न्याय-वैशेषिक दर्शन में धर्म की अवधारणा - mohanlalgupta.com

न्याय-वैशेषिक दर्शन में धर्म की अवधारणा

यह शोध आलेख न्याय-वैशेषिक दर्शन में धर्म की अवधारणा, मोक्ष, आत्मा, ईश्वर, कर्मफल और अदृष्ट सिद्धांत की विस्तृत व्याख्या प्रस्तुत करता है। भारतीय दर्शन की इस तर्कप्रधान परंपरा का समालोचनात्मक अध्ययन यहाँ किया गया है।

भारतीय दर्शन की परंपरा विश्व की प्राचीनतम और समृद्ध दार्शनिक परंपराओं में से एक है। इस परंपरा में न्याय और वैशेषिक दर्शन का विशेष महत्व है। न्याय दर्शन मुख्यतः तर्क, प्रमाण और ज्ञानमीमांसा पर आधारित है, जबकि वैशेषिक दर्शन पदार्थ, गुण, कर्म और परमाणुवाद की व्याख्या करता है। दोनों दर्शनों का अंतिम उद्देश्य मानव जीवन को सत्यज्ञान के माध्यम से मोक्ष की ओर ले जाना है।

प्रस्तुत आलेख में न्याय-वैशेषिक दर्शन में धर्म की अवधारणा, उसका स्वरूप, मोक्ष से उसका संबंध, आत्मा और ईश्वर की भूमिका तथा कर्म और अदृष्ट सिद्धांतों के माध्यम से धर्म की व्याख्या का विश्लेषण किया गया है। इस अध्ययन में यह स्पष्ट किया गया है कि न्याय-वैशेषिक परंपरा में धर्म केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, अपितु ऐसा सदाचरण है जो आत्मा को अज्ञान, राग-द्वेष और जन्म-मरण के बंधन से मुक्त कर मोक्ष की ओर अग्रसर करता है।

प्रस्तावना

भारतीय षड्दर्शन में न्याय और वैशेषिक दर्शन का महत्वपूर्ण स्थान है। दोनों दर्शन यथार्थ को तर्क और विश्लेषण के माध्यम से समझने का प्रयास करते हैं। न्याय दर्शन के प्रवर्तक महर्षि गौतम हैं, जबकि वैशेषिक दर्शन के प्रवर्तक महर्षि कणाद हैं। दोनों दर्शनों का अध्ययन प्रारंभ में स्वतंत्र रूप से हुआ, परंतु बाद में इनके सिद्धांतों में गहन साम्य के कारण इन्हें संयुक्त रूप से न्याय-वैशेषिक दर्शन कहा जाने लगा।

न्याय-वैशेषिक दर्शन का प्रमुख उद्देश्य मोक्ष की प्राप्ति है। इन दर्शनों के अनुसार मोक्ष तभी संभव है जब मनुष्य सत्यज्ञान प्राप्त करे और धर्मयुक्त आचरण अपनाए। इस प्रकार धर्म इन दोनों दर्शनों का केंद्रीय तत्त्व है। यहाँ धर्म का अर्थ केवल पूजा-पाठ या कर्मकांड नहीं है, अपितु ऐसा आचरण है जो आत्मा के कल्याण का मार्ग प्रशस्त करे।

भारतीय दर्शन में धर्म को मानव जीवन के चार पुरुषार्थों—धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष—में प्रमुख स्थान दिया गया है। न्याय-वैशेषिक परंपरा में धर्म को मोक्ष का साधन माना गया है। धर्म से चित्तशुद्धि होती है, चित्तशुद्धि से ज्ञान प्राप्त होता है और ज्ञान से मोक्ष की प्राप्ति होती है।

न्याय दर्शन में धर्म की अवधारणा

न्याय दर्शन मूलतः तर्कप्रधान दर्शन है। इसका उद्देश्य सत्यज्ञान की प्राप्ति द्वारा मनुष्य को दुःखों से मुक्ति दिलाना है। न्याय दर्शन के अनुसार अज्ञान ही समस्त दुःखों का कारण है। जब मनुष्य वस्तुओं के वास्तविक स्वरूप को जान लेता है, तब वह मोह और बंधन से मुक्त होकर मोक्ष प्राप्त करता है।

महर्षि गौतम के न्यायसूत्र में कहा गया है— ‘धर्मो हि मोक्षसाधनम्।’

अर्थात्- धर्म वही है जो मोक्ष-प्राप्ति का साधन बने। न्याय दर्शन में धर्म को सदाचरण, कर्तव्यपालन और सत्यज्ञान से जोड़ा गया है। धर्म सामाजिक व्यवस्था का नियम नहीं, अपितु आत्मा के कल्याण का साधन है।

न्याय दर्शन के अनुसार मनुष्य के कर्म उसके भविष्य को निर्धारित करते हैं। शुभ कर्म आत्मा को उन्नति की ओर ले जाते हैं, अशुभ कर्म जन्म-मरण के बंधन को दृढ़ करते हैं। इसीलिए न्याय दर्शन में धर्मयुक्त कर्म को विशेष महत्व दिया गया है।

न्याय के अनुसार मोक्ष वह अवस्था है जिसमें आत्मा समस्त दुःखों से मुक्त होकर अपने शुद्ध स्वरूप में स्थित हो जाती है। यह स्थिति सत्यज्ञान और धर्माचरण के माध्यम से प्राप्त होती है।

वैशेषिक दर्शन में धर्म की अवधारणा

वैशेषिक दर्शन पदार्थों के विश्लेषण और परमाणुवाद के लिए प्रसिद्ध है। महर्षि कणाद ने धर्म की परिभाषा देते हुए कहा है— ‘यतोऽभ्युदयनिःश्रेयससिद्धिः धर्मः।’

अर्थात्- जिससे लौकिक सुख (अभ्युदय) और पारलौकिक कल्याण अथवा मोक्ष (निःश्रेयस) की प्राप्ति हो, वही धर्म है।

यह परिभाषा वैशेषिक दर्शन में धर्म की व्यापकता को स्पष्ट करती है। धर्म यहाँ केवल आध्यात्मिक उन्नति का साधन नहीं, अपितु सामाजिक और लौकिक कल्याण का आधार भी है। वैशेषिक दर्शन के अनुसार धर्म मनुष्य को सत्य, अहिंसा, दान, सदाचार और आत्मसंयम की ओर प्रेरित करता है।

वैशेषिक मत में धर्म दो रूपों में कार्य करता है—

  1. दृष्ट धर्म – जो प्रत्यक्ष रूप से शुभ कर्मों के रूप में दिखाई देता है।
  2. अदृष्ट धर्म – जो कर्मों के सूक्ष्म फल के रूप में कार्य करता है।

अदृष्ट की अवधारणा वैशेषिक दर्शन का अत्यंत महत्वपूर्ण पक्ष है। इसके अनुसार मनुष्य के कर्मों का प्रभाव अदृश्य रूप में संचित रहता है और वही भविष्य में सुख-दुःख, जन्म-मरण तथा जीवन की परिस्थितियों को निर्धारित करता है।

धर्म और मोक्ष का संबंध

न्याय-वैशेषिक दर्शन में धर्म का अंतिम उद्देश्य मोक्ष की प्राप्ति है। मोक्ष को निःश्रेयस, अपवर्ग, मुक्ति अथवा निर्वाण जैसे नामों से भी जाना जाता है। इन दर्शनों के अनुसार संसार दुःखमय है और जन्म-मरण का चक्र मनुष्य को निरंतर बंधन में रखता है।

न्याय दर्शन के अनुसार मोक्ष का स्वरूप दुःखों की पूर्ण निवृत्ति है। जब आत्मा अज्ञान, राग, द्वेष और कर्मबंधनों से मुक्त हो जाती है, तब वह अपने शुद्ध स्वरूप को प्राप्त करती है। न्यायसूत्र में कहा गया है—

दुःखजन्यप्रवृत्तिदोषमिथ्याज्ञानानामुत्तरॊत्तरापाये तदनन्तरापायादपवर्गः।”

अर्थात्- मिथ्या ज्ञान, दोष और प्रवृत्तियों के नाश से दुःख समाप्त होते हैं और अंततः मोक्ष की प्राप्ति होती है।

वैशेषिक दर्शन में भी मोक्ष को आत्मा की पूर्ण शुद्ध अवस्था माना गया है। धर्म आत्मा को शुभ कर्मों और सदाचार की दिशा में प्रेरित करता है, जिससे आत्मा क्रमशः बंधनों से मुक्त होती जाती है।

इस प्रकार धर्म, ज्ञान और मोक्ष—ये तीनों न्याय-वैशेषिक दर्शन में परस्पर जुड़े हुए तत्त्व हैं। धर्म के बिना ज्ञान संभव नहीं और ज्ञान के बिना मोक्ष प्राप्त नहीं हो सकता।

न्याय-वैशेषिक दर्शन में आत्मा का स्वरूप

न्याय-वैशेषिक दर्शन में आत्मा को नित्य, सर्वव्यापक और स्वतंत्र सत्ता माना गया है। आत्मा चेतन सत्ता है, किंतु ज्ञान उसका स्वाभाविक गुण नहीं, अपितु मन और इंद्रियों के संयोग से उत्पन्न होने वाला गुण है।

न्याय दर्शन के अनुसार आत्मा दो प्रकार की होती है—

  1. परमात्मा
  2. जीवात्मा

परमात्मा सर्वज्ञ, सर्वशक्तिमान और नित्य है। वह समस्त जगत का नियामक है। जीवात्मा प्रत्येक प्राणी में विद्यमान है और कर्म तथा अज्ञान के कारण जन्म-मरण के चक्र में बंधी रहती है।

आत्मा के गुणों में इच्छा, द्वेष, सुख, दुःख, प्रयत्न और ज्ञान प्रमुख हैं। जब आत्मा अज्ञान और कर्मबंधनों से मुक्त हो जाती है, तब वह अपने वास्तविक स्वरूप को प्राप्त करती है। यही मोक्ष की अवस्था है।

अन्नंभट्ट ने अपने ग्रंथ ‘तर्कसंग्रह’ में आत्मा को ज्ञान का आश्रय बताते हुए कहा है— ज्ञानाधिकरणमात्मा।”

अर्थात्- आत्मा ही ज्ञान का आधार है।

न्याय-वैशेषिक दर्शन में ईश्वर की अवधारणा

न्याय-वैशेषिक दर्शन ईश्वर को जगत का नियामक और कारण मानता है। वैशेषिक दर्शन के अनुसार संसार परमाणुओं से निर्मित है, किंतु इन परमाणुओं की गति और संगठन स्वतः नहीं होता। इसके पीछे ईश्वर की इच्छा और अदृष्ट शक्ति कार्य करती है।

ईश्वर सर्वज्ञ, सर्वव्यापक और नित्य सत्ता है। वह जीवों के कर्मों के अनुसार उन्हें फल प्रदान करता है। सृष्टि, स्थिति और प्रलय की प्रक्रिया ईश्वर के नियंत्रण में होती है।

वैशेषिक दर्शन का परमाणुवाद पाश्चात्य भौतिकवादी परमाणुवाद से भिन्न है। यहाँ परमाणुओं के साथ-साथ आत्मा, ईश्वर और कर्मफल की नैतिक व्यवस्था को भी स्वीकार किया गया है। इस प्रकार न्याय-वैशेषिक दर्शन भौतिक और आध्यात्मिक दोनों पक्षों का समन्वय प्रस्तुत करता है।

अदृष्ट की अवधारणा और कर्मफल सिद्धांत

न्याय-वैशेषिक दर्शन में अदृष्ट की अवधारणा अत्यंत महत्वपूर्ण है। अदृष्ट का अर्थ है—कर्मों का अदृश्य फल। मनुष्य जो भी कर्म करता है, उसका प्रभाव सूक्ष्म रूप में संचित रहता है और भविष्य में सुख-दुःख के रूप में प्रकट होता है।

यह सिद्धांत नैतिक व्यवस्था को दार्शनिक आधार प्रदान करता है। यदि शुभ कर्म किए जाएँ तो उनका फल सुख और उन्नति के रूप में मिलता है, जबकि अशुभ कर्म दुःख और पतन का कारण बनते हैं।

अदृष्ट की व्यवस्था ईश्वर के नियंत्रण में मानी गई है। ईश्वर जीवों के कर्मों के अनुसार उन्हें उचित फल प्रदान करता है। इस प्रकार न्याय-वैशेषिक दर्शन कर्म और नैतिक उत्तरदायित्व को अत्यंत गंभीरता से ग्रहण करता है।

परमाणुवाद की अवधारणा और धर्म

वैशेषिक दर्शन का एक प्रमुख सिद्धांत परमाणुवाद है। इसके अनुसार संसार के समस्त भौतिक पदार्थ सूक्ष्म परमाणुओं से निर्मित हैं। पृथ्वी, जल, अग्नि और वायु के परमाणुओं के संयोग से संसार की रचना होती है।

हालाँकि वैशेषिक दर्शन का परमाणुवाद केवल भौतिकवादी नहीं है। इसमें परमाणुओं के साथ आत्मा, ईश्वर, धर्म और कर्मफल को भी स्वीकार किया गया है। इसलिए यह दर्शन भौतिक और आध्यात्मिक दोनों स्तरों पर यथार्थ की व्याख्या करता है।

पाश्चात्य परमाणुवाद जहाँ केवल पदार्थ और प्राकृतिक नियमों पर आधारित है, वहीं वैशेषिक परमाणुवाद नैतिक और आध्यात्मिक सिद्धांतों को भी महत्व देता है। इस प्रकार धर्म वैशेषिक दर्शन में केवल सामाजिक नियम नहीं, अपितु विश्वव्यापी नैतिक व्यवस्था का अंग बन जाता है।

न्याय-वैशेषिक दर्शन की नैतिक दृष्टि

न्याय-वैशेषिक दर्शन की नैतिकता कर्म और उत्तरदायित्व पर आधारित है। मनुष्य अपने कर्मों के लिए स्वयं उत्तरदायी है। उसके शुभ और अशुभ कर्म ही उसके भविष्य और मोक्ष की दिशा निर्धारित करते हैं।

इन दर्शनों के अनुसार नैतिक जीवन का आधार सत्य, अहिंसा, संयम, दान और सदाचार है। धर्म मनुष्य को आत्मसंयम और विवेक की ओर प्रेरित करता है। यह केवल बाह्य आचरण नहीं, अपितु आंतरिक शुद्धि का साधन है।

न्याय-वैशेषिक मत में धर्म का उद्देश्य व्यक्ति को ऐसा जीवन प्रदान करना है जिसमें वह सत्यज्ञान प्राप्त कर आत्मा के वास्तविक स्वरूप को पहचान सके। यही पहचान उसे मोक्ष की ओर ले जाती है।

वर्तमान समय में न्याय-वैशेषिक धर्मदृष्टि

वर्तमान समय में जब भौतिकवाद और उपभोक्तावाद की प्रवृत्तियाँ बढ़ रही हैं, तब न्याय-वैशेषिक दर्शन की धर्मदृष्टि अत्यंत प्रासंगिक प्रतीत होती है। यह दर्शन मनुष्य को नैतिक जीवन, आत्मसंयम और सत्य के मार्ग पर चलने की प्रेरणा देता है।

आज के समाज में बढ़ती हिंसा, भ्रष्टाचार, स्वार्थ और नैतिक पतन की समस्याओं के समाधान हेतु न्याय-वैशेषिक दर्शन उपयोगी दिशा प्रदान कर सकता है। इसका कर्मफल सिद्धांत मनुष्य को अपने कर्मों के प्रति सजग बनाता है और यह शिक्षा देता है कि प्रत्येक कर्म का परिणाम अवश्य मिलता है।

इसके अतिरिक्त यह दर्शन धर्म को संकीर्ण धार्मिक कर्मकांड से ऊपर उठाकर सार्वभौमिक नैतिक सिद्धांत के रूप में प्रस्तुत करता है। यही इसकी आधुनिक उपयोगिता है।

उपसंहार

निष्कर्षतः कहा जा सकता है कि न्याय-वैशेषिक दर्शन में धर्म की अवधारणा का स्थान अत्यंत महत्वपूर्ण है। यहाँ धर्म धार्मिक अनुष्ठान या सामाजिक नियम नहीं, अपितु आत्मकल्याण और मोक्ष का साधन है। न्याय दर्शन धर्म को सत्यज्ञान और मोक्ष से जोड़ता है, जबकि वैशेषिक दर्शन धर्म को लौकिक और पारलौकिक कल्याण का आधार मानता है।

इन दर्शनों में आत्मा, ईश्वर, कर्म और अदृष्ट की अवधारणाएँ परस्पर संबंधित हैं। धर्म मनुष्य को शुभ कर्मों, सदाचार और आत्मसंयम की ओर प्रेरित करता है। इसके माध्यम से आत्मा अज्ञान और बंधनों से मुक्त होकर मोक्ष प्राप्त करती है।

न्याय-वैशेषिक दर्शन की विशेषता यह है कि यह तर्क, नैतिकता और आध्यात्मिकता का सुंदर समन्वय प्रस्तुत करता है। आज के समय में भी इसकी शिक्षाएँ मानव समाज को नैतिक और आध्यात्मिक दिशा प्रदान करने में सक्षम हैं।

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