जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी - mohanlalgupta.com

जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी: राष्ट्रप्रेम और सांस्कृतिक चेतना का उद्घोष

संस्कृत भाषा का यह श्लोक—“अपि स्वर्णमयी लंका न मे लक्ष्मण रोचते। जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी॥”—मात्र एक काव्य पंक्ति नहीं है, बल्कि यह राष्ट्रवाद, नैतिकता और अपनी जड़ों के प्रति अटूट निष्ठा का वैश्विक घोषणापत्र है।

यह प्रसिद्ध श्लोक सामान्यतः रामायण से संबंधित माना जाता है,

1. जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी : ऐतिहासिक और साहित्यिक संदर्भ

इस श्लोक की पृष्ठभूमि मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्री राम और उनके अनुज लक्ष्मण के बीच के संवाद में निहित है। रावण पर विजय प्राप्त करने के उपरांत, जब लक्ष्मण लंका की भव्यता, उसके स्वर्ण जड़ित महलों और अतुलनीय वैभव को देखते हैं, तो उनके मन में एक क्षण के लिए विचार आता है कि क्यों न इस सुंदर नगरी पर ही शासन किया जाए।

तब श्री राम उन्हें संबोधित करते हुए कहते हैं कि हे लक्ष्मण! भले ही यह लंका सोने की बनी है, लेकिन यह मुझे आकर्षित नहीं करती। माता और जन्मभूमि का स्थान स्वर्ग से भी ऊपर है। एक इतिहासकार की दृष्टि से देखें तो यह प्रसंग यह स्पष्ट करता है कि भारतीय दर्शन में ‘विजय’ का अर्थ ‘साम्राज्य विस्तार’ या ‘संसाधनों का दोहन’ कभी नहीं रहा, बल्कि ‘धर्म की स्थापना’ रहा है।

“जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी”, एक प्रसिद्ध संस्कृत श्लोक का अन्तिम आधा भाग है। यह नेपाल का राष्ट्रीय ध्येयवाक्य भी है। यह श्लोक वाल्मीकि रामायण के कुछ पाण्डुलिपियों में मिलता है, और दो रूपों में मिलता है।

प्रथम रूप : यह श्लोक ‘हिन्दी प्रचार सभा मद्रास’ द्वारा १९३० में सम्पादित संस्करण में आया है। इसमें भारद्वाज, राम को सम्बोधित करते हुए कहते हैं-

मित्राणि धन धान्यानि प्रजानां सम्मतानिव ।

जननी जन्म भूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी ॥

हिन्दी अनुवाद : “मित्र, धन्य, धान्य आदि का संसार में बहुत अधिक सम्मान है। (किन्तु) माता और मातृभूमि का स्थान स्वर्ग से भी ऊपर है।”

दूसरा रूप : इसमें राम, लक्ष्मण से कहते हैं-

अपि स्वर्णमयी लङ्का न मे लक्ष्मण रोचते ।

जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी ॥

यह श्लोक वर्तमान उपलब्ध वाल्मीकि रामायण के प्रामाणिक संस्करणों में नहीं मिलता। विद्वानों के अनुसार यह एक लोकप्रचलित उक्ति है, जो बाद के समय में रामायण की कथा से जुड़ गई।

2. ‘जननी’ और ‘जन्मभूमि’ का अंतर्संबंध

इस विचार के केंद्र में दो शब्द हैं: जननी (माता) और जन्मभूमि (वह भूमि जहाँ जन्म हुआ)। इन दोनों को स्वर्ग से भी श्रेष्ठ बताया गया है।

2.1 जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी – माता का स्थान: प्रथम गुरु और रक्षक

भारतीय परंपरा में माता को साक्षात देवता माना गया है। वह केवल जन्म ही नहीं देती, बल्कि संस्कारों का सिंचन भी करती है। श्री राम का यह कथन रेखांकित करता है कि जिस प्रकार कोई भी सुख-सुविधा अपनी माँ के आंचल की छाया का स्थान नहीं ले सकती, ठीक वैसे ही दुनिया का कोई भी वैभव अपनी मिट्टी की महक की बराबरी नहीं कर सकता।

2.2 जन्मभूमि: अस्तित्व का आधार

जन्मभूमि वह आधार है जहाँ से मनुष्य का व्यक्तित्व आकार लेता है। वहाँ की जलवायु, भाषा, इतिहास और परंपराएँ व्यक्ति के डीएनए में समाहित होती हैं। राजस्थान के इतिहास में तो जन्मभूमि के प्रति यह अनुराग और भी प्रखर रहा है, जहाँ की मिट्टी के लिए हज़ारों वीरों ने हंसते-हंसते अपने प्राण न्योछावर कर दिए।

3. स्वर्णमयी लंका बनाम अयोध्या: भौतिकता बनाम स्वाभिमान

‘स्वर्णमयी लंका’ यहाँ केवल एक स्थान नहीं, बल्कि ‘भौतिक सुखों’ और ‘पराये वैभव’ का प्रतीक है। वहीं अयोध्या, जो उस समय लंका की तुलना में शायद उतनी वैभवशाली न रही हो, ‘स्वत्व’ और ‘कर्तव्य’ का प्रतीक है।

3.1 प्रलोभन का त्याग

आधुनिक संदर्भ में, यह विचार हमें सिखाता है कि अक्सर ऊँचे पैकेजों, सुख-सुविधाओं और विदेशी चकाचौंध के सामने हम अपनी जड़ों को भूल जाते हैं। श्री राम का आदर्श हमें याद दिलाता है कि आत्मनिर्भरता और अपनी संस्कृति का गौरव ही वास्तविक सुख है।

3.2 नैतिकता का उत्थान

श्री राम चाहते तो लंका के सम्राट बन सकते थे, किंतु उन्होंने विभीषण का राज्याभिषेक कर ‘अधिग्रहण’ के स्थान पर ‘न्याय’ को चुना। यह दर्शाता है कि एक महान चरित्र के लिए पराई संपत्ति, चाहे वह सोने की ही क्यों न हो, मिट्टी के समान है।

4. आधुनिक युग में जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी विचार की प्रासंगिकता

4.1 सांस्कृतिक राष्ट्रवाद का सुदृढ़ीकरण

आज के वैश्वीकरण (Globalization) के दौर में जब संस्कृतियाँ आपस में मिल रही हैं, तब अपनी मौलिक पहचान को बचाए रखना एक चुनौती है। “जननी जन्मभूमिश्च” का मंत्र हमें अपनी ऐतिहासिक विरासत, जैसे कि मुग़लकालीन स्थापत्य, राजस्थान के राजघरानों का इतिहास और प्राचीन पांडुलिपियों के संरक्षण की प्रेरणा देता है।

4.2 डिजिटल युग और जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी में निहित राष्ट्रवाद

जैसा कि आज हम AI, डिजिटल साक्षरता और ‘डिजिटल आजादी’ की ओर बढ़ रहे हैं, हमें अपनी तकनीक और सामग्री में अपनी संस्कृति को प्राथमिकता देनी चाहिए। ऐतिहासिक वीडियो श्रृंखलाओं या ऑडियोबुक्स के माध्यम से इन महान विचारों को भावी पीढ़ी तक पहुँचाना समय की माँग है।

5. जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी : एक वैश्विक दर्शन

“स्वर्णमयी लंका न मे रोचते” केवल एक प्राचीन वाक्य नहीं है, बल्कि यह एक जीवन जीने की पद्धति है। यह हमें सिखाता है कि व्यक्ति की उन्नति तभी सार्थक है जब वह अपनी मातृभूमि की उन्नति में सहायक बने। यह श्लोक संकुचित राष्ट्रवाद की बात नहीं करता, बल्कि यह उस प्रेम की बात करता है जो एक पुत्र का अपनी माता के प्रति होता है—निस्वार्थ और अटूट।

अंततः, चाहे हम साहित्यकार हों, इतिहासकार हों या प्रकाशक, हमारा प्रत्येक कार्य हमारी मातृभूमि की सांस्कृतिक गरिमा को बढ़ाने वाला होना चाहिए। श्री राम का यह आदर्श आज भी प्रत्येक भारतीय के हृदय में राष्ट्र-निर्माण की लौ जलाए हुए है।

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