दधिमती माता मंदिर रामायण शिल्पांकन की अद्भुत धरोहर - mohanlalgupta.com

दधिमती माता मंदिर : रामायण शिल्पांकन की अद्भुत धरोहर

प्रस्तावना


राजस्थान का मारवाड़ क्षेत्र प्राचीन भारतीय स्थापत्य, मूर्तिकला और सांस्कृतिक धरोहरों के लिए विश्वविख्यात रहा है। विशेष रूप से गुर्जर-प्रतिहार वंश ने राजस्थान में मंदिर निर्माण की ऐसी समृद्ध परंपरा विकसित की, जिसने भारतीय कला इतिहास में एक नया अध्याय जोड़ा। नागौर जिले के गोठ-मांगलोद ग्राम की सीमा पर स्थित दधिमती माता मंदिर इसी स्थापत्य परंपरा का एक अनुपम उदाहरण है। यह मंदिर केवल धार्मिक दृष्टि से ही नहीं, बल्कि स्थापत्य कला, मूर्तिकला और रामायण के शिल्पांकन के कारण भी अत्यंत महत्वपूर्ण है।

दधिमती माता मंदिर आज भी जीवंत आस्था का केंद्र है तथा दधीचि ब्राह्मणों की कुलदेवी के रूप में पूजित है, किंतु इसकी ऐतिहासिक और कलात्मक महत्ता लंबे समय तक विद्वानों की दृष्टि से ओझल रही। दधिमती माता मंदिर प्रारम्भिक मध्यकालीन राजस्थान की कला-संपदा का एक अनमोल स्मारक है।

दधिमाता मंदिर का भौगोलिक एवं ऐतिहासिक परिचय


दधिमती माता मंदिर राजस्थान के नागौर जिले में स्थित है। यह मंदिर नागौर नगर से लगभग 40 किलोमीटर उत्तर-पूर्व दिशा में गोठ-मांगलोद नामक जुड़वां गांवों के निकट निर्मित है। विद्वानों के अनुसार यह मंदिर प्रारम्भिक 10वीं शताब्दी ईस्वी का है और इसकी स्थापत्य शैली स्पष्ट रूप से गुर्जर-प्रतिहार कालीन विशेषताओं को प्रदर्शित करती है।

गुर्जर-प्रतिहार शासकों ने राजस्थान में अनेक भव्य मंदिरों का निर्माण करवाया। मंडोर, ओसियां, आभानेरी, मेड़ता तथा डीडवाना जैसे क्षेत्रों में प्राप्त स्मारक इस परंपरा के प्रमाण हैं। दधिमती माता मंदिर भी इसी सांस्कृतिक धारा का महत्वपूर्ण अंग है।

दधिमती माता मंदिर की स्थापत्य योजना

पूर्वाभिमुख मंदिर संरचना


दधिमती माता पूर्वाभिमुख है तथा इसकी मूल संरचना आज भी काफी हद तक सुरक्षित है। मंदिर में निम्नलिखित प्रमुख भाग सम्मिलित हैं—

  • गर्भगृह
  • अंतराल
  • स्तंभयुक्त सभा-मंडप
  • पूर्व दिशा में प्रवेश मंडप

दधिमती माता मंदिर का द्वार पंचशाखा शैली का है, जिसमें पुष्पवल्लरियाँ, नाग आकृतियाँ तथा मिथुन मूर्तियाँ अत्यंत सुंदर ढंग से उत्कीर्ण की गई हैं। द्वार ललाट पर बहुभुजी दुर्गा की प्रतिमा स्थापित है, जो इस मंदिर के शक्तिपीठ स्वरूप को दर्शाती है।

दधिमती माता मंदिर की मूर्तिकला

देवी प्रतिमाएँ और शिल्प सौंदर्य


मंदिर के बाहरी भाग में देवी-देवताओं की अनेक उत्कृष्ट प्रतिमाएँ निर्मित हैं। मुख्य भद्र भाग में कमलासन पर विराजमान चतुर्भुजी दुर्गा की मूर्ति स्थापित है। उत्तर दिशा में पार्वती की तपस्या करती प्रतिमा तथा अन्य दिशाओं में विभिन्न दिक्पालों का अंकन किया गया है।

मंदिर की दीवारों और स्तंभों पर—

  • कीर्तिमुख
  • हंस आकृतियाँ
  • पूर्ण विकसित कमल
  • चंवरधारी स्त्रियाँ
  • गणेश एवं सप्तमातृकाएँ

का अत्यंत सूक्ष्म और कलात्मक अंकन देखने को मिलता है। इनमें भारतीय मूर्तिकला परम्परा का पूर्ण दर्शन होता है।

रामायण शिल्पांकन : दधिमती माता मंदिर की सबसे बड़ी विशेषता

राजस्थान में रामकथा का प्राचीनतम प्रस्तुतीकरण


दधिमती माता मंदिर की सबसे अद्भुत विशेषता इसकी शिखर और जंघा के मध्य स्थित विस्तृत पट्टिकाओं पर उत्कीर्ण रामायण प्रसंग हैं। मंदिर में पंद्रह बड़े शिल्पफलक बनाए गए हैं जिनमें भगवान राम के वनवास से लेकर रावण-वध और लंका विजय तक की घटनाओं का अत्यंत जीवंत चित्रण किया गया है।

इन शिल्पों में—

  • राम, सीता और लक्ष्मण का वनगमन
  • रावण का दरबार
  • युद्ध दृश्य
  • लंका विजय

जैसे प्रसंग अत्यंत कलात्मक रूप से उकेरे गए हैं।

विशेषज्ञों के अनुसार राजस्थान के प्रतिहारकालीन स्मारकों में यह संभवतः सबसे प्राचीन और विस्तृत रामायण कथा का शिल्पांकन है।

नागर शैली का उत्कृष्ट उदाहरण

शिखर एवं स्थापत्य विशेषताएँ


मंदिर का शिखर नागर शैली का है तथा पंचरथ योजना पर निर्मित है। इसका लाटिना प्रकार का शिखर ओसियां के प्रारम्भिक मंदिरों से साम्यता रखता है। शिखर पर आमलक स्थापित है, जो उत्तर भारतीय मंदिर स्थापत्य की प्रमुख विशेषता मानी जाती है।

मंदिर की धार्मिक पहचान

देवी उपासना का प्रमुख केंद्र


दधिमाता मंदिर मूलतः देवी मंदिर है और संभवतः इसे दुर्गा या उनके किसी स्वरूप को समर्पित किया गया था। गर्भगृह द्वार पर दुर्गा की प्रतिमा, सप्तमातृकाओं का अंकन तथा पार्वती-उमा महेश जैसी मूर्तियाँ इस तथ्य की पुष्टि करती हैं। आज भी यह मंदिर दधीचि ब्राह्मण समुदाय की कुलदेवी के रूप में पूजनीय है।

दधिमती माता मंदिर का अभिलेखीय महत्व

प्राचीन शिलालेख और काल निर्धारण


दधिमाता मंदिर से प्राप्त शिलालेख को मारवाड़ का सबसे प्राचीन अभिलेख माना गया है। इस अभिलेख का प्रकाशन पंडित रामकरण आसोपा ने ‘एपिग्राफिया इंडिका’ में किया था। अभिलेख में मंदिर हेतु दान का उल्लेख मिलता है।

यद्यपि अभिलेख में संवत का स्पष्ट उल्लेख नहीं है, किंतु स्थापत्य शैली और मूर्तिकला के आधार पर विद्वान इसे लगभग 10वीं शताब्दी ईस्वी का मानते हैं। कुछ इतिहासकार इसे गुर्जर-प्रतिहार सम्राट भोज प्रथम के काल से भी जोड़ते हैं।

दधिमती माता मंदिर का सांस्कृतिक महत्व

दधिमाता मंदिर केवल एक धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि राजस्थान की मध्यकालीन कला, स्थापत्य और सांस्कृतिक चेतना का जीवंत दस्तावेज है। यहाँ की मूर्तिकला भारतीय शिल्प परंपरा की उच्च कोटि की अभिव्यक्ति प्रस्तुत करती है।

विशेष रूप से रामायण के दृश्य इस मंदिर को भारतीय कला इतिहास में अद्वितीय स्थान प्रदान करते हैं। यह स्मारक राजस्थान की उस गौरवशाली परंपरा का प्रतीक है जिसमें धर्म, कला और स्थापत्य का अद्भुत समन्वय दिखाई देता है।

निष्कर्ष

दधिमती माता मंदिर, नागौर राजस्थान की प्राचीन स्थापत्य विरासत का एक अनुपम उदाहरण है। गुर्जर-प्रतिहार कालीन स्थापत्य शैली, उत्कृष्ट मूर्तिकला, देवी उपासना की परंपरा तथा रामायण के दुर्लभ शिल्पांकन इसे भारतीय कला इतिहास का महत्वपूर्ण स्मारक बनाते हैं।

डॉ. मोहनलाल गुप्ता

You can read this article in English also-

Dadhimata Temple of Goth-Manglod: A Pratihara Masterpiece of Ramayana Art

पुस्तक के लेखक डॉ. मोहनलाल गुप्ता राजस्थान सरकार के सूचना एवं जनसम्पर्क विभाग में उपनिदेशक रहे हैं तथा सेवानिवृत्ति के बाद राजस्थान साहित्य अकादमी की सरस्वती सभा के सदस्य भी रहे हैं। होगी।

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