।
“इसकी पढ़ाई में कमी मत आने देना बनवारी। खाने कमाने-लायक हो जाये तो ब्याह करके अलग कर देना। बेटी बारी बेच देना अब। मेरे पीछे कौन देखेगा ये सब। खेत घर नोहरे में तुम दोनों भाइयों का आधा-आधा हिस्सा है तुम्हारी माँ के जेवर मैंने तेरी बहू को दे दिये हैं। और देख ये मेरे जेवर हैं जब कांति की बहू आ जाये तो उसे पहना देना। अब तू ही इसका बाप है। दोनों भाई लड़ें तो तेरी आत्मा बहुत रोयेगी बनवारी…”
तीस दिन तक अपनी मौखिक विरासत दोहराती रही थी वह। हालांकि बीमारी बहुत मामूली थी। फिर भी पता नहीं कैसे उन्हें लग गया था कि अब नहीं बचेगी वे। बार-बार कहती – ‘तेरे चाचा का बुलावा आ गया है अब जाना ही पड़ेगा। बहुत दिनों से वे स्वर्ग में अकेले हैं। उन्हीं की सेवा के लिये मुझे सुरग मिलेगा वरना मुझे पापन को तो नरक भी नसीब नहीं। और सचमुच ही वह चल दी।’
कैसे फूट-फूट कर रोये थे दोनों भाई। तभी से कांति के माँ-बाप-भाई-दोस्त सभी कुछ बनवारीलालजी ही थे। आज न चाची है न बनवारीलालजी। उसे लगा आज दूसरी बार ट्रैक्टर गिरा है। वह भी बनवारी भैया के साथ नहर में बह गया है। केवल उसकी देह किनारे पड़ी हुई है। अनाथ होना किसे कहते है। माँ की मृत्यु पर नहीं जाना था कांति ने किन्तु आज अनाथ होने का भाव कांति के मन मस्तिष्क पर छा गया। दीवार में सिर दे देकर रोने लगा वह।
‘कैसा आदमी है, ऐसे रोता है, इतना बड़ा आदमी होकर ? घर में कोई और आदमी नहीं है क्या तुम्हारे ? बॉडी को लेकर क्यों नहीं जाता।’
नर्स की आवाज से वह वर्तमान में लौटा। उसकी आवाज में पहले वाली कर्कशता नहीं थी। बिना कर्कशता के उसकी आवाज बड़ी फीकी-फीकी सी लगी।
घर आया तो पूर्व में जो फटने के संकेत होने लगे थे किन्तु अंधेरा हार मानने को तैयार नहीं था और मरणाकांक्षी योद्धा की तरह डटा हुआ था। रेखा कार में बैठ चुकी थी। रोने-धोने की रस्म भी चुकता करके विदाई का काम पूरा हुआ। कांति चुपचाप औरतों की भीड़ के पीछे जाकर खड़ा हो गया। मायादेवी ने देखा तो लपक कर आई – ‘क्या हुआ ?’
उनकी दृष्टि में संदेह की सैकड़ों बिजलियाँ कांप रही थी।
‘चलो भैया को अस्पताल से ले आयें।’
‘क्या इतनी जल्दी छुट्टी मिल गई ?’
‘भैया को छुट्टी मिले तो कई घंटे हो गये भाभी।’
घर में कोहराम मच गया।
तेरहवीं तक रुकना पड़ गया कांति को। उसने कहा भी कि वह तेरहवीं पर फिर आ जायेगा, एक बार अपनी नौकरी संभाल आये किन्तु मायादेवी ने नहीं जाने दिया। भाभी के आदेश को भइया का ही आदेश समझा उसने किन्तु इन तेरह दिनों में उसे लगातार यही लगता रहा कि मनोज और सूरज को उसका यूं रुके रहना अच्छा नहीं लग रहा। बनवारीलालजी की खबर पाकर मनोज भी अपनी पत्नी और बच्चों सहित आ गया था।
सब कारज पूरे हो जाने के बाद चलने लगा तो भाभी ने जेवरों की छोटे सी पोटली आगे बढ़ाई — ‘क्या है यह ?’
‘तुम्हारी अमानत।’
‘अब इस उम्र में इनका क्या करूंगा भाभी ? तुम्हारी दया से सब कुछ है किसी चीज की कमी नहीं।’ पता नहीं क्यों उसके स्वर में तिक्तता घुल आई वह स्वयं भी नहीं समझ सका।
‘ये तुम्हारे नहीं तुम्हारी बहू के हैं।’ भाभी ने पोटली जबरदस्ती उसके हाथ में धर दी।
उसी समय मनोज तपकता हुआ आ गया और लगभग चौंकते हुए बोला – ‘ये क्या कर रही हो माँ ?’
क्या कर रही हूं ? मायादेवी कुछ समझी नहीं।
‘ये जेवर किससे पूछ कर चाचा को दे रही हो ?’
‘पूछना किससे है ? ये तो चाचा के ही है।’
‘जेवर चाचा के नहीं हैं, यदि उनके होते तो पिताजी अपने हाथ से दे गये होते।’
‘तुम्हारे पिताजी ने ही अपने आखिरी समय में मुझसे ये जेवर कांति को देने के लिये कहा था।’
‘बाबूजी की मति तो बुढ़ापे और बीमारी की वजह से मारी गई थी आपकी मति तो ठीक है।’ मनोज की बहू ने अपने पति के स्वर में स्वर मिलाया।
‘पता नहीं बहू किसकी मति कब मारी गई अब जिसकी चीज है उसी के पास जाने दे। नहीं तो तेरे ससुर को स्वर्ग में क्लेश होगा।’
‘जो लोग जिन्दा हैं उनके क्लेश की तो आपको चिन्ता नहीं, मर हुओं की चिंता है।’ सूरज की बहू भी खुलकर मैदान में आ गई। उसकी साड़ी अब भी नाभि से नीचे बंधी थी और पीठ पर ब्लाउज की पतली पट्टी, कमर के नंगापन को नहीं छिपा पा रही थी।
‘चीज जो जिसकी थी उसी के पास है माँ तुम्हीं सब कुछ उल्टा सीधा करे दे रही हो।’ सूरज को लगा कि यदि वह चुप रहा तो कायर न माना जाये।
‘ये जेवर चाची के हैं।’ ‘माँ ने हार नहीं मानी। हालांकि बहू बेटों की आंखों में उन्हें अपना वर्तमान और भविष्य दोनों दिखाई दे गये थे।’
‘तो क्या हुआ। बाबूजी ने इन्हें पढ़ाया लिखाया नहीं था ? उस पर पैसा खर्च नहीं हुआ ?’ मनोज को अपनी माँ पर इतना क्रोध आ रहा था कि बस चलता तो उसी समय धक्का मारकर बाहर कर देता।
‘पैसा तेरे पिता ने खर्च किया था तूने तो नहीं।’
‘एक ही बात है। बाबूजी न खर्च किया था हमने।’
‘किन्तु उस वक्त तो तू पैदा भी नहीं हुआ था।’
‘ये जेवर भी हमारे पैदा होने से पहले ही बाबूजी ने इन्हें दे दिये होते। पढ़ाई लिखाई पर क्या कुछ खर्च नहीं किया होगा बाबूजी ने इन पर?’
‘तेरे बाबूजी को भी तो कांति की माँ ने ही पढ़ाया था।’
‘सो क्या अपनी गांठ से पढ़ाया था। क्या खेत खलिहान में बाबूजी का हिस्सा नहीं था ?’
‘खेत खलिहान क्या अपने आप पैसा उगलते थे ? उनमें खटती तो चाची ही थी।’
उत्तर प्रतिउत्तर का लंबा सिलसिला आरंभ हो गया था। कुशल पात्रों की तरह चारों बहू बेटे अपने-अपने संवाद बोल रहे थे और मायादेवी थी कि पराजय स्वीकार करने को तैयार नहीं। कांति इस विवाद का केन्द्र होकर भी निरपेक्ष भाव से सबको देखे जा रहा था, मानों वे उसके बारे में नहीं किसी और के बारे में बात कर रहे हो। जिन जेवरों ने उसके और भइया के बीच खटाई की पांव धर दी थी वही जेवर भइया के घर में नये संग्राम को जन्म दे रहे थे इसे यहीं रोकना चाहिये।
मनोज ठीक कहता है भाभी। ये जेवर वास्तव में इन्हीं के हैं। चाची ने अपने आखिरी दिनों में मुझसे कहा भी था कि घर की सारी जमीन जायदाद जेवर, लत्ते सब भइया के ही हैं। मेरा हिस्सा केवल खेतों में था, जो मैंने अपनी मर्जी से भइया को दे दिया था। अब इस सब पर मेरा अधिकार कोई नहीं। भइया वास्तव में अपनी बीमारी और बुढ़ापे के कारण बौरा गये थे। इन पर वास्तव में मेरा कोई अधिकार नहीं।’
बात समाप्त करके उसने अपनी अटैची उठाई और सीधे हुए कदमों से बाहर आ गया। बाहर आते ही उसके कानों में घर्र घर्र की आवाज गूंजने लगी। ट्रैक्टर के इंजन जैसी। उसे लगा, चालीस साल पहले जो ट्रैक्टर नहर में गिरा था, आज वह पूरी तरह बह गया। उसके गिरने का कोई चिन्ह अब शेष नहीं है। न ही कोई बचकर किनारे पर लग सका है। सबके सब उसमें बह गये हैं।
जेवरों की एक छोटी से पोटली तेजी से नहर के पानी में चक्कर काट रही है। लगता है किसी भंवर में फंस गयी है फिर भी डूब नहीं रही है। डूबती क्यों नहीं यह ? क्या यह अनन्तकाल तक इसी तरह चक्कर लगाती रहेगी ?
ओह ! क्या सोच रहा है वह ? दिमाग की नसें न फट जायें कहीं। उसने झुककर भाभी के पांव छुए और सड़क पर आ गया किन्तु चौंककर पीछे हट गया, सड़क कहाँ है ? यह नहर यहाँ कैसे बह रही है ? ये ट्रैक्टर फिर कैसे प्रगट हो गया ? ये नौजवान जीरा क्यों गा रहा है ? सिर पकड़ कर वहीं बैठ गया वह।
सड़क पर खड़ा ट्रैक्टर तेजी से उसके सामने से गुजर गया। उसने ध्यान से देखा, नहर नहीं सड़क ही है। ट्रैक्टर पर बैठा नौजवान जीरा नहीं मोरिया गा रहा है —
मोरिया आखो बोल्यो रे
ढलती रात रा
मोरिया पीऊ पीऊ की वाणी छोड़ दे
म्हारे हिंवड़ा में वै गई रे कटार
मोरिया आखो बोल्यो रे ढलती रात ने
– मोरिया कहानी के लेखक डॉ. मोहनलाल गुप्ता राजस्थान साहित्य अकादमी की सरस्वती सभा के सदस्य रहे हैं।
मोरिया कहानी देखे हुए दिन कहानी संग्रह से ली गई है जिसे प्रोडक्ट कैटेगरी उपन्यास, कहानी, नाटक में देखा जा सकता है।
मोरिया – कहानी समीक्षा | Moriya – Story Review
भूमिका
डॉ. मोहनलाल गुप्ता के कहानी संग्रह ‘देखे हुए दिन’ की कहानी ‘मोरिया’ भारतीय पारिवारिक संबंधों, विरासत, संवेदनात्मक टूटन, सामाजिक मूल्यों के क्षरण तथा मनुष्य की आंतरिक पीड़ा का अत्यंत मार्मिक चित्रण प्रस्तुत करती है। यह कहानी केवल एक व्यक्ति की मृत्यु की कथा नहीं, बल्कि उस पूरे भाव-जगत के विघटन की कथा है जिसमें परिवार, विश्वास, त्याग, अधिकार और स्मृतियाँ एक-दूसरे से उलझी हुई हैं।
‘मोरिया’ एक ऐसी कहानी है जो पाठक को भीतर तक झकझर देती है। इसमें मृत्यु, स्मृति, संबंधों की जटिलता और जीवन की कटु सच्चाइयाँ अत्यंत प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत हुई हैं।
कहानी का मुख्य कथानक
बनवारीलालजी की अंतिम घड़ियाँ
कहानी की शुरुआत बनवारीलालजी के हृदयाघात (हार्ट अटैक) से होती है। उसी दिन उनकी बेटी रेखा का विवाह है। एक ओर घर में बारात के स्वागत की तैयारियाँ हैं, दूसरी ओर घर का मुखिया मृत्यु से संघर्ष कर रहा है। यह विरोधाभास कहानी को अत्यंत तीव्र भावात्मक धरातल प्रदान करता है।
बनवारीलालजी अपनी अंतिम घड़ियों में अपने छोटे भाई कांति को बुलाते हैं। वे अपने मन का सबसे बड़ा बोझ—चाची के जेवरों और कांति के साथ हुए अन्याय को उतारना चाहते हैं।
कांति और बनवारीलालजी का संबंध
कांति केवल छोटा भाई नहीं, बल्कि बनवारीलालजी के लिए पुत्र, भाई और आत्मीय साथी है। माता-पिता के अभाव में बनवारीलालजी ने ही उसे पाला-पोसा। लेकिन संपत्ति और जेवरों के विवाद ने दोनों भाइयों के बीच दूरी पैदा कर दी।
अस्पताल में मृत्यु से पहले बनवारीलालजी का पश्चाताप और कांति का भावनात्मक समर्पण कहानी का सबसे शक्तिशाली पक्ष है।
मृत्यु के बाद का वास्तविक चेहरा
बनवारीलालजी की मृत्यु के बाद जेवरों को लेकर परिवार में जो विवाद उत्पन्न होता है, वह आधुनिक पारिवारिक संबंधों की वास्तविकता को उजागर करता है। बेटे मनोज और सूरज, बहुएँ, और स्वयं मायादेवी—सभी संबंधों की बजाय स्वार्थ की भाषा बोलते दिखाई देते हैं।
यहीं कहानी अपने चरम पर पहुँचती है।
कहानी की पृष्ठभूमि
ग्रामीण संस्कृति और शहरी संक्रमण
कहानी की पृष्ठभूमि में राजस्थान का ग्रामीण जीवन, लोकगीत, पारिवारिक संरचना, खेत-खलिहान, विरासत, नहर, ट्रैक्टर, चाची का संघर्ष और लोक-संस्कृति की गहरी छाप दिखाई देती है।
‘जीरा’ और ‘मोरिया’ जैसे लोकगीत केवल गीत नहीं, बल्कि जीवन-दर्शन के प्रतीक बन जाते हैं।
मोरिया का प्रतीकात्मक अर्थ
‘मोरिया’ केवल एक लोकगीत नहीं है, बल्कि जीवन की संध्या, अंत, विरह और अंतिम पुकार का प्रतीक है।
जहाँ “जीरा” जीवन की ऊर्जा और उत्साह का प्रतिनिधित्व करता है, वहीं “मोरिया” ढलती रात, अंत और बिछोह का संकेत देता है।
अंतिम दृश्य में मोरिया गीत का पुनः सुनाई देना कहानी को अत्यंत गहन प्रतीकात्मकता प्रदान करता है।
भाषा-शैली
सहज, प्रवाहमयी और संवेदनात्मक भाषा
डॉ. मोहनलाल गुप्ता की भाषा अत्यंत सरल, सहज और प्रभावशाली है। कहानी में कृत्रिमता नहीं, बल्कि जीवन की स्वाभाविकता है।
संवाद इतने जीवंत हैं कि पाठक स्वयं को कथा के भीतर उपस्थित महसूस करता है।
उदाहरणस्वरूप—
- अस्पताल के दृश्य
- मृत्यु के समय की बेचैनी
- जेवरों का विवाद
- चाची की स्मृतियाँ
सभी अत्यंत वास्तविक प्रतीत होते हैं।
लोकभाषा और सांस्कृतिक शब्दावली
कहानी में राजस्थानी परिवेश से जुड़े शब्दों का प्रयोग इसे प्रामाणिकता प्रदान करता है—
- नोहरा
- जीरा
- मोरिया
- चाची
- भईया
- परण्या
- पीळो
ये शब्द कहानी को स्थानीय रंग देते हैं और पाठक को सांस्कृतिक रूप से जोड़ते हैं।
शब्दावली और शिल्प
प्रतीकात्मक और बिंबात्मक प्रयोग
लेखक ने अनेक स्थानों पर अत्यंत सुंदर बिंबों का प्रयोग किया है—
- “लिसौड़े के बीज की तरह आँखों की पुतलियाँ”
- “कनपटियों के नीचे गर्म लावा”
- “ट्रैक्टर का नहर में गिरना”
विशेष रूप से “ट्रैक्टर” पूरी कहानी में संबंधों के टूटने और जीवन के बिखरने का स्थायी प्रतीक बन जाता है।
सामाजिक सरोकार
विरासत बनाम रिश्ते
कहानी का सबसे बड़ा सामाजिक प्रश्न है—क्या विरासत रिश्तों से बड़ी हो सकती है?
जेवरों की छोटी सी पोटली परिवार को बाँट देती है। संबंधों की ऊष्मा संपत्ति की ठंडक में जम जाती है।
बुजुर्गों की उपेक्षा
बेटी के विवाह के बीच पिता की मृत्यु से जूझते रहने का दृश्य आधुनिक समाज की संवेदनहीनता को उजागर करता है।
घर का मुखिया जीवित रहते हुए भी अकेला है।
स्त्री की स्थिति
मायादेवी का चरित्र अत्यंत जटिल है। वह संवेदनशील भी है, व्यावहारिक भी, और बेटों की माँ भी। उसकी विवशता भारतीय गृहिणी की सामाजिक स्थिति को दर्शाती है।
जीवन की सच्चाई से नैकट्य
यथार्थ का प्रखर चित्रण
यह कहानी काल्पनिक नहीं लगती—यह हमारे आसपास घटित होती हुई प्रतीत होती है।
- संपत्ति के विवाद
- बुजुर्गों का अकेलापन
- भाई-भाई के संबंध
- विवाह और मृत्यु का साथ-साथ होना
- अंतिम समय का पश्चाताप
ये सब जीवन की निर्विवाद सच्चाइयाँ हैं।
यही इस कहानी की सबसे बड़ी शक्ति है।
कहानी का संदेश
संबंधों का मूल्य संपत्ति से बड़ा है
कहानी स्पष्ट रूप से यह संदेश देती है कि—
संपत्ति मनुष्य को नहीं बचाती, संबंध बचाते हैं।
जीवन के अंतिम क्षणों में बनवारीलालजी को जेवर नहीं, कांति चाहिए था।
मनुष्य अंततः प्रेम, क्षमा और अपनापन ही खोजता है।
पश्चाताप से पहले संबंध बचा लेना चाहिए
बहुत बार हम जीवन भर अहंकार, स्वार्थ और गलतफहमियों में उलझे रहते हैं। जब तक सत्य समझ आता है, बहुत देर हो चुकी होती है।
‘मोरिया’ यही चेतावनी देती है।
साहित्यिक मूल्यांकन
कहानी की विशेषताएँ
- गहरा भावबोध
- सशक्त कथानक
- यथार्थपरक चरित्र
- उत्कृष्ट प्रतीक योजना
- सामाजिक प्रासंगिकता
- लोक-संस्कृति का सुंदर समावेश
- मार्मिक अंत
यह कहानी हिंदी कहानी साहित्य में पारिवारिक संवेदना और सामाजिक यथार्थ की एक महत्वपूर्ण रचना के रूप में देखी जा सकती है।
निष्कर्ष
‘मोरिया’ केवल एक कहानी नहीं, बल्कि टूटते हुए परिवार, बदलते सामाजिक मूल्यों और मनुष्य की आंतरिक संवेदनाओं का दस्तावेज़ है।
डॉ. मोहनलाल गुप्ता ने अत्यंत सादगी और गहन संवेदनशीलता के साथ यह दिखाया है कि जीवन की सबसे बड़ी त्रासदी मृत्यु नहीं, बल्कि संबंधों का मर जाना है।
कहानी का अंतिम दृश्य—मोरिया गीत, ट्रैक्टर, नहर और कांति का मानसिक विघटन—पाठक के मन में लंबे समय तक गूंजता रहता है।
यह कहानी पढ़ी नहीं जाती—जी जाती है।
और शायद यही किसी महान कहानी की सबसे बड़ी पहचान है।
