हरिहर की अवधारणा - mohanlalgupta.com

हरिहर की अवधारणा

हरिहर की अवधारणा का स्पष्ट दार्शनिक आधार यह है कि ईश्वर अमूर्त से मूर्त हुआ। हिरण्यगर्भ ब्रह्म ही समस्त सृष्टि का आधार है किंतु पहले वह स्वयं अमूर्त से मूर्त हुआ। उसने अदृश्य ब्रह्म से दृश्य ब्रह्मा, दृश्य विष्णु एवं दृश्य शिव का रूप धारण किया। वस्तुतः ये एक ही शक्ति के विविध स्वरूप हैं जो सृष्टि की उत्पत्ति, पालन, संहार एवं पुनर्निर्माण के चक्र का निर्माण करते हैं।

वैदिक काल से लेकर पौराणिक काल तक जैसे-जैसे अमूर्त ईश्वर की अवधारणा मूर्त रूप धारण करती चली गई वैसे-वैसे, न केवल लोकमान्यताओं में अपितु शास्त्रीय मान्यताओं में भी ईश्वर के विविध स्वरूपों की कल्पना स्थापित एवं दृढ़ होती चली गई। ये विविध स्वरूप ही देवता कहलाए। यही कारण है कि वैदिक देवताओं एवं पौराणिक देवताओं की दार्शनिक व्याख्याओं में अंतर स्पष्ट दिखाई देता है।

भारतीय धार्मिक और सांस्कृतिक परंपरा में हरिहर की अवधारणा अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान रखती है। ‘हरि’ अर्थात विष्णु और ‘हर’ अर्थात शिव—इन दोनों देवताओं के संयुक्त स्वरूप को ‘हरिहर’ कहा जाता है। लोकमान्यता है कि मध्यकाल में शैव और वैष्णव संप्रदायों के मतभेदों और प्रतिस्पर्धा को समाप्त करने के उद्देश्य से ‘हरिहर’ की कल्पना की गई किंतु यह मान्यता सही नहीं है क्योंकि हरिहर की अवधारणा का आधार केवल संप्रदायगत समन्वय नहीं, अपितु भारतीय दार्शनिक चिंतन में निहित ‘एकेश्वरवाद’, सृष्टि-चक्र और सृजन-विनाश के अद्वैत सिद्धांत से भी जुड़ा हुआ है।

प्रस्तुत आलेख में हरिहर की उत्पत्ति, पौराणिक आधार, दार्शनिक पृष्ठभूमि, शैव-वैष्णव समन्वय, मूर्तिकला एवं मंदिर स्थापत्य में उसके स्वरूप भारत के विभिन्न क्षेत्रों में प्राप्त हरिहर प्रतिमाओं का विस्तृत अध्ययन प्रस्तुत किया गया है।

प्रस्तावना

भारतीय संस्कृति में हरिहर की अवधारणा गहन दार्शनिक, सांस्कृतिक और सामाजिक चिंतन का प्रतिनिधित्व करती है। शिव और विष्णु भारतीय धर्म परंपरा के दो प्रमुख देवता हैं। इनके उपासकों के मध्य श्रेष्ठता को लेकर मतभेद है, जो विभिन्न कालों में साम्प्रदायिक स्वरूप भी ग्रहण करता रहा है।

मध्यकाल में शैव और वैष्णव संप्रदायों के बीच तीव्र वैचारिक प्रतिस्पर्धा दिखाई देती है। शैव उपासक शिव को सृष्टि का मूल कारण और सर्वोच्च सत्ता मानते थे, जबकि वैष्णव उपासक विष्णु को परमेश्वर के रूप में प्रतिष्ठित करते थे।

इन परिस्थितियों में हरिहर की अवधारणा को सामान्यतः दोनों संप्रदायों के समन्वय के प्रयास के रूप में देखा गया किन्तु भारतीय पुराणों, मूर्तिकला और स्थापत्य परंपरा का अध्ययन यह संकेत देता है कि हरिहर की कल्पना केवल धार्मिक समझौते का परिणाम नहीं थी।

इसका मूल भारतीय दर्शन के उस सिद्धांत में निहित है जिसमें सृष्टि, पालन और संहार को एक ही परम सत्ता के विभिन्न रूप माना गया है।

शैव और वैष्णव परंपराओं का वैचारिक संघर्ष

भारतीय धार्मिक इतिहास में शैव और वैष्णव संप्रदायों के मध्य श्रेष्ठता संबंधी विवाद लंबे समय तक विद्यमान रहे। शैव उपासक शिव को सृष्टि का बीज-मूल तत्त्व मानते थे। वे शिव को ही परम सत्ता स्वीकार करते हुए अन्य देवताओं को गौण मानते थे। दूसरी ओर वैष्णव परंपरा में विष्णु को जगत का पालनकर्ता और सर्वोच्च देवता माना गया।

वैष्णव उपासक शिव की महत्ता स्वीकार करते हुए भी उन्हें विष्णु से निम्न स्थान देते थे और शिव से जुड़े तांत्रिक और श्मशान-संबंधी प्रतीकों से दूरी बनाए रखते थे। इस प्रकार दोनों संप्रदायों के बीच धार्मिक और सामाजिक प्रतिस्पर्धा तीव्र होती गई।

समय के साथ यह संघर्ष केवल धार्मिक नहीं रहा, अपितु राजनीतिक स्वरूप भी ग्रहण करने लगा। विभिन्न राजवंश अपने आराध्य देवता को प्रतिष्ठित करने हेतु परस्पर द्वेष करने लगे। वैष्णव शासकों के समय विष्णु को अधिक प्रतिष्ठा प्राप्त होती थी, जबकि शैव शासक शिव परंपरा को बढ़ावा देते थे।

इन परिस्थितियों में हरिहर की अवधारणा को दोनों परंपराओं के समन्वय के प्रतीक के रूप में देखा गया। किंतु यह व्याख्या पूर्ण सत्य नहीं है, क्योंकि हरिहर की अवधारणा पौराणिक साहित्य और मूर्तिकला में शैव-वैष्णव विवादों से पूर्व भी दिखाई देती है।

हरिहर की अवधारणा पौराणिक पृष्ठभूमि

हरिहर की अवधारणा का मूल आधार पुराणों में वर्णित ‘एकेश्वरवाद’ का सिद्धांत है। भारतीय पुराणों में शिव और विष्णु को परस्पर पूरक शक्तियों के रूप में प्रस्तुत किया गया है। अनेक कथाओं में दोनों देवताओं को सृष्टि के मूल कारण और एक ही परम सत्ता के विभिन्न रूपों के रूप में चित्रित किया गया है।

एक प्रसिद्ध कथा के अनुसार ब्रह्मा और विष्णु में श्रेष्ठता को लेकर विवाद उत्पन्न हुआ। उसी समय शिव अनंत ज्योतिर्लिंग के रूप में प्रकट हुए और दोनों को उसके आदि और अंत की खोज करने की चुनौती दी। न तो ब्रह्मा और न ही विष्णु उस ज्योतिर्लिंग का अंत खोज सके। अंततः दोनों ने शिव की महत्ता स्वीकार की। इस कथा का उद्देश्य किसी देवता की श्रेष्ठता स्थापित करना नहीं, अपितु यह दर्शाना है कि समस्त शक्तियाँ एक ही परम तत्त्व की अभिव्यक्तियाँ हैं।

इसी प्रकार शिव और विष्णु से संबंधित अनेक कथाएँ यह सिद्ध करती हैं कि दोनों देवताओं को सृष्टि, पालन और संहार की परस्पर पूरक शक्तियों के रूप में देखा गया।

हरिहर की अवधारणा – दार्शनिक पृष्ठभूमि

भारतीय दर्शन में सृष्टि को निरंतर चलने वाली प्रक्रिया माना गया है। हरिहर की अवधारणा में सृजन, पालन और संहार—ये तीनों परस्पर जुड़े हुए तत्त्व हैं। शिव और विष्णु इन्हीं शक्तियों के प्रतीक हैं।

विष्णु को पालनकर्ता माना जाता है। वे संसार की व्यवस्था और जीवन के संरक्षण का कार्य करते हैं। इसके विपरीत शिव विनाश और पुनर्सृजन दोनों के देवता हैं। वे ‘महाकाल’ भी हैं और ‘मृत्युंजय’ भी। विनाश के माध्यम से ही नई सृष्टि का मार्ग प्रशस्त होता है।

शैव चिंतकों के अनुसार सृष्टि का मूल आधार ‘लिंग’ है। लिंग केवल शिव का प्रतीक नहीं, अपितु सृजन-शक्ति का दार्शनिक प्रतीक है। भारतीय चिंतन में लिंग और योनि के संयोग को सृष्टि के मूल तत्त्व के रूप में देखा गया है। इस प्रकार हरिहर की अवधारणा सृष्टि के मूल त्रिविध चक्र—सृजन, पालन और संहार—का प्रतीक बन जाती है।

शिवपुराण में शिव को ‘बीज’ और विष्णु को ‘क्षेत्र’ कहा गया है। बीज और क्षेत्र के संयोग से ही सृष्टि संभव होती है। इस प्रकार हरिहर की अवधारणा भारतीय दार्शनिक चिंतन में पुरुष और प्रकृति के समन्वय का भी प्रतीक है।

हरिहर की अवधारणा और अर्धनारीश्वर

भारतीय शिल्पकला में ‘हरिहर’ और ‘अर्धनारीश्वर’ दोनों अवधारणाएँ समानांतर रूप से विकसित हुईं। अर्धनारीश्वर में शिव और पार्वती का संयुक्त स्वरूप दिखाई देता है, जबकि हरिहर में शिव और विष्णु का संयुक्त रूप प्रस्तुत किया जाता है।

दोनों अवधारणाएँ सृष्टि के संतुलन और समन्वय की प्रतीक हैं। अर्धनारीश्वर पुरुष और प्रकृति के संयोग का प्रतिनिधित्व करता है, जबकि हरिहर सृजन, पालन और संहार की एकीकृत शक्ति का प्रतीक बनता है।

इस प्रकार भारतीय कला और दर्शन में विभिन्न शक्तियों को विरोधी नहीं, अपितु पूरक रूप में देखने की परंपरा है।

हरिहर की मूर्तिकला और स्थापत्य

भारतीय मूर्तिकला में हरिहर प्रतिमाओं का निर्माण प्राचीन काल से होता रहा है। प्रारंभिक हरिहर प्रतिमाएँ कुषाण काल में निर्मित मानी जाती हैं। विदिशा, मथुरा, प्रयाग और अन्य क्षेत्रों से प्राप्त प्रतिमाएँ यह सिद्ध करती हैं कि यह अवधारणा शैव-वैष्णव संघर्ष से पूर्व ही प्रचलित थी।

हरिहर प्रतिमाओं में सामान्यतः शरीर का एक भाग शिव तथा दूसरा भाग विष्णु के रूप में निर्मित किया जाता है। शिव पक्ष में जटा, त्रिशूल, सर्प, डमरू और नंदी जैसे प्रतीक होते हैं, जबकि विष्णु पक्ष में मुकुट, चक्र, शंख, गदा और गरुड़ के चिह्न अंकित किए जाते हैं।

‘विष्णुधर्मोत्तर पुराण’ में हरिहर प्रतिमाओं के स्वरूप का विस्तृत वर्णन है। इसके अनुसार प्रतिमा के दाहिने भाग में शिव तथा बाएँ भाग में विष्णु का अंकन किया जाना चाहिए। शिव के हाथों में त्रिशूल और डमरू तथा विष्णु के हाथों में चक्र और कमल प्रदर्शित किए जाने चाहिए।

प्रतिहार काल और हरिहर प्रतिमाएँ

प्रतिहार काल (आठवीं से दसवीं शताब्दी ईस्वी) में हरिहर प्रतिमाओं के निर्माण को विशेष प्रोत्साहन मिला। इसका उद्देश्य शैव और वैष्णव संप्रदायों के मध्य विरोध को कम करना भी था। इस काल की मूर्तियों में कलात्मक परिपक्वता और दार्शनिक गहराई दोनों दिखाई देती हैं।

ग्वालियर के तेली मंदिर, राजस्थान, उज्जैन, उदयपुर और जयपुर क्षेत्र से प्राप्त हरिहर प्रतिमाएँ प्रतिहार कला की उत्कृष्ट उदाहरण हैं। इन प्रतिमाओं में शिव और विष्णु के चिह्नों का अत्यंत सूक्ष्म और संतुलित समन्वय दिखाई देता है।

कुछ प्रतिमाओं में हरिहर के साथ ब्रह्मा, नंदी, गरुड़ और अन्य देवताओं का भी अंकन किया गया है। इससे स्पष्ट होता है कि हरिहर को केवल संयुक्त देवता के रूप में नहीं, अपितु संपूर्ण सृष्टि-व्यवस्था के केंद्र के रूप में देखा गया।

राजस्थान में हरिहर परंपरा

राजस्थान के मंदिर स्थापत्य में हरिहर प्रतिमाओं की विशेष उपस्थिति मिलती है। जयपुर, ओसियां, जगत, ग्वालियर और कोटा क्षेत्रों से प्राप्त मूर्तियाँ इस परंपरा की समृद्धि को दर्शाती हैं।

जयपुर के जयगढ़ स्थित हरिहर मंदिर की प्रतिमाएँ विशेष उल्लेखनीय हैं। इन प्रतिमाओं में शिव और विष्णु के संयुक्त स्वरूप को अत्यंत कलात्मक ढंग से प्रस्तुत किया गया है। मूर्तियों में चक्र, शंख, त्रिशूल, माला, नंदी और गरुड़ जैसे प्रतीकों का सूक्ष्म अंकन किया गया है।

ओसियां के हरिहर मंदिर में शिव के मुख में मत्स्यावतारी विष्णु का अंकन अत्यंत अद्वितीय है। इसी प्रकार उदयपुर और जगत क्षेत्र की प्रतिमाओं में हरिहर और वैकुण्ठ विष्णु के सम्मिलित रूप दिखाई देते हैं।

राजस्थान की इन प्रतिमाओं में केवल धार्मिक भावना ही नहीं, अपितु उच्च कोटि की शिल्पकला और स्थापत्य सौंदर्य भी परिलक्षित होता है। संगमरमर और पत्थर पर की गई सूक्ष्म नक्काशी भारतीय मूर्तिकारों की अद्भुत कला-कौशल का परिचय देती है।

हरिहर की कलात्मक विशेषताएँ

हरिहर प्रतिमाओं की सबसे बड़ी विशेषता संतुलन और समन्वय है। मूर्तियों में दोनों देवताओं की विशेषताओं को समान महत्व दिया जाता है।

शिव पक्ष में जटाजूट, त्रिशूल, सर्प और नंदी का अंकन होता है, जबकि विष्णु पक्ष में मुकुट, चक्र, शंख और गरुड़ की उपस्थिति दिखाई देती है। कई प्रतिमाओं में दोनों पक्षों के बीच सूक्ष्म शैलीगत अंतर भी दर्शाए गए हैं।

प्रतिहार और मध्यकालीन मूर्तियों में आभूषणों, वस्त्रों और केश-विन्यास का अत्यंत सुंदर अंकन मिलता है। मूर्तियों के प्रभामंडल, पद्मपीठ और पार्श्व प्रतिमाओं में भी उत्कृष्ट कलात्मकता दिखाई देती है।

हरिहर प्रतिमाएँ केवल धार्मिक प्रतीक नहीं, अपितु भारतीय कला में समन्वयवादी दृष्टिकोण की अभिव्यक्ति हैं।

हरिहर और भारतीय सांस्कृतिक समन्वय

भारतीय संस्कृति की प्रमुख विशेषता समन्वय रही है। यहाँ विरोधी प्रतीत होने वाले सिद्धांतों को भी एक व्यापक दृष्टि में समाहित करने का प्रयास किया गया। हरिहर की अवधारणा इसी सांस्कृतिक चेतना का परिणाम है।

यह अवधारणा यह संदेश देती है कि शिव और विष्णु में कोई वास्तविक विरोध नहीं है। दोनों एक ही परम सत्य के विभिन्न रूप हैं। सृष्टि, पालन और संहार एक ही सार्वभौमिक प्रक्रिया के अंग हैं।

हरिहर प्रतिमाएँ धार्मिक सहिष्णुता, दार्शनिक उदारता और सांस्कृतिक समन्वय का प्रतीक बनकर भारतीय समाज को एकता का संदेश देती हैं।

उपसंहार

निष्कर्षतः कहा जा सकता है कि भारतीय मंदिर स्थापत्य में ‘हरिहर’ की अवधारणा केवल शैव और वैष्णव संप्रदायों के मध्य समझौते का प्रतीक नहीं है, अपितु यह भारतीय दर्शन, धर्म और कला की गहन समन्वयवादी चेतना की अभिव्यक्ति है।

हरिहर की अवधारणा सृष्टि, पालन और संहार के त्रिविध सिद्धांत को एकीकृत रूप में प्रस्तुत करती है। पुराणों, मूर्तिकला और स्थापत्य में इसका विकास भारतीय चिंतन की व्यापकता को दर्शाता है।

भारतीय मूर्तिकारों और स्थापत्यकारों ने हरिहर प्रतिमाओं के माध्यम से धार्मिक और दार्शनिक विचारों को अत्यंत कलात्मक ढंग से मूर्त रूप प्रदान किया। राजस्थान और भारत के विभिन्न क्षेत्रों में प्राप्त हरिहर प्रतिमाएँ इस समृद्ध परंपरा की साक्षी हैं।

आज भी हरिहर की अवधारणा भारतीय संस्कृति की उस उदार चेतना का प्रतीक है, जो विविधता में एकता और विरोध में समन्वय की भावना को प्रतिष्ठित करती है।

भारतीय धर्म परम्परा पर आधारित अन्य आलेख-

न्याय-वैशेषिक दर्शन में धर्म की अवधारणा

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *