कृत्तिवास रामायण (Krittivas Ramayan) को श्रीरामपांचाली (Shrirampanchali) भी कहा जाता है। बंगाल में इस ग्रंथ को बांग्ला रामायण (Bangla Ramayan) के नाम से भी प्रसिद्धि प्रात्त है। इस ग्रंथ की रचना 15वीं शताब्दी ईस्वी में बांग्ला कवि कृत्तिवास ओझा अथवा कीर्तिवास ओझा ने की।
यह बंगाल में रामकथा का प्रमुख और लोकप्रिय ग्रंथ है। इस ग्रंथ का लेखन गोस्वामी तुलसीदास की रामचरित मानस से एक शताब्दी पहले हुआ। कृत्तिवास रामायण का लेखन उस समय हुआ जब बंगाल में वैष्णव भक्ति आंदोलन अपने चरम पर था।
कृत्तिवास रामायण में बांग्ला संस्कृति, रीति-रिवाज और भाषा का समावेश है। मूलतः वाल्मीकि रामायण (Valmiki Ramayana) पर आधारित होते हुए भी इसमें बंगाली समाज और लोककथाओं का समावेश हुआ है। इस ग्रंथ में भक्ति, नैतिकता और लोकधर्म का प्राचुर्य है।
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बांग्ला भाषा में सृजन परम्परा
बांग्ला भाषा का उद्भव (Bangla Bhasha Ka Udbhav) नौवीं शताब्दी ईस्वी में हुआ। यह संसार की सबसे बड़ी भाषाओं में से एक है। इसे बोलने वालों की संख्या लगभग 23 करोड़ है तथा विश्व भर की भाषाओं में यह छठे सबसे बड़े भाषाई समुदाय का निर्माण करती है। बांग्ला भाषा बंगाल, उड़ीसा, आसाम, त्रिपुरा, बिहार एवं बांग्लादेश आदि क्षेत्रों पर प्रभाव रखती है।
गौड़ीय पालवंश और मध्यकालीन राम-साहित्य
बंगाल में गौड़ीय पालवंश के शासक हारवर्ष की प्रेरणा से कवि अभिनन्दन ने नौवीं शताब्दी ई. पूर्वार्द्ध में ‘रामचरित’ नामक ग्रंथ की रचना की थी। इसके 36 सर्गों में वाल्मीकि रामायण (4/27 तथा 6/77) में वर्णित राम-लक्ष्मण के प्रस्रवण पर्वत के वर्षा-निवास से लेकर कुंभ-निकुंभ-वध तक की कथा मिलती है।
भीम नामक एक बांग्ला कवि ने चार सर्गों का परिशिष्ट लिखकर युद्धकांड की कथावस्तु पूरी की। इसके पश्चात 15वीं शताब्दी में ‘ कृत्तिवास रामायण ’ लिखी गई। इसे उत्तर भारत में प्रथम संस्कृतेतर रामायण माना जाता है।
शाक्तमत का प्रभाव और अद्भुत रामायण की लोकप्रियता
17वीं शताब्दी ईस्वी में बांग्ला भाषा में ‘रामलीलापदावलियाँ’, ‘आश्चर्यरामायण’ अथवा ‘अद्भुताश्चर्य रामायण’ लिखी गईं। इनमें सीता स्वयं ही देवी का रूप धारण कर लंकापति रावण के बड़े भाई सहस्रकन्ध रावण का संहार करती हैं।
11वीं-12वीं शताब्दी में बंगाल में शाक्तमत अथवा देवी उपासना अत्यंत लोकप्रिय हो गई थी, संभवतः इसी कारण बंगाल में सीता को असुर संहारक देवी के रूप में प्रतिष्ठित करने वाली अद्भुत रामायण अधिक लोकप्रिय हुई। इसी समय की चन्द्रावती की ‘रामायणगाथा’ भी प्रसिद्ध ग्रंथ है।
अर्वाचीन बंगाली राम-साहित्य में रामानन्द कृत ‘रामलीला’ अद्भुतरामायण पर आधारित है। ‘रामभक्तिरसामृत’ भी अद्भुत रामायण पर आधारित है। 18वीं शती के शंकर चक्रवर्ती द्वारा लिखित ‘अध्यात्मरामायणपांचाली’ ‘विष्णुपुरीरामायण’ के नाम से विख्यात है।
बंगाली राम-साहित्य की विविध कृतियाँ
बांग्ला भाषा में लिखित ‘अंगदेर रायवार’ (दौत्य कार्य), रामकवि भूषण का ‘अंगद रायवार’, रामचन्द्र का ‘विभीषणेर रायवार’, काशीराम का ‘कालनेमिर रायवार’, द्विज तुलसी का ‘अंगदरायवार’, हाराधन दास का ‘अंगदरायवार’ तथा रामनारायण का ‘विभीषणेर खोट्टा रायवार’ प्रसिद्ध रामकथा ग्रंथ हैं।
रघुनन्दन गोस्वामी द्वारा ई.1831 में लिखित बांग्ला ग्रंथ ‘रामरसायन’ को सर्वश्रेष्ठ रामकथा बांग्ला ग्रंथ माना जाता है। इसका प्रधान आधार वाल्मीकि रामायण है, परन्तु इस ग्रंथ में वर्णित राम पर कृष्णलीला का भी प्रभाव है। 19वीं तथा 20वीं शताब्दी में वाल्मीकि रामायण का बांग्ला भाषा में अनुवाद हुआ तथा रामकथा पर मौलिक रचनाएं भी हुईं। इन ग्रंथों में मधुसूदनकृत ‘मेघनादवध’ प्रशंसनीय है। इस प्रकार बांग्ला भाषा में रामकथा विषयक लगभग 25 महत्वपूर्ण कृतियां उपलब्ध हैं।
पांचाली शैली और उसका साहित्यिक महत्व
श्रीरामपांचाली नामकरण का आधार
बांग्ला रामकथाओं में कृत्तिवास रामायण सर्वाधिक लोकप्रिय है इस कारण इसे संपूर्ण बंगाल की प्रतिनिधि रामकथा के रूप में बांग्ला रामायण अथवा बंगाली रामायण भी कहा जाता है। बंगाल में अधिकांश हिन्दू परिवारों में इस रामायण का बड़ी श्रद्धा से गायन एवं पाठ किया जाता है। कृत्तिवास रामायण का दूसरा नाम ‘श्रीरामपांचाली’ है।
मान्यता है कि इस ग्रंथ का मूल नाम श्रीरामपांचाली ही है जो लेखक के नाम पर कृत्तिवास रामायण नाम से प्रचलित हुआ। ग्रंथ के शीर्षक में प्रयुक्त पांचाली शब्द संस्कृत काव्य शास्त्र के रीति सम्प्रदाय से संबंधित है जिसमें रीति को मार्ग भी कहा गया है। रीति या मार्ग से तात्पर्य काव्य सृजन में प्रयुक्त रचना-शैली अथवा रचना-पद्धति से है। संस्कृत काव्यशास्त्र में मुख्य रूप से वैदर्भी, गौड़़ी और पांचाली रीतियां वर्णित हैं जिनका सम्बन्ध क्रमशः तत्कालीन विदर्भ, गौड़़ एवं पांचाल जनपदों से है।
पांचाली रीति की भाषिक विशेषताएँ
वैदर्भी रीति लगभग समास रहित होती है जबकि गौड़़ी रीति में समास का बाहुल्य होता है। पांचाली रीति न तो वैदर्भी रीति की भांति समास रहित होती है, और न ही गौड़़ी की भांति समास-जटिल होती है। यह मध्यममार्गी है। इसमें छोटे-छोटे समास मिलते हैं। इस रीति से काव्य भावपूर्ण और मर्मस्पर्शी बनता है। अनुस्वार का प्रयोग न होने से यह वैदर्भी की तुलना में अधिक माधुर्ययुक्त होती है। इसे आख्यान काव्य की रचना हेतु सर्वाधिक उपयुक्त रीति माना जाता है। इस तरह श्रीरामपांचाली का अर्थ ‘श्रीराम-आख्यानकाव्य’ होता है।
कवि कृत्तिवास ओझा का जीवन और व्यक्तित्व
आत्मचरित और वंश परम्परा
कृत्तिवास रामायण अथवा श्रीरामपांचाली के प्रारंभ एवं प्रत्येक कांड के अंत में एक-दो पंक्तियां मिलती हैं जिनसे ज्ञात होता है कि इस ग्रंथ की रचना कृत्तिवास अथवा कीर्तिवास ओझा ने की। मान्यता है कि उन्होंने पुराण सुनकर इस ग्रंथ के गीत रचे।
20वीं शताब्दी के विद्वान नगेंद्रनाथ वसु एवं दिनेशचंद्र सेन ने एक हस्तलिखित पोथी प्राप्त की जिसे कृत्तिवास का आत्मचरित बताया जाता है। इस पोथी को दिनेशचंद्र सेन ने ई.1901 में अपने ग्रंथ ‘बंगभाषा व साहित्य’ के द्वितीय संस्करण में प्रकाशित किया। नलिनीकांत भट्टशाली ने भी एक हस्तलिखित पोथी प्राप्त की।
इन पोथियों के अनुसार कृत्तिवास पश्चिम बंगाल के नदिया जिले में फुलिया गांव के रहनेवाले थे जो उस समय गौड़़ राज्य में था। प्राचीनकाल में गौड़़ और बंगाल दो भू-भाग अथवा जुड़वां राज्य थे। कृत्तिवास ओझा के पूर्वपुरुष यवन-उपद्रव-काल में अपना मूल स्थान छोड़कर यहाँ चले आए थे।
इनके पितामह का नाम मुरारी ओझा, पिता का नाम वनमाली एवं माता मा नाम मानिकी था। कृत्तिवास अपने पिता वनमाली के पाँच पुत्रों में से एक थे। ये पद्मा नदी के पार वारेंद्रभूमि में पढ़ने गए थे। कृत्तिवास अपने आचार्य चूड़ामणि के अत्यंत प्रिय शिष्य थे। काव्य-प्रतिभा से सम्पन्न होने के साथ-साथ कृत्तिवास व्याकरण, छंदशास्त्र, ज्योतिष, धर्म और नीति शास्त्र के प्रकाण्ड पंडित थे।
गौड़़ाधिपति का राज्याश्रय और कृत्तिवास रामायण का प्रणयन
शिक्षा पूर्ण होने पर कृत्तिवास गौड़़ नरेश की राजसभा में गए। यद्यपि इस नरेश का नाम नहीं मिलता तथापि कुछ विद्वान इसे राजा गणेश मानते हैं जिसे कंस भी कहते थे। कुछ विद्वानों के अनुसार यह राजा ताहिरपुर नरेश कंसनारायण था। कुछ विद्वानों के अनुसार इस राजा का नाम दनुजमर्दन था। जनश्रुति के अनुसार कृत्तिवास ने गौड़़ेश्वर को पाँच श्लोक लिखकर भेजे। राजा ने कृत्तिवास को अपने समक्ष बुलाया। राजा के महने पर उन्होंने कुछ और श्लोक सुनाए।
कृत्तिवास की प्रतिभा से प्रसन्न होकर राजा ने उनका सम्मान किया तथा उनसे अनुरोध किया कि वह बांग्ला में रामकथा लिखें। इस अनुरोध पर कृत्तिवास ने श्रीरामपांचाली काव्य का प्रणयन किया और वे बांग्ला भाषा के अत्यंत लोकप्रिय कवि सिद्ध हुए।
कृत्तिवास रामायण की हस्तलिपियों का पाठ-विमर्श
काल निर्धारण और रामचरितमानस से तुलना
कृत्तिवास के आत्मचरित से उनकी निश्चित जन्मतिथि ज्ञात नहीं होती। बांग्ला साहित्य के इतिहासकार योगेशचंद्र राय ने उनका जन्म ई.1433 में, दिनेशचंद्र ने ई.1385 से 1400 के बीच तथा सुकुमार सेन 15वीं शताब्दी ईस्वी के उत्तरार्ध में माना है। एक अन्य अवधारणा के अनुसार कृत्तिवास का जीवनकाल ईस्वी 1381 से 1461 माना जाता है।
लोक मान्यता है कि गोस्वामी तुलसीदास कृत रामचरितमानस से लगभग एक सौ वर्ष पूर्व उत्तर भारतीय किसी भाषा में इस पहली रामायण की रचना हुई। हनुमान प्रसाद पोद्दार के संपादन में गीताप्रेस गोरखपुर से प्रकाशित श्रीरामचरितमानस के संपादकीय के अनुसार तुलसीकृत रामचरित मानस की रचना ई. 1576 में सम्पन्न हुई थी, इस तरह श्रीरामपांचाली अथवा कृत्तिवास रामायण की रचना ई.1476 के लगभग निर्धारित होती है।
कृत्तिवास रामायण की हस्तलिपियों में प्रक्षिप्त अंश
कामिल बुल्के ने लिखा है कि कृत्तिवास ओझा ने बंगाली साहित्य के प्रथम एवं सर्वाधिक लोकप्रिय रामायण अथवा श्रीरामपांचाली की रचना 15वीं शताब्दी ई. के अंत में पयार छन्द में की थी। इसका पाठ अनिश्चित है। इसमें न बहुत सी प्रक्षिप्त सामग्री भी मिलती है। कृत्तिवास की मूल भाषा को भी बाद के कथाकार और लिपिक बदलते रहे हैं। क्षेपकों का पता लगाना संभव नहीं है क्योंकि इस रचना की कोई भी हस्तलिपि 200 वर्ष से अधिक पुरानी नहीं है।
इस ग्रंथ में राक्षसों की रामभक्ति से सम्बन्ध रखने वाले अंश सर्वसहमति से प्रक्षिप्त माने जाते हैं। ये अंश संभवतः 18वीं शताब्दी ईस्वी में कविचन्द्र द्वारा लिखे गये हैं। कृत्तिवास का प्रथम संस्करण श्रीरामपुर मिशन प्रेस द्वारा ई.1803 में प्रकाशित किया गया। इसमें अद्भुताचार्य की रामायण के बहुत से अंश जोड़ दिए गए थे।
बंगीय साहित्य-परिषद ने ई.1900 में अयोध्याकांड का तथा ई.1903 में उत्तरकांड का संपादन किया। ई.1936 में नलिनीकान्त भट्टशाली ने आदिकांड सम्पादित किया। इस ग्रंथ के समस्त संदर्भ पूर्णचन्द्र डे द्वारा सम्पादित तथा चक्रवर्ती-चटर्जी एंड कम्पनी द्वारा प्रकाशित कृत्तिवास रामायण के चतुर्थ संस्करण की ओर निर्देश करते हैं। इस संस्करण में प्रत्येक कांड अध्यायों में विभाजित हैं। कामिल बुल्के ने पूर्णचन्द्र डे द्वारा सम्पादित कृत्तिवास रामायण को ही ग्राह्य बताया है।
वाल्मीकि रामायण और कृत्तिवास रामायण की तुलना
कृत्तिवास रामायण में कांड-विभाजन और गौड़़ीय पाठ पर निर्भरता
कृत्तिवास कृत श्रीरामपांचाली अथवा कृत्तिवास रामायण का आधार भी वाल्मीकि रामायण है। श्रीरामपांचाली में छः कांड हैं- आदिकाण्ड, अयोध्याकाण्ड, अरण्यकाण्ड, किष्किन्धाकाण्ड, सुन्दरकाण्ड और लंका काण्ड, जबकि वाल्मीकि रामायण में सात काण्ड हैं- बालकाण्ड, अयोध्याकाण्ड, अरण्यकाण्ड, किष्किन्धाकाण्ड, सुन्दरकाण्ड, युद्धकाण्ड और उत्तरकाण्ड। इनमें से बालकाण्ड और उत्तरकाण्ड क्षेपक अर्थात् बाद में किसी के द्वारा जोड़े हुए माने जाते हैं।
वाल्मीकि रामायण के तीन पाठ प्रचलित हैं- दाक्षिणात्य पाठ ; गौड़़ीय पाठ तथा पश्चिमोत्तरीय पाठ । एच याकोबी के अनुसार, प्रत्येक पाठ में बहुत से श्लोक अन्य पाठों में नहीं पाये जाते। दाक्षिणात्य तथा गौड़़ीय पाठों में श्लोकों की एक-तिहाई संख्या केवल एक ही पाठ में मिलती है। इसके अतिरिक्त जो श्लोक तीनों पाठों में पाए जाते हैं, उनका पाठ भी एक नहीं है और इनका क्रम भी बहुत से स्थलों पर अलग-अलग है।
गौड़़ीय पाठ और कृत्तिवास रामायण के समान प्रसंग
कृत्तिवास रामायण, वाल्मीकि रामायण के गौड़़ीय पाठ पर निर्भर है जिसके अग्रलिखित अंश अन्य दो पाठों में नहीं हैं- विभीषण रावण से अलग होने के बाद पहले कैलास पर अपने भाई वैश्रवण कुबेर से मिलता है और तत्पश्चात् श्रीराम की शरण लेता है, संजीवनी के लिए जाते समय भरत से हनुमान की भेंट, सीताहरण के पूर्व जटायु, राम से अपने सम्बन्धियों के यहाँ जाने की आज्ञा लेकर घर जाता है।
वाल्मीकि रामायण के गौड़़ीय पाठ और कृत्तिवास रामायण के अग्रलिखित अंश एक समान हैं- दशरथ की पुत्री शान्ता का उल्लेख, सीता की जन्मकथा में एक अप्सरा का उल्लेख, शापमोहिता कैकेयी का दोषनिवारण, तारा का राम को शाप, केसरी द्वारा धवल-वध तथा सम्पाति के पुत्र सुपार्श्व का प्रस्ताव, सरमा-वाक्य, निकषा-वाक्य, सभा में रावण द्वारा विभीषण पर पाद-प्रहार, कालनेमि का वृत्तान्त, विभीषण की कैलास-यात्रा, भरत-हनुमान-संवाद, विभीषण-निकषा संवाद।
कृत्तिवास रामायण पर पद्मपुराण का प्रभाव
पातालखंड का प्रभाव
कामिल बुल्के के अनुसार- कृत्तिवास का प्रारंभिक कथानक पद्मपुराण-पातालखंड के गौड़़ीय पाठ से प्रभावित है। कृत्तिवास के बालकांड के पूर्वार्द्ध में रघुवंश के राजाओं का इतिहास दिया गया है। अग्रलिखित सामग्री बंगीय पातालखंड तथा कृत्तिवास दोनों में मिलती है- हरिश्चन्द्र, सौदास, दिलीप, रघु, अज-इन्दुमती की कथा, दशरथ-जटायु की मित्रता, दशरथ द्वारा शनि से वर-प्राप्ति, अंध मुनि, पुत्र का नाम सिंधु, मंथरा तथा दुंदुभी की अभिन्नता, अहल्या का शापवश शिला बन जाना आदि।
कृत्तिवास रामायण के कथानक में भक्तिपरक परिवर्तन
कृत्तिवास रामायण में राम भक्ति के प्रभाव के कारण परम्परागत कथानक में कुछ परिवर्तन किया गया है, उदाहरणार्थ- वाल्मीकि के उद्धार की कथा, वामदेव को वसिष्ठ का शाप, केवट का वृत्तांत, हनुमान के वक्षस्थल पर राम-नाम अंकित होने की कथा, राक्षसों की राम-भक्ति, रावण के पुत्र वीरबाहु द्वारा रणभूमि में राम को विष्णु-चिह्नों से आभूषित देखकर अपना धनुष फेंकना और राम की स्तुति करना . . . .
. . . . . विभीषण के पुत्र तरणी-सेन का वैष्णव तिलक लगाकर एवं शरीर, रथ तथा पताका पर राम-नाम अंकित करके रणक्षेत्र में आगमन, रावण द्वारा रणक्षेत्र में राम के समक्ष नतमस्तक होकर उनके अवतारत्व तथा दयालुता में विश्वास प्रकट करना, रामजन्म के वर्णन में शुक-सारण की राम-भक्ति आदि के उल्लेख हैं, नागपाश के वृत्तान्त में कृष्णभक्ति की झलक मिलती है।
शैव और शाक्त सम्प्रदायों का समन्वय एवं सांस्कृतिक चित्रण
कृत्तिवास रामायण में विविध मतों का समन्वय
जिस प्रकार कृत्तिवास रामायण के कथानक पर वैष्णव प्रभाव परिलक्षित होता है, उसी प्रकार इस पर शैव तथा शाक्त सम्प्रदायों की भी गहरी छाप है। हनुमान शिव के अवतार माने जाते हैं तथा महीरावण की कथा में राम तथा शिव की अभिन्नता का उल्लेख किया गया है। सेतुबंध के वृत्तांत में राम द्वारा शिव-प्रतिष्ठा करने का उल्लेख है।
राम द्वारा लंकावरोध किए जाने के पश्चात् पार्वती शिव से रावण की सहायता करने के लिए अनुरोध करती हैं, लंका-देवी अथवा लंकिनी के स्थान पर चामुंडा देवी हनुमान को लंका में प्रवेश करने से रोकती हैं। रावण से युद्ध में राम की विजय भी उनके द्वारा की गई देवी-पूजा का परिणाम माना गया है। इसी आधार पर सूर्यकांत त्रिपाठी निराला ने ‘राम की शक्ति पूजा’ की रचना की थी।
कृत्तिवास रामायण में बंगाली परिवेश और राम का चरित्र
कृत्तिवास रामायण के अग्रलिखित प्रसंग वाल्मीकि रामायण में नहीं मिलते, किन्तु ये अन्य रामकथाओं में विद्यमान हैं-
राम तथा लक्ष्मण के स्थान पर भरत तथा शत्रुघ्न को विश्वामित्र के साथ भेजने का दशरथ का प्रयत्न, सीता का पूर्वानुराग, कैकेयी द्वारा दो भिन्न अवसरों पर वर प्राप्ति, राम के निर्वासन के पूर्व राम-गुहक की मैत्री, सीता द्वारा दशरथ को पिण्डदान, लक्ष्मण का राम की सहायता करने जाने के पूर्व कुटी के चारों ओर रेखाएं खींचना, तारा का यह शाप कि बालि भिल्ल के रूप में कृष्णावतार में राम का वध करेंगे, . . . .
. . . . . नल की वर-प्राप्ति की कथा तथा हनुमान-नल कलह और लक्ष्मण का संयम जिसके बल पर वह इन्द्रजित को हराने में समर्थ होता है, भस्मलोचन तथा महीरावण की कथा, सेतुभंजन का वृत्तांत, मन्दोदरी से विभीषण का विवाह, सीता द्वारा रावण का चित्र बनाने से राम द्वारा सीता का त्याग, कुश-लव का राम से युद्ध।
कृत्तिवास रामायण के कथानक के कुछ वृत्तांत केवल बंगाल की रामकथाओं में ही पाये जाते हैं, जैसे- राम-सीता विवाह के अवसर पर चन्द्रमा का नृत्य, हनुमान का लंका से ब्रह्मास्त्र ले आना, राम का मन्दोदरी को आशीर्वाद देना जिसके फलस्वरूप रावण की चिता जलती रहती है, सीता के प्रति मंदोदरी तथा अन्य राक्षसियों के शाप।
यद्यपि कृत्तिवास रामायण अथवा श्रीरामपांचाली को वाल्मीकि रामायण का बांग्ला में पद्यानुवाद माना जाता है तथापि इसे अविकल अनुवाद अथवा शब्दानुवाद नहीं कहा जा सकता क्योंकि इसमें वाल्मीकी रामायण के प्रवाह में चरित्रों एवं घटनाओं को लेकर कवि ने नवीन उद्भावनायें की हैं और स्थान-स्थान पर जहाँ अवसर मिला है, मध्यकालीन बंगाली समाज के परिवेश और संस्कृति का सुन्दर चित्रण किया है।
वाल्मीकि रामायण के राम अपने वीरत्व और शौर्य में अद्वितीय हैं जिनमें स्वाभाविक रूप से दृढ़ता एवं कठोरता भी परिलक्षित होती है, श्रीरामपांचाली के राम कुसुम-कोमल हैं और वे हाथ में पुष्प-धनुष लेकर वन जाते हैं।
कृत्तिवास रामायण में वाल्मीकि की तरह पितृभक्ति, सत्यनिष्ठा, त्याग, प्रजानुरंजन, पातिव्रत्य का यथावत प्रतिपादन किया गया है। इसमें कई नये आख्यानों के माध्यम से बंगाल की संस्कृति, आमोद-प्रमोद, आचार-अनुष्ठान तथा बंगाली स्त्री का स्थानीय रूप दिखाकर बंगाल के स्थानीय परिवेश को स्थान दिया गया है।
कृत्तिवास रामायण में लेखक ने वाल्मीकि रामायण के गूढ़ दार्शनिक अंशों, विचारों, विश्लेषणात्मक भागों एवं आलंकारिकता के स्थान पर निज रचना-कौशल से बंगाल की निजता को सहजता से उभारने का सफल प्रयास किया है।
कामिल कामिल बुल्के द्वारा रेखांकित विशिष्ट संदर्भ
कृत्तिवास रामायण में सीता-जन्म और कबंध की कथा
कामिल बुल्के ने कृत्तिवास रामायण के कुछ विशिष्ट संदर्भों को उद्धृत किया है जो इस प्रकार हैं-
कृत्तिवास रामायण (1/60-61) में स्वयंवर के समय राम को देखकर सीता की प्रेम दशा तथा देवताओं से उनकी विनय का वर्णन मिलता है।
कृत्तिवास ने सीता-जन्म से संबंधित वृत्तांत को एक नया रूप दिया है जिसमें मेनका के स्थान पर जनक ने उर्वशी को देख लिया था तथा काममोहित हो जाने के कारण उनका तेज भूमि पर गिर गया था, जिससे पृथ्वी गर्भवती हुई। बहुत समय बाद जनक ने हल जोतते समय भूमि में से एक डिम्ब प्राप्त किया जिसमें से सीता निकली थी (पृ. 293)।
कृत्तिवास रामायण (3/28) के अनुसार कुबेर नामक दैत्य ने ब्रह्मा से अवध्यता का वर प्राप्त किया था। बाद में उसने अष्टावक्र नामक मुनि का उपहास किया और उनसे शापित होकर राक्षस बन गया। इस कथा के अनुसार कबंध राक्षस बनने के पश्चात् ही इन्द्र ने उसके सिर पर वज्र मारा था जिससे उसके सिर तथा पैर उदर में घुस गए थे। उ
सके शरीर के जल जाने के बाद उसमें से एक दिव्य पुरुष प्रकट हुआ, जो राम की स्तुति करने लगा। राम ने उसकी भक्ति से संतुष्ट होकर उसे अपने परमधाम जाने का वरदान दिया। में कबंध ने राम को शबरी के यहाँ जाने का परामर्श दिया तथा विमान पर चढ़कर विष्णुलोक के लिए प्रस्थान किया।
चक्रवाक शाप और सेतुबंध विवाद
कृत्तिवास रामायण (3/25) के अनुसार सीताहरण के बाद आहत जटायु से मिलने के पूर्व ही एक चक्रवाक पक्षी से राम-लक्ष्मण की भेंट हुई। राम ने चक्रवाक से पूछा कि जनकनंदिनी को कौन ले गया है।
चक्रवाक ने राम का उपहास करते हुए कहा- तुम दो मनुष्य होते हुए भी एक स्त्री की रक्षा नहीं कर पाये? मैं अकेला पक्षी दो मादाओं को रख लेता हूँ। तुम लोगों ने स्त्री को खो दिया और अब इधर-उधर भटक कर उसके विषय में पूछते हो, क्षत्रिय समाज तुमको क्या समझेगा?’
राम ने क्रोध में आकर उसको शाप दिया कि आज से तुम रति-सुख से वंचित रहोगे; रात में आहार खोजते-खोजते तुमको मादा से अलग रहना पड़ेगा। इस पर चक्रवाक दुखी होता है और पतित-पावन भक्तवत्सल नारायण के रूप में राम की स्तुति करते हुए अनुनय विनय करता है। राम उस पर दया करते हैं तथा कहते हैं कि द्वापर में एक व्याध तुम्हें जाल में फंसाएगा, तब तुम मेरे शाप से मुक्त हो जाओगे (पृ. 343)।
कृत्तिवास रामायण में भी कई अन्य रामायणों की तरह लक्ष्मण रेखा खींचने का प्रसंग है (पृ. 358)। कृत्तिवास रामायण के अनुसार जाम्बवान ने गृद्धपति सम्पाति से सीता की खोज में सहायता करने के लिए कहा तब सम्पाति ने अपनी असमर्थता प्रकट कर अपने पुत्र सुपार्श्व को बुलाया।
सुपार्श्व ने अंगद को अपनी पीठ पर समुद्र के उस पार ले जाने का प्रस्ताव किया किन्तु अंगद ने अस्वीकार किया। सम्पाति अंत में हिमालय के लिए प्रस्थान करता है (पृ. 358)। कृत्तिवास रामायण में विभीषण के पुत्र तरणीसेन को रामभक्त के रूप में प्रस्तुत किया गया है (पृ. 433)।
कृत्तिवास रामायण में (5/43) सेतु बंध के समय नल और हनुमान के बीच विवाद होता है क्योंकि नल हनुमान द्वारा लाया हुआ पर्वत बायें हाथ से पकड़ता है। इस कारण हनुमान क्रुद्ध होकरएक ही बार में चार पर्वत ले आते हैं और नल उन्हें नहीं पकड़ पाता है, इस पर दोनों एक दूसरे पर अभियोग लगाने के लिए राम के पास जाते हैं (पृ. 438)।
मंदोदरी का आशीर्वाद और सीतात्याग का कारण
कृत्तिवास रामायण (6/109) में जलती चिता का उल्लेख है। रणभूमि में मंदोदरी को देखकर तथा उसे सीता समझकर राम ने उसे सौभाग्यवती होने का आशीर्वाद दिया। वास्तविकता ज्ञात होने पर राम ने कहा- ‘रावण की चिता सदैव प्रज्वलित रहेगी, इससे तुम्हारा सौभाग्य चिरस्थायी होगा’ (पृ. 469)।
कृत्तिवास रामायण (6/114) में मंदोदरी का शाप सीता की अग्निपरीक्षा का कारण माना गया है। मंदोदरी ने राम के दर्शनों की आशा से आनन्दमग्न सीता को यह कहकर शाप दिया कि तुम्हारा यह आनन्द अकस्मात् निरानन्द हो जायेगा। लंका की स्त्रियों ने भी उस अवसर पर सीता को शाप दिया (पृ. 472)।
कृत्तिवास रामायण (7, 44-45) में सीतात्याग के तीन कारणों का सम्मिलित वृत्तान्त इस प्रकार है। भद्र से लोकापवाद की चर्चा सुनकर राम सरोवर में नहाने चले गए। रास्ते में उन्होंने किसी धोबी के मुंह से अपनी निन्दा सुन ली तथा घर पहुंचकर सीता द्वारा अंकित रावण का चित्र देख लिया।
सीता की सखियों ने जिज्ञासा से प्रेरित होकर सीता से रावण का चित्र बनाने का अनुरोध किया था। सीता ने फर्श पर रावण का चित्र बना दिया था और बाद में थकित होकर वह उस चित्र के पास सो गई थी। राम के आगमन पर सखियां चली गईं। रावण का चित्र देखकर राम का संदेह और दृढ़ हो गया और वह सीता को त्याग देने का संकल्प करके चले गए। (पृ. 558)।
करपात्रीजी की रामायण मीमांसा में कृत्तिवास रामायण के संदर्भ
वाल्मीकि जन्म और सुमित्रा की उपेक्षा का प्रसंग
करपात्रीजी ने अपने प्रसिद्ध ग्रंथ रामायण मीमांसा में कई स्थानों पर श्रीरामपांचाली अथवा कृत्तिवास रामायण की विशिष्टता को प्रकट करने वाले उसके विशेष संदर्भों को उद्धृत किया है, जो इस प्रकार हैं- कृत्तिवासीय रामायण तथा अश्वघोष के बुद्धचरित में वाल्मीकि को भार्गव च्यवन ऋषि का पुत्र कहा गया है (पृ. 72)।
प्रसिद्ध है कि वाल्मीकि मूलतः व्याध थे, कृत्तिवास रामायण में उस व्याध का नाम रत्नाकर तथा उसके पिता का नाम च्यवन है। यहाँ सप्तर्षियों के स्थान पर उसे ब्रह्मा और नारद मिलते हैं। ब्रह्मा के आदेशानुसार वह नदी में स्नान के लिए जाता है। उसके देखनेमात्र से नदी सूख जाती है। ब्रह्मा उसे राम नाम का उपदेश करते हैं किन्तु वह उसका उच्चारण न कर सकने के कारण ‘मरा’ नाम जपता है (पृ.87)।
कृत्तिवास रामायण (1/26) के अनुसार सिंहल के राजा सुमित्र ने अपनी पुत्री सुमित्रा के विवाह का निमंत्रण राजा दशरथ को भेजा। राजा दशरथ ने कौशल्या तथा कैकेयी से मृगया का बहाना कर वहाँ जाकर उससे विवाह किया।
विवाह की द्वितीय रात्रि को दशरथ ने नवविवाहिता पत्नी को लेकर अयोध्या को प्रस्थान किया। बंगाल में उस रात्रि को अशुभ मानकर कालरात्रि कहते हैं। वह अशुभ रात्रि दशरथ ने सुमित्रा के साथ बितायी।
सुमित्रा को देखकर कौशल्या और कैकेयी को आशंका हुई। वे सोचने लगीं कि यह हमसे अधिक सुन्दर है। दशरथ हमारी उपेक्षा करेंगे। अतः दोनों ने पार्वती तथा शंकर की उपासना की और उनसे वर मांगा कि सुमित्रा अभागिनी हो। बाद में सुमित्रा को प्रमाद हुआ जिससे सब पत्नियों से सुन्दर होने पर भी दशरथ उसे उपेक्षा की दृष्टि से देखने लगे तथा कैकेयी का अधिक आदर करने लगे (पृ. 435-436)।
रानियों की संख्या और अहिल्या प्रसंग
कृत्तिवास रामायण के अनुसार राजा दशरथ की 750 रानियां थीं जबकि वाल्मीकि रामायण के अनुसार यह संख्या 350 है (पृ.437)। कृत्तिवास रामायण (1/29) के अनुसार दशरथ ने निःसंतान लोमपाद को अपनी पहली संतान देने की प्रतिज्ञा की थी।
अतः जब उनकी पत्नी (भार्गव राजा की पुत्री) एक कन्या को जन्म देती है, दशरथ उसका नाम हेमलता रखकर उसे लोमपाद के यहाँ भेजते हैं। बाद में हेमलता के नाम का उल्लेख नहीं मिलता है।
अन्य विभिन्न ग्रंथों में राजा दशरथ की कन्या का नाम शान्ता ही माना जाता है। बंगाल की रामकथाओं में दशरथ की पुत्री का प्रायः उल्लेख मिलता है (पृ. 441)।
कृत्तिवास रामायण (1/59) में इन्द्र को गौतम का प्रियतम शिष्य माना गया है। उन्होंने गौतम का वेष धारण कर अहिल्या के साथ रमण किया। गौतम अहिल्या के शरीर पर शृंगार के लक्षण देखकर इन्द्र का दुराचार जान गये।
इन्द्र आश्रम में ही रहता था। बुलाये जाने पर वह पुस्तकें कांख में दबाये गौतम के पास आया (पृ. 445)। कृत्तिवास रामायण के अनुसार राम ने अहल्या के मस्तक पर पैर रखकर उसे पाषाण बना दिया (पृ. 448)।
सीता की शंका और गुहक की पूर्वजन्म कथा
कृत्तिवास रामायण में सीता को शंका होती है कि एक धनुष को तोड़कर (राम ने) मेरे साथ विवाह किया, अब भृगुमुनि (परशुराम) एक धनुष और लाये हैं। न जाने मेरी कितनी सपत्नियाँ होंगी (पृ. 467)। कृत्तिवास रामायण में लक्ष्मण परशुराम से कुछ उग्रता से बातें करते हैं (पृ. 469)।
कृत्तिवास रामायण के अनुसार दशरथ अपने मंत्रियों से कहते हैं कि मुझे अंधक मुनि ने वर दिया है कि ऋष्यशृंग द्वारा यज्ञ कराने से पुत्र-प्राप्ति होगी। यह ऋष्यशृंग कौन हैं? इस पर वसिष्ठ ने उनकी कथा बतायी। तब दशरथ लोमपाद के यहाँ जाकर ऋष्यशृंग को अयोध्या लाकर यज्ञ कराते हैं (पृ. 474)।
कृत्तिवास रामायण के अनुसार दुर्गा का कथन है कि राम शिव के गुरु हैं, उनमें भेद नहीं है (पृ. 483)। कृत्तिवास रामायण के अनुसार विष्णु कश्यप और अदिति की ओर निर्देश करते हुए देवताओं से कहते हैं कि दशरथ तथा कौशल्या ने मेरी सेवा की है और मैं उनको वर दे चुका हूं कि मैं तुम्हारे घर में जन्म लूंगा (पृ. 489)।
कृत्तिवास रामायण के अनुसार रावण का मुकुट भूमि पर गिर पड़ा। आकाशवाणी से रावण को यह विदित हो गया कि विष्णु का अवतार हो गया है अतः रावण ने शिशु राम को मारने के लिए शुक और सारण को भेजा, परन्तु वे शिशु को प्रणाम करते हैं और भक्ति का वरदान पाकर लंका लौट जाते हैं (पृ. 497)। कृत्तिवास रामायण में अनेक राक्षस रामभक्त बन जाते हैं (पृ. 499)।
कृत्तिवास रामायण (1/53) के अनुसार एक दिन दशरथ अपने पुत्रों के साथ गंगास्नान करने गये। वहाँ गुहक अपने तीन करोड़ सैनिकों द्वारा दशरथ की सेना को रोक लेता है तथा राम को देखने की इच्छा प्रकट करता है, पर दशरथ राम को रथ में छिपा कर उससे युद्ध करके उसे हराकर और बांधकर रथ पर रखवा देते हैं।
इस पर गुहक पैर के अंगूठे से बाण मारता है। राम यह कौतुक देखने आते हैं। वह राम का दर्शन कर अपने पूर्वजन्म की कथा सुनाता है कि मैं पूर्वजन्म में वसिष्ठ-पुत्र वामदेव था। दशरथ अंध मुनि के पुत्रवध (श्रवण-वध) का प्रायश्चित पूछने गये। उस दिन वसिष्ठ घर पर नहीं थे। मैंने ही दशरथ को तीन बार राम-नाम जपने का परामर्श दिया था।
पिताजी के आने पर जब मैंने यह प्रसंग सुनाया तब उन्होंने क्रुद्ध होकर मुझे चंडाल बन जाने का शाप दिया। उन्होंने कहा एक ही बार के राम नाम उच्चारण से सब पाप कट जाते हैं, फिर तीन बार राम नाम जपने का उपदेश तुमने क्यों किया?
वसिष्ठ ने मुझसे कहा जब दशरथ के घर राम का जन्म होगा तब उनके चरणों का स्पर्श करके तुम शाप-मुक्त होओगे। राम ने दशरथ की अनुमति से गुहक को शापमुक्त किया और उससे मैत्री की (पृ. 501)।
शिव का धनुष और फल्गु नदी का शाप
कृत्तिवास रामायण के अनुसार ब्रह्मा ने शिव से कहा था कि ऐसी युक्ति सोची जाय कि जिससे सीता का विवाह राम से ही हो। इस पर शिव ने परशुराम को अपना धनुष देकर आदेश दिया कि मेरा यह धनुष जनक के घर में रख दो और जनक से कहना कि सीता के साथ वही विवाह करे जो इस धनुष को तोड़ सके (पृ. 507)।
कृत्तिवास रामायण (1/62) में लिखा है कि राम-सीता विवाहोत्सव में देवताओं की इच्छा से चन्द्रमा ने नर्तकी का रूप धारण कर अपने नृत्य से सबको मंत्रमुग्ध कर दिया, जिससे शुभ मुहूर्त टल गया। इस कारण यह विवाह लौकिक दृष्टि से सुखदायक नहीं हुआ और सीता का हरण हुआ। इसी आधार पर अन्य कल्पनाएं हुई हैं (पृ. 510)।
कृत्तिवास रामायण के अनुसार कुशध्वज वेद-पाठ कर रहे थे, उस समय उनके मुख से एक कन्या उत्पन्न हुई। उन्होंने उसका नाम वेदवती रखा। शुम्भदैत्य ने कुशध्वज को मार डाला एवं वेदवती तपस्या करने चली गयी। तप करते समय रावण से अपमानित होकर वेदवती ने अग्नि में प्रवेश किया (पृ. 519)।
कृत्तिवास रामायण के अनुसार दशरथ की मृत्यु के पश्चात् उनका श्राद्ध उचित रीति से करने के लिए राम और लक्ष्मण अंगूठी बेचने चले जाते हैं। तब अवकाश देखकर सीता फल्गु नदी के किनारे खेलने लगती हैं।
पितर बन चुके दशरथ सीता से कहते हैं कि भूख की पीड़ा असह्य हो उठी है, रेत का पिण्ड देकर भूख शांत कर दो। सीता ने ऐसा ही किया। बाद में ब्राह्मण, तुलसी और फल्गु नदी सीता द्वारा पिण्ड दान किए जाने का साक्ष्य नहीं देते हैं। अतः सीता उन्हें शाप देती हैं। वट वृक्ष सीता का समर्थन करता है तथा राम और सीता दोनों से आशीर्वाद प्राप्त करता है (पृ. 539)।
चंडीपाठ का विघ्न और ब्रह्मास्त्र की चोरी
कृत्तिवास रामायण के अनुसार कैकेयी को जो दो वर प्राप्त हुए थे उनमें से एक दशरथ एवं शम्बरासुर युद्ध में मिला था और दूसरा वर दशरथ के व्रण (फोड़े) की पीव चूस लेने के कारण मिला था (पृ. 544)।
कृत्तिवास रामायण (5/10) के अनुसार शूर्पणखा, मंथरा का रूप धारण कर सीता से मिलने अशोकवाटिका में आई (पृ. 558)।
कृत्तिवास रामायण (1/27) में कहा गया है कि कभी अयोध्या में अनावृष्टि हुई थी। नारद से उसका कारण रोहिणी नक्षत्र पर शनि का दृष्टिपात जानकर दशरथ शनि से युद्ध करने गये। शनि की दृष्टि से दशरथ का रथ टूट गया, जटायु ने उसे संभाला। दशरथ की विजय हुई। फलस्वरूप अग्नि को साक्षी करके दोनों ने मित्रता की (पृ. 560)।
कृत्तिवास रामायण (3/23) में प्रसंग है कि ब्रह्मा, राक्षसों को निद्रा से मोहित करके अशोक वाटिका में सीता के पास जाकर राम के आगमन का आश्वासन देकर उन्हें क्षुधा और तृषा मिटाने वाला पायस खिलाकर चले जाते हैं (पृ. 579)।
कृत्तिवास रामायण के अनुसार अंतरिक्ष में स्थित देवता युद्ध की प्रतीक्षा कर रहे थे। पार्वती ने शिव से अनुरोध किया कि वह अपने भक्त रावण की रक्षा करें। शिवजी ने कहा, रावण को अमरत्व का वर प्राप्त नहीं है। स्वयं विष्णु धरती पर अवतार लेकर उसका वध करने आये हैं। अब उसका बचना संभव नहीं है (पृ. 665)।
कृत्तिवास रामायण के अनुसार गरुड़ ने राम की नागपाशमुक्ति के पश्चात् उनसे कृष्ण-रूप दिखाने की इच्छा प्रकट की। इस पर राम ने कहा मुझे न देखकर वानर-सेना किंकर्तव्यविमूढ़ हो जायेगी। तब गरुड़ ने पंख फैलाकर राम को छिपा लिया और राम ने उन्हें कृष्ण-रूप दिखाया।
हनुमान ने योगबल से सब वृत्तान्त जान लिया। उन्होंने कृष्णावतार के समय बदला लेने का निश्चय किया (पृ. 667)। कृत्तिवास रामायण के अनुसार जब (हनुमान संजीवनी लेने गए, तब मध्यरात्रि में रावण की आज्ञा से सूर्याेदय हुआ किन्तु हनुमान ने सूर्य को अपनी कांख में दबा लिया (पृ. 668)।
कृत्तिवास रामायण के अनुसार रावण ने शान्तिकर्म का आयोजन किया। चंडीपाठ के लिए बृहस्पति को बुलाया। देवताओं ने पवनपुत्र हनुमान के द्वारा राम को चंडीपाठ अशुद्ध कराने का परामर्श दिया। तब हनुमान ने मक्खी रूप धारण करके चंडीपाठ के दो अक्षर चाट लिए परन्तु बृहस्पति ने अभ्यासवश शुद्ध पाठ ही किया।
इस पर हनुमान ने विक्रम रूप दिखाया, इससे बृहस्पति डर गये। हनुमान ने ग्रंथ छीनकर प्रथम अध्याय के तीन श्लोक मिटा दिये। अशुद्ध पाठ देखकर चंडी (माहेश्वरी) कैलास चली गयी (पृ. 677)।
कृत्तिवास रामायण के अनुसार रावण द्वारा तपस्या के पश्चात् ब्रह्मा ने उससे कहा था कि तुम्हारे सिर एवं भुजाएं कटने पर फिर उत्पन्न हो जायेंगी और रावण को ब्रह्मास्त्र देकर कहा कि इसी ब्रह्मास्त्र से तुम्हारा मर्मस्थान भेदित होने पर मृत्यु होगी।
रावण ने उसे मंदोदरी के रक्षण में दे रखा था। विभीषण ने यह रहस्य राम को बताया। हनुमान ने मंदोदरी के पास ब्राह्मण वेष में जाकर कहा, जब तक ब्रह्मास्त्र तुम्हारे पास है रावण नहीं मर सकता है किन्तु मुझे शंका है कि विभीषण कहीं यह जान न ले कि तुमने उसे कहाँ छिपा रखा है!
मंदोदरी ने कहा मैं सावधान हूँ, मैंने उसे स्फटिक के खंभे में छिपा रखा है। हनुमान ने लाठी से खंभा तोड़ दिया तथा ब्रह्मास्त्र राम के पास ले गये (पृ. 678)।
कृत्तिवास रामायण के अनुसार लंका जाने हेतु बांधे गये सेतु को, राम-रावण युद्ध के पश्चात समुद्र की प्रार्थना से भंग किया गया। (पृ. 681)।
कृत्तिवास रामायण में युद्ध के विशिष्ट प्रसंग
भस्मलोचन और दर्पण प्रसंग
कृत्तिवास रामायण (5/47) के अनुसार भस्मलोचन नामक राक्षस की दृष्टि जिस पर पड़ती थी वह उसी क्षण भस्मीभूत हो जाता था। इस कारण भस्मलोचन प्रायः अपनी आंखों को चमड़े के परदे से ढके रखता था। जब रामसेना समुद्र पार करके लंका की ओर बढ़ रही थी, तब रावण ने उसके विरुद्ध भस्मलोचन को भेज दिया।
विभीषण के परामर्श से राम ने ब्रह्मास्त्र छोड़कर उसके सामने असंख्य दर्पण रख दिये, उन दर्पणों पर दृष्टि डालकर उसने स्वयं को देखा और स्वयं ही जल गया (पृ. 683)।
महीरावण वध और साष्टांग प्रणाम की युक्ति
कृत्तिवास रामायण (6/79-87) के अनुसार महीरावण अष्टावक्र द्वारा शापित शक्रधनु गंधर्व था। निकषा के परामर्श से रावण ने उसे बुलाया था, किन्तु विभीषण ने पक्षी के रूप में दोनों की मंत्रणा सुन ली और राम को सावधान कर दिया।
हनुमान ने अपनी पूंछ बढ़ाकर चारों ओर से सेना की रक्षा की। राम ने आकाश में विष्णु चक्र रख दिया। नल ने पाताल में माया का विस्तार किया। महीरावण ने क्रमशः दशरथ, कौशल्या और जनक के रूप में आकर हनुमान को धोखा देने का असफल प्रयास किया। अंत में वह विभीषण के रूप में प्रवेश पाकर मायाचूर्ण से राम और लक्ष्मण को निद्रामग्न करके दोनों को अपने भवन में ले गया।
हनुमान पाताल पहुंच कर किसी वृद्धा से राम और लक्ष्मण का वृत्तान्त जानकर मक्षिका-रूप धारण कर महल में जाकर राम और लक्ष्मण को प्रणाम करते हैं। हनुमान महामाया मंदिर में देवी को राम का समाचार सुनाते हैं।
देवी राम और शिव की अभिन्नता का उल्लेख करती हुई महीरावण के वध का उपाय बताती है कि जब राम और लक्ष्मण देवी के सामने उपस्थित किये जायें तो उनको महीरावण से कहना चाहिए कि हम साष्टांग प्रणाम करना नहीं जानते, हमें करके बतलाइये। जब वह साष्टांग प्रणाम करे तब उसी समय उसे मार डालना चाहिए।
देवी के इस निर्देश के अनुसार ही हनुमान ने महीरावण का वध कर दिया। महीरावण की पत्नी युद्ध करने आती है। हनुमान के पाद-प्रहार से उसके गर्भ से चार सिरवाले अहिरावण का जन्म हुआ। उसने तुरन्त हनुमान से युद्ध आरम्भ कर दिया तथा हनुमान के हाथों मारा गया (पृ. 685)।
कृत्तिवास रामायण में हनुमान की अनन्य भक्ति
ब्रह्मा का वरदान और हनुमान का विराट रूप
कृत्तिवास रामायण के अनुसार ब्रह्मा ने रावण को वर दिया था कि नर और वानर के अरिक्ति और कोई भी तुम्हें नहीं मार सकेगा और सिर कटने पर भी तुम मरोगे नहीं (पृ. 695)।
कृत्तिवास रामायण के अनुसार राजा सौदास गंगाजल के स्पर्श से ब्रह्महत्या के शाप से मुक्त होता है (पृ. 703)।
कृत्तिवास रामायण (6/129) के अनुसार राम के राज्याभिषेक के बाद सीता हनुमान को भोजन परोसकर उन्हें तृप्त करने में असमर्थ होने पर ध्यान से जानती है कि ये तो रुद्रावतार हैं (पृ. 724)।
कृत्तिवास रामायण के अनुसार जहाँ कहीं रामकथा का पाठ होता है वहाँ अदृश्य रूप में हनुमानजी विराजमान रहते हैं (पृ. 734)।
मणियाँ तोड़ना और हृदय विदीर्ण करना
कृत्तिवास रामायण (6/128) के अनुसार हनुमान ने माला हाथ में लेकर उसे ध्यान से देखा और उसकी बहुमूल्य मणियां तोड़कर खाने लगे। पूछे जाने पर, हनुमान ने इस व्यवहार का कारण यह बताया कि इनमें रामनाम अंकित नहीं है। अतः मेरी दृष्टि में इनका कोई मूल्य नहीं है।
इस पर किसी ने पूछा क्या तुम्हारे शरीर में राम-नाम अंकित है। यह सुनकर हनुमान ने नखों से छाती फाड़कर दिखलायी। उनके शरीर में सर्वत्र रामनाम का उल्लेख था (पृ. 739)।
कृत्तिवास रामायण के अनुसार बाली की पत्नी तारा ने राम को शाप दिया कि सीता अधिक समय तक तुम्हारे साथ नहीं रहेगी और अपनी पवित्रता व पातिव्रत्य के कारण अंततः भूमि में प्रवेश करेगी (पृ. 751)।
निष्कर्ष
श्रीरामपांचाली अथवा कृत्तिवास रामायण के उक्त प्रसंगों को देखकर लगता है कि कृत्तिवास ओझा ने अपनी इस रचना में वाल्मीकि रामायण के साथ, रामकथा से सम्बन्धित अन्य स्रोतों तथा बंगाल में प्रचलित रामकथा सम्बन्धी लोकगाथाओं का उपयोग भी किया है। इनके अतिरिक्त कवि ने कई नवीन उद्भावनाएं भी की हैं और बंगाल के मध्यकालीन सामाजिक-सांस्कृतिक परिवेश को इस कृति में समाविष्ट किया है।
डॉ. मोहनलाल गुप्ता के आलेख आप इस वैबसाइट के ब्लॉग खण्ड में पढ़ सकते हैं।
