दादूदयाल के दर्शन में अद्वैतवाद mohanlalgupta.com

दादूदयाल के दर्शन में अद्वैतवाद

दादूदयाल के दर्शन में अद्वैतवाद का सैद्धांतिक आधार पूरी प्रखरता के साथ निर्मित होता है। उनकी सम्पूर्ण वाणी का सार आध्यात्मिक साधना ही है। अन्तर्यामी का दर्शन ही उनका सर्वस्व है, जिसमें आद्योपान्त प्रेम रस की एकान्त व्याप्ति रहती है।

हिन्दी साहित्य का भक्तिकाल पूरे भारतीय साहित्य में अपना विशिष्ट स्थान रखता है, क्योंकि इसमें दर्शन को काव्य में ढालकर प्रस्तुत किया गया है। सन्त कवियों ने उपनिषदों के परम तत्त्व को वाणी देने का सफल प्रयास किया है, अतः सन्त काव्य धारा को हम सीधे उपनिषदों से भी जोड़ सकते हैं।

इन सन्त कवियों को कवि की अपेक्षा दार्शनिक तत्त्व-द्रष्टा कहना अधिक संगत जान पड़ता है। सभी सन्तों के विचारों में अनेक दार्शनिक विचारों का प्रतिपादन हुआ है। इसलिए उनकी दार्शनिक व्यवस्था व्यापक पृष्ठभूमि पर आधारित है। सन्तों के दार्शनिक विचारों की एकरूपता उनकी अत्यन्त व्यापक मानवीय उदार चेतना एवं प्रगतिशील दृष्टि का प्रतिफल है।

 सन्त साहित्य का दर्शन उपनिषद, वेदान्त, गीता, जैन, बौद्ध, नाथ आदि की आस्था रूपी अनुभूतियों के तत्त्वों को मिलाकर समृद्ध हुआ है। यह दर्शन स्वानुभूत है, स्वअर्जित है। वस्तुतः मध्यकाल का सन्त काव्य भारतीय संस्कृति के इतिहास का पृष्ठवंश है। उस समय अनेक दार्शनिक विचारधाराएँ प्रचलन में थी।

इन अनेक धाराओं का विचित्र संगम सन्तमत में देखा जाता है। हिन्दी का सन्त काव्य सांस्कृतिक एवं दार्शनिक संगम काल का साहित्य है, जिसमें भक्ति और उपासना की धारा प्रवाहित है। सन्त धर्म, मोक्ष और भक्ति को साध्य मानते है और उसमें भी भक्ति को सर्वोपरि साध्य मानते हुए आध्यात्मिक साधना की उपलब्धि करते हैं।

उनकी सम्पूर्ण वाणी का सार आध्यात्मिक साधना ही है। अन्तर्यामी का दर्शन ही उनका सर्वस्व है, जिसमें आद्योपान्त प्रेम रस की एकान्त व्याप्ति रहती है। यही दादूदयाल के दर्शन में अद्वैतवाद का आधार है।

कबीर तथा अन्य सन्तों की भाँति सन्त दादू दयाल सन्त पहले और कवि बाद में थे। उनका एकमात्र उद्देश्य अपने उपदेशों को जन-जन तक पहुँचाना ही था। सन्त दादू की वाणी की दार्शनिकता भी उनकी दार्शनिक मान्यताओं की प्रौढ़ता की परिचायक है।

ऊपरी स्तर पर हमें यह लगता है कि दादू ब्रह्म, आत्मा, माया, जगत, कर्म, ज्ञान आदि उन्हीं मान्यताओं को दोहराते है, जो उनकी पूर्व-परम्परा द्वारा स्थापित की गई थी, परन्तु सन्त दादू की रचनाधर्मिता में गहरे उतरने पर पता चलता है कि दादू जी विभिन्न दार्शनिक स्थितियों को स्पष्ट करने के लिए लीक से हटकर भी सोचते हैं। वस्तुतः यही उनकी मौलिक देन कही जा सकती है।

हिन्दी कविता के हजार वर्षों के इतिहास में सन्तों ने अपने काव्य-सृजन द्वारा एक विशिष्ट स्थान बनाया है। सन्तों ने अपनी सहज वाणी द्वारा जिस आध्यात्मिक, सांस्कृतिक तथा सामाजिक एकता का मृदुल स्वर सुनाया है, वह निस्सन्देह अनुपम है और सन्त दादू इस परम्परा में एक विशिष्ट स्थान के अधिकारी है। यही वह पृष्ठभूमि है जहाँ दादूदयाल के दर्शन में अद्वैतवाद का सैद्धांतिक आधार पूरी प्रखरता के साथ निर्मित होता है।

दादू की वाणी में एक कोमलता है, प्रांजलता है, माधूर्य है, विनय है, गरिमा है। उनकी वाणी सहज रूप से प्रवाहित है। मध्यकाल की राजनीतिक उथल-पुथल, आर्थिक, सामाजिक, धार्मिक वैमनस्य, रूढ़ियों एवं अन्धविश्वासों के विपरीत समाज में सन्त दादू का आविर्भाव हुआ था।

 ऐसे समय में दादू ने युगीन समाज का नैतिक-उत्थान करके अध्यात्म के मार्ग पर अग्रसर किया। भारतीय मध्ययुगीन संस्कृति के निर्माण में भी दादू जी का अहम् योगदान है। दादू पर अनेक दार्शनिक सिद्धान्तों का प्रभाव पड़ा है।

उनके दार्शनिक सिद्धान्तों पर उपनिषदों से लेकर मध्यकालीन निर्गुण सन्त कवियों का प्रभाव परिलक्षित होता है। निर्गुण कवियों में वे कबीर से ज्यादा प्रभावित होते दिखते हैं। हम यहाँ सन्त दादू दयाल के दार्शनिक सिद्धान्तों की विवेचना करेंगे, जिससे दादूदयाल के दर्शन में अद्वैतवाद के वास्तविक स्वरूप को भली-भांति समझा जा सके।

दादूदयाल के दर्शन में अद्वैतवाद – मुख्य दार्शनिक सिद्धान्त

ब्रह्म

सत्य अन्वेषी सन्तों के सिद्धान्त वास्तव में स्वानुभूति पर आधारित होते हैं। उनका अपना अनुभव ही उनके सिद्धान्तों का कारण बनता है। अनुभूति के सूक्ष्म साँचे में ढलकर ही उनके व्यक्तिगत विचार सिद्धान्तों में परिवर्तित हो जाते हैं। इसके लिए उन्हें कहीं इधर-उधर भटकना नहीं पड़ता। वे तो मन ही मन उन्हें अनुभूत होते हैं। सभी साधकों का साध्य परम तत्त्व होता है और उसकी सिद्धि भक्ति और ज्ञान दोनों ही से जानी जाती है।

ध्यातव्य है कि साधना की विविधता के कारण साध्य तत्त्व के नामों में अन्तर आ जाना स्वाभाविक है। किस साधक ने किन नामों का व्यवहार किया है, इससे उस साधक की साधना-परम्परा और साधना का स्वरूप दोनों का पता चलता है।

सभी सन्त कवियों के आराध्य को लक्षित करने पर पता चलता है कि उनके यहाँ राम की अपेक्षा सभी अवतारी नामों का अभाव है। इससे यही प्रकट होता है कि उनका राम परब्रह्म है, और यही विचार दादूदयाल के दर्शन में अद्वैतवाद की नींव को सुदृढ़ करता है। दादूदयाल के पंचवाणी संग्रह में अद्वैतवाद के प्रमुख सिद्धांतों के दर्शन होते हैं।

उपासकों की चितवृत्ति एवं मन की अवस्था के अनुसार सन्तवाणी में ब्रह्म का स्वरूप-वर्णन तीन प्रकार से मिलता है – निर्गुण ब्रह्म, सगुण ब्रह्म और सगुण-निर्गुण मिश्रित ब्रह्म। निर्गुण ब्रह्म का स्वरूप-निरूपण इसीलिए असम्भव हो जाता है क्योंकि इसे न मन के द्वारा माना जा सकता है, न वाणी और इन्द्रियों आदि के माध्यम से ही। इसकी केवल संकेतार्थक अभिव्यक्ति ही संभव हो पाती है, जो कि दादूदयाल के दर्शन में अद्वैतवाद का एक अनिवार्य पक्ष है।

हिन्दू दर्शन-शास्त्रों में ब्रह्म को दो रूपों – निरूपाधि एवं सोपाधि में स्वीकार किया गया है। भक्ति-साहित्य की चार धाराओं में इस विषय की अलग-अलग व्याख्या की गई है। सन्त दादू ने भी अपनी कविता में ब्रह्म के इन विभिन्न रूपों का विशद् वर्णन किया है।

उनके ब्रह्म-निरूपण में भी आत्मानुभूति और आत्मविचार की प्रमुखता रही है; स्वानुभूत व निजी विचार उनके इन सिद्धान्तों का मूल है। वे भी ब्रह्म की सर्वव्यापकता, एकेश्वरवाद, अभेदत्व तथा सगुण एवं निर्गुण आदि रूपों को स्वीकार करते हैं।

यहाँ दादूदयाल के दर्शन में अद्वैतवाद की तार्किक संगति साफ दिखाई देती है। सन्त दादू का मानना है कि जब अंतःकरण में अनुभूति की उपज होती है तब सभी प्रकार के भय व भ्रम आदि दूर हो जाते हैं तथा सर्वत्र पूर्ण ब्रह्म का प्रकाश व्याप्त हो जाता है –

जब घटि अनभै ऊपजै, तब किया करम का नास।

भै भरम भागे सबै, पूरन ब्रह्म प्रकास।।

निर्गुण ब्रह्म की धारणा मूलतः उपनिषदों और शंकर-वेदान्त में पाई जाती है। सन्तों ने भी अपने निर्गुण ब्रह्म का स्वरूप-निरूपण बहुत कुछ उपनिषदों के आधार पर ही किया है। निर्गुण से हमारा अभिप्राय गुण रहित न होकर गुणातीत अर्थात् सत्व, रज और तम तीनों गुणों की सीमा के परे से है।

निर्गुण ब्रह्म अगम्य है, मन और बुद्धि की पहुँच से परे है और वाणी उसके विषय में कुछ भी कहने में मौन है। ब्रह्म के इन लक्षणों को समाहित करते हुए दादूदयाल के दर्शन में अद्वैतवाद की विशद व्याख्या सन्त दादू ने इन शब्दों में की है –

परब्रह्म पर्रापरं, सो ममदेव निरं जनं।

निराकारं निर्मलं, तस्य दादू वंदनं।।

वैदिक निर्गुण ब्रह्म की परम्परा के अनुसार ही दादू का ब्रह्म अंजन, आकार व विकार से रहित निरंजन, निराकार व निर्मल है – पूरन ब्रह्म अखिल अविनासी।

उपनिषदों के आधार पर दादू ने ब्रह्म के परम तत्त्व के स्वरूप को इस प्रकार हमारे सामने रखा है, जो अंततः दादूदयाल के दर्शन में अद्वैतवाद को ही पुष्ट करता है –

बिन श्रवणहु सब कुछ सुणै, बिन नैनहु सब देखै।

बिन रसना मुख सब कुछ बोलै, यहु दादू अचरज देखै।।

उस परम पिता के ‘तेज-पुंज’ का वर्णन करते हुए दादू कहते हैं –

दह दिसि दीपक तेज के, बिन बाती बिन तेल।

चहुँ दिसि सूरज देखिये, दादू अद्भुत खेल।।

कबीर की भाँति वे भी उस परम तत्त्व को सर्वव्यापी और अद्वितीय मानते हैं, जो कि दादूदयाल के दर्शन में अद्वैतवाद का मुख्य लक्षण है। उस ब्रह्म के अनेक नाम हैं –

दादू सिरजनहार के, केते नाम अनंत।

चिति आवै सो भजिये, यूं साधु सुमिरें संत।।

कबीर, रविदास (रैदास), नानक और दादू आदि सन्तों ने परमतत्व या परब्रह्म के लिए राम शब्द का प्रयोग किया है। सच तो यह है कि राम के नाम के बिना जीव की भीतरी जलन दूर नहीं हो सकती, चाहे कोई कितने ही उपाय क्यों न कर ले –

एक राम के नांव बिन, जिवकी जलनिन जाइ।

दादू के ले पचि मुए, करि करि बहुत उपाइ।।

ईश्वर की सर्वशक्तिमत्ता का वर्णन भी दादू ने अनेक साखियों में किया है –

दादू समरथ सब विधि सांइयाँ, ताकि मैं बलि जाऊँ।

अंतर एक जु सो बसै, औरां चित्त जाऊँ।।

वे साधक को द्वैतभाव से दूर होकर अपने अन्तःकरण में ब्रह्म को देखने के लिए कहते हैं –

दादू जब पूरण विचारियै, तब सकल आत्मा एक।

काया के गुण देखियै, तो नाना वरण अनेक।।

सन्त दादू सांसारिक व्यक्तियों द्वारा ब्रह्म को खण्ड-खण्ड करके देखने का विरोध करते हैं, क्योंकि यह विरोध दादूदयाल के दर्शन में अद्वैतवाद की अखंडता के प्रतिकूल है –

खंड-खंड करि ब्रह्म को, पखि-पखि लिया बांटि।

दादू पूरण ब्रह्म तजि, बंधे भरम की गांठि।।

अन्यत्र –

दादू हीरा पग सौ ठेलि करि, कंकर को कर लीन्ह।

परब्रह्म को छाड़ि करि, जीवन सौ हितु कीन्ह।।

वे चाहते है कि उसे जैसा है, वैसा ही देखा जाए –

एक कहू तो दोइ है और दोइ कहूं तो एक।

यों दादू हैरान हैं ज्यों हैं त्यों ही देख।।

दादू का मत है कि परमपिता एक है और सभी जीव उसके अंश हैं। परमपिता परमेश्वर स्वयं अमर है, अतः उसके अंश जीव भी अमर होंगे। यह तादात्म्य दादूदयाल के दर्शन में अद्वैतवाद को पूर्णतः प्रमाणित करता है। दादू का कथन है –

दादू पक्षी जलचर कीट पतंग राय।

दादू परमेश्वर के पेट का सब जीव अंश अवतार।।

दादू ने ब्रह्म का निवास-स्थान मनुष्य का हृदय बताया है –

दादू मुझ ही माहै, मैं रहूं मैं मेरा घर-बार।

मुझ ही मां है मैं बसो, आप कहे करतार।।

यह संसार ही ब्रह्म की क्रीड़ा स्थली है –

दादू राजस करि उत्पति करै, सातिग कर प्रतिपल।

तामस करि परलै करे, निरगुण कौतिगहार।।

दादू राम से जीव के मिलन का उपाय बताते हुए कहते है कि पवित्र हृदय वाला सन्त और सृष्टिकर्त्ता ईश्वर उसी प्रकार मिल जाते है, जिस प्रकार दूध में पानी और पानी में नमक घुल जाता है। इसी प्रकार जीव और ब्रह्म एकाकार हो जाते हैं और यही अवस्था दादूदयाल के दर्शन में अद्वैतवाद की पराकाष्ठा है –

दादू ज्यों जल मिलै दूध मैं, त्यूं पानी में लूंन।

ऐसे आतम राम सौं, मन हठ साधै कूंन।।

गुरु की कृपा से ही जीव ब्रह्ममय हो सकता है –

सतगुरु भेद बताईया, तब पूरा पाया।

नैननि ही निरशौं सदा, धरि सहजै आया।।

इस प्रकार दादू परब्रह्म को शून्य, सर्वव्यापक, अलख, अगोचर, निर्गुण-सगुण से परे मानते हैं। सर्वत्र वही है, उसी का प्रकार है। दादू जी प्रधानतः अद्वैतवाद के समर्थक होते हुए भी कभी-कभार भावावेश की चरम सीमा पर पहुँचकर ब्रह्म को निराकार मानते हुए भी साकार भाव वाले नामों से पुकारे जाते है।

दादू का राम अति रहस्यमय और अगाध है, जिसे सरलता से प्राप्त नहीं किया जा सकता। वह अव्यक्त है, असीम है और अनंत है। दादू-काव्य में ब्रह्म को अनेक अभिधानों जैसे – अल्लाह, करीम आदि नामों से पुकारने के पीछे शायद उस समय के प्रचलित अन्य धर्मों में सामंजस्य स्थापित करने की भावना विद्यमान रही होगी।

दादू ने ब्रह्म तत्व को ही अनुपम तत्व माना है। वह एक होते हुए भी अनेक है और अनेक रूपों में भी एक है। इस प्रकार दादूदयाल के दर्शन में अद्वैतवाद विभिन्न मतों के बीच एक समन्वयकारी सेतु के रूप में प्रतिष्ठित होता है।

जीव (जीवात्मा)

अद्वैतवादी सन्तों ने जीवात्मा को परमात्मा का ही अंश माना है। उनके अनुसार जीव के लिए आत्मा ही चैतन्य शक्ति है, जो वस्तुतः असीम व अनन्त चैतन्य शक्ति का ही प्रतिरूप है। अतः कहा जा सकता है कि आत्मा और परमात्मा में कोई भेद नहीं है। सन्तों के आत्मा विषयक विचार प्रधानतः उपनिषदों और गीता से पर्याप्त समानता रखते है।

यह आत्म तत्व ही पूरे संसार में परिव्याप्त है और इसी को लोग विश्वात्मा भी कहते हैं। इस प्रकार दादूदयाल के दर्शन में अद्वैतवाद जीव और शिव की तात्विक एकता को सहर्ष स्वीकार करता है। सन्त कबीर इसे कुम्भ के दृष्टान्त द्वारा बखूबी स्पष्ट करते हैं –

जल में कुंभ है कुंभ में जल, बाहर भीतर पानी।

फूटा कुंभ जल जलहि समाना, यह तत कथा गियानी।।

(कबीर ग्रंथावली, सं. श्याम सुन्दर दास)

गीता में आत्मा को अभेद, अकाट्य, अदाह्य, नित्य, सर्वगत, निश्चल और सनातन कहा गया है –

नैन छिन्दन्ति शस्त्राणि नैनं दहति पावकः।

चैनं क्लेदयन्त्यापो शोषयति मारूतः।।

अच्छेद्योऽयमदाह्योऽयमक्लेद्योऽशोष्यएव च।

नित्यः सर्वगतः स्थाणुरचलोऽयं सनातनः।।

(श्रीमद्भगवद्गीता, अध्याय-2, श्लोक 23, 25)

अद्वैतवाद के प्रतिपादक जगत-गुरु शंकराचार्य ने अन्तःकरण के द्वारा अविच्छिन्न चैतन्य को जीव की संज्ञा प्रदान की है। अद्वैतवाद के अनुसार आत्मा और परमात्मा में नितान्त एकता है। दादू भी इसी सिद्धान्त का वर्णन करते हुए कहते हैं –

जामे मरै जो जीव है, रमिता राम होइ।

जामण मरण से रहित, मेरा साहिब सोइ।।

दादू जी प्रत्येक व्यक्ति के भीतर ब्रह्म का निवास मानते हैं। लेकिन भ्रमवश वह (जीव) इस ज्ञान से अनजान रहता है। समस्त क्रियाओं का कर्त्ता वास्तव में जीव नहीं, बल्कि दूसरी ही सत्ता हुआ करती है –

कर्त्ता ह्वै करि सब कुछ करे, उस माहि बतावै।

दादू उसको पूछिये, उत्तर नहिं आवै।।

सन्त दादू का मानना है कि परमात्मा ने जीवन-मृत्यु के साथ जीव को देह प्रदान की है जिसे लेकर जीव इस जगत में उत्पन्न हुआ है। अतः काया के वश में सभी जीव रहा करते हैं – काया के सब गुण सब बंधे, चौरासी लाख जीव।

परन्तु इसे दुर्भाग्य ही कहा जाएगा कि ये जीव सांसारिक विषय-वासनाओं की ओर ही ज्यादा आकर्षित होते हैं, फलतः परमात्मा का साक्षात्कार नहीं कर पाते। इन सांसारिक बंधनों का विवेचन करते हुए दादूदयाल के दर्शन में अद्वैतवाद की व्यावहारिक कसौटी स्पष्ट होती है –

जहाँ कनक अरू कामिनी, जीव पतंगे जाहि।

आगि अनंत सूझे नहीं, जलि जलि मूये माहि।।

यही जीव जब माया के आवरण से मुक्त हो जाता है और माया का आवरण समाप्त हो जाता है, जब यह जीव ब्रह्म-रूप हो जाता है –

आदि अंति मधि एक रस, टूटे नहिं धागा।

दादू एकै रहि गया, तब जागी जागा।।

जब जीव उस असीम शक्ति में लीन और एकरस हो जाता है, तभी वह एक एकमेक बन जाता है। दादू ने आत्मा का वर्णन अद्वैत वेदान्त दर्शन के अनुसार ही किया है, जो अकाट्य रूप से दादूदयाल के दर्शन में अद्वैतवाद की पुष्टि करता है –

दादू सहज सरोवर आत्मा, हंसा करै किलोल।

सुख सागर सूभर भन्या, मुक्ता हल अनमोल।।

दादू की मान्यता है कि जीव किसी भी प्रकार की कामना आदि न करे ताकि सगुण निर्गुण हो जाए और जीव इस प्रकार आसक्ति से अनासक्ति की ओर पहुँच जाए। इससे उसे ब्रह्मतत्व की गति प्राप्त हो सकेगी –

कछू कीजै कामनां, सगुण निर्गुण होइ।

पलटि जीव तै ब्रह्म गति, सब मिलि मानै मोहि।।

जीव देह का सूक्ष्म रूप है तो आत्मा सूक्ष्मतम स्वरूप है। एक ओर जीव इन्द्रियों के अधीन रहने के कारण परतंत्र रहता है तो दूसरी ओर आत्मा स्वतन्त्र व मुक्त रहती है। अतः जीव अहं, स्वार्थ, काम, क्रोध, लोभ और मोह आदि से अभिभूत रहता है तो आत्मा इन सबसे अनासक्त व निर्लिप्त रहती है।

जीव में अनेकत्व का भाव विद्यमान रहता है तो आत्मा में एकत्व की भावना। जीवन जन्म-मरण व पुनर्जन्म से जुड़ा है तो आत्मा इन सबसे रहित है। जीव अंतयुक्त है तो आत्मा अनन्त है। जीव और आत्मा दोनों ही परमसत्ता के अंश मात्र हैं। जीव और आत्मा में यही सूक्ष्मतम भेद है कि जीवात्मा की चैतन्य-शक्ति आत्मा है तो इसी आत्मा का सांसारिक स्वरूप जीव है।

यह जीवात्मा एक सच्चे गुरु के मार्गदर्शन में ही ब्रह्ममय हो सकती है। गुरु की शरण में ही जीव अपने कर्म-बन्धनों से मुक्त होकर परमात्मा से एकाकार हो पाती है। अतः जहाँ आत्मा है, वहीं परमात्मा है। सन्त दादू इसी सनातन परम्परा का अनुसरण करते हुए कहते हैं कि आत्मा और परमात्मा जल और सागर के समान एक हैं, जो कि दादूदयाल के दर्शन में अद्वैतवाद का चरम सोपान है –

पर आतम सो आत्मा, ज्यूं हंस सरोवर मांहि।

हिलि मिलि खेलें पीव सों, दादू दूसरा नांहि।।

यही कारण है कि जब साधक को आत्म-दर्शन होता है, तभी उसे परमात्मा के दर्शन भी सुलभ हो जाते हैं –

अपने नैनहु आपकौ, जब आतम देखै।

तहं दादू पर आत्मा, ताही कूं देखै।।

ऐसी ही गहन अनुभूति के क्षणों में दादू भाव-विह्वल होकर पुकार उठते हैं –

जब दिल मिला दयाल सों, तब अंतर कुछ नाहिं।

ज्यों पाला पानी कौं मिला, त्यों हरिजन हरिmahiं।।

सिद्ध साधक जीव और ब्रह्म को या आत्मा और परमात्मा को अलग नहीं मानते। अतः दादू जीवात्मा व परमात्मा को इसी मूलभूत एकता के समर्थक हैं –

दादू जल में गगन गगन में जल है,

पुनि वे गगन निराले।

ब्रह्म जीव इहि विधि रहै, ऐसा भेद विचारै।।

इस प्रकार सन्तों ने सनातन परम्परा का समर्थन करते हुए जीवात्मा को परमात्मा का ही अंश माना है। माया के कारण जीवात्मा अपने को भिन्न मानने लगती है तथा आत्म-स्वरूप का ज्ञान हो जाने पर जीवात्मा परमात्मा में एकाकार हो जाती है।

 शायद ही जीव के वर्णन में दादू ने कोई पहलू छोड़ा हो। वे जीव और ब्रह्म में अभेद भावना के समर्थक हैं तथा दोनों को एक ही सत्ता मानते हैं। इस प्रकार दादू की मुक्ति जीव का ब्रह्म हो जाना नहीं बल्कि जीव का ब्रह्म के साथ अपना सहज सम्बन्ध स्थापित करना है। वस्तुतः यह विचार दादूदयाल के दर्शन में अद्वैतवाद को एक नया वैचारिक विस्तार देता है।

जगत

जगत की उत्पत्ति और स्थिति सन्त-साहित्य में ही नहीं बल्कि प्राचीनकाल से मानव के चिन्तन का विषय रही है। जगत क्या है? इसके निर्माण का प्रयोजन क्या है? इसका कारण कौन है? इन गम्भीर प्रश्नों का उत्तर एक गम्भीर पहेली है। अधिकतर सन्तों ने जगत के ‘मिथ्यात्व’ का ही निरूपण किया है।

निर्गुणी सन्तों का मानना है कि यह संसार स्वप्नवत है और इसमें जितनी भी वस्तुएँ हैं, वे सारी की सारी मिथ्या हैं। इसके हर्ष, विषाद, मान-अपमान, जाति-कुल, वर्ण-आश्रम सभी मिथ्या हैं (सन्त साहित्य में दार्शनिक सिद्धान्त, डॉ. चौरसिया, पृ. 103) विभिन्न धर्मों एवं दर्शन-ग्रंथों में जगत की सत्ता को लेकर परस्पर विरोधी विचारधाराएँ मिलती हैं।

सन्तों की जगत विषयक विचारधारा अद्वैत वेदान्त से प्रचलित है। वैदिक-साहित्य में सृष्टि की उत्पत्ति और विकास से सम्बन्धित अनेक उक्तियाँ मिलती हैं।

ऋग्वेद का नासदीय सूक्त सृष्टि-विकास का बड़ा ही वैज्ञानिक स्वरूप हमारे सामने प्रस्तुत करता है, जिसके अनुसार – “आरम्भ में न संत, न अन्तरिक्ष और न व्योम था; चारों ओर अंधेरा था, जल था; किन्तु प्रकाश नहीं था। यदि उस समय कोई था तो एकमात्र अव्यक्त चेतन (तपस) था, उसी से सृष्टि (जगत) का निर्माण हुआ।” (भारतीय दर्शन, वाचस्पति गैरोल, पृ. 35)

उपनिषदों में भी जगत की उत्पत्ति सम्बन्धी मान्यताएँ प्रकट हुई हैं – “ब्रह्म सत है। वह सर्वव्यापी, नित्य, अनंत और शुद्ध चैतन्य है। वही सबकी आत्मा है, उसी से जगत की उत्पत्ति हुई।” (भारतीय दर्शन, वाचस्पति गैरोल, पृ. 41)

गीता में भी कहा गया है कि – “जड़ और चेतन के संयोग से ही जगत की उत्पत्ति हुई है” (भारतीय दर्शन, वाचस्पति गैरोल, पृ. 54)।

दादू जगत की उत्पत्ति का कारण ईश्वर को ही बताते है। उस परमपिता ने परोपकारी भावना से ही जगत का निर्माण किया है, जो दादूदयाल के दर्शन में अद्वैतवाद के सृजनात्मक पक्ष को आलोकित करता है –

खालिक खेलै खेल करि, बूझै बिरला कोइ।

ने करि सुखिया भया, देकरि सुखिया होइ।।

सन्त दादू इस संसार को बाजीगर की एक बाजी के समान मानते है, जो सबको मोहित करती है –

भाई रे बाजीगर नट खेला, जैसे आपै रहे अकेला।

यह बाजी खेल पसारा, सब मोहे को तिग हारा।।

दादू सृष्टि का मूल उपादान कारण ब्रह्म को ही मानते हुए, उसी से ही इस जगत के प्रयोजन के बारे में विनम्रतापूर्वक सवाल करते हैं –

क्यों करि यहु जग रच्यौ गुसाई

तेरे कौन विनोद बसे मनमाहीं।।

दादू पर शंकराचार्य का प्रभाव दिखाई देता है। शंकरमत में ईश्वर, ब्रह्म या परमात्मा को ही सत्य माना गया है। इसके अतिरिक्त संसार में प्रत्येक कुछ असत्य व मिथ्या है और यह स्थापना दादूदयाल के दर्शन में अद्वैतवाद का एक मुख्य स्तंभ है। दादू ने जगत को स्वप्न के समान माना है –

सुपिनै सब कुछ देखिये, जागै तो कछु नाहि।

ऐसा यहु संसार है समझि देखि मन मांहि।।

दादू ने इस संसार को प्रपंच कहा है – पाखंड की यह धरती, प्रपंच का संसार।

दादू इस जगत को ब्रह्म का कर्मक्षेत्र मानते हुए कहते हैं –

दादू सब जग मारि-मरि जात है, अमर उपावणहार।

रहता रमिता राम है, बहता सब संसार।।

यह संसार कुम्हार के चाक के समान निरन्तर घूमता रहता है अर्थात् हर पल परिवर्तनशील है। यह जगत कांटों की सेज है। इस भवसागर से पार लगाने के लिए राम-नाम रूपी पतवार का सहारा मिलना अति आवश्यक है, जो अंततः दादूदयाल के दर्शन में अद्वैतवाद के अनुसार जीव को पार लगाने का मार्ग सुगम करती है –

दुःख दरिया संसार है, सुख का सागर राम।

सुख सागर चलि जाइए, दादू तज बेकार।।

इस जगत में कोई वस्तु स्थिर नहीं है जो इस संसार को त्यागकर ईश्वर की शरण ले लेता है, उसको कोई नहीं मार सकता –

दादू तजि संसार सब, रहै निराला होइ।

अविनासी के आसरै, काल लागै कोइ।।

जगत का नाना रूपों में वर्णन करने के बावजूद सन्त दादू जगत के मिथ्यात्व की बात करते हुए इससे दूर रहने का उपदेश देते हैं –

दादू सब बातनि की एक है, दुनिया के दिल दूरि।

साईं सेती संग करि, सहज सुरति लै पूरी।।

दादू इस संसार को दुखों का मूल मानते हैं –

दुख दरिया संसार है, सुख का सागर राम।

सुख सागर चलि जाइए, दादू तज बेकाम।।

दादू ने इस संसार में हर रिश्ते-नाते को मिथ्या माना है –

दादू झूठी काया, झूठा घर, झूठा यहु परिवार।

झूठी माया देखि करि, फूल्यौ कहा गँवार।।

दादू के अनुसार यह जगत दुखमय है। जिसे देखो वही दुखी है। राजा से रंक तक यहाँ सभी दुखी हैं और केवल सन्त ही सुखी हैं। लेकिन यह संसार मिथ्या होते हुए भी मानव-मुक्ति का उपाय है। मानव जीवन को सुयोजनपरक, सार्थक और उपयोगी बनाने का पवित्र कार्य इस जगत में ही सम्भव हो पाता है।

इस संसार में रहते हुए ही मानव तन की साधना के द्वारा ही जीव को मुक्ति प्राप्त होती है, जो दादूदयाल के दर्शन में अद्वैतवाद के व्यावहारिक धरातल को उजागर करती है।

सन्तों का शब्द ब्रह्म से जगत की उत्पत्ति का यह सिद्धान्त पूर्णतः वैदिक है। सन्त दादू सृष्टि तत्व का निरूपण करते हुए कहते हैं –

पहली कीया आप थे, उतपति वो अंकार।

वो ऊंकार थैं ऊपजै, पंचतत आकार।।

अतः जीव के लिए यह संसार बन्धन मात्र है। दादू ने जगत की क्षणभंगुरता को स्पष्ट किया है एवं इसकी निस्सारता की ओर संकेत किया है –

मृग जल देखि तहाँ मन धावै, दिन दिन झूठी आसा।

अहूँ जहूँ जाइ तहाँ जल नाहीं, निहचै मरै पियासा।।

माया

वैदिक काल से लेकर वर्तमान समय तक ‘माया’ शब्द का प्रयोग विभिन्न प्रकार से होता आया है। साधना के क्षेत्र में सर्वाधिक अवरोधी तथा प्रभावशाली शक्ति ‘माया’ है। इसका अस्तित्व संसार के कण-कण में परिव्याप्त है। यद्यपि जीव और ब्रह्म में अभेदता है।

दोनों एक ही सत्ता है तथापि आत्मा और परमात्मा के बीच विभेदक यह ‘माया’ ही है। सन्तों ने भी माया की इस अवरोधी शक्ति को पहचाना तथा माया से बचने के लिए प्रेरित किया है ताकि जीव भ्रमित न हो सके और लक्ष्य भ्रष्ट न हो। यहाँ दादूदयाल के दर्शन में अद्वैतवाद का वह अनुशासनात्मक पक्ष सामने आता है जो साधक को सचेत करता है।

ऋग्वेद और यजुर्वेद में माया इन्द्र की शक्तियों की प्रतीक, उपनिषद में ब्रह्म की सहचरी शक्ति के रूप में वर्णित हुई है। अद्वैत सिद्धान्त में यह त्रिगुणात्मिका, नामरूपमय और सम्पूर्ण संसार की बीज शक्ति मानी जाती है। (हिन्दी साहित्य कोश, भाग 2, पृ. 495-96) भगवद्गीता में ‘सम्भाव्यात्ममायया’ (श्रीमद्भगवद्गीता, 4/6/84) कहकर भगवान श्रीकृष्ण ने यह स्वीकार किया है कि मैं अपनी माया के द्वारा प्रकट होता हूँ।

यह माया ब्रह्म की शक्ति के रूप में वर्णित हुई है। परमेश्वर की प्रकृति को माया और परमेश्वर को मायापति कहा गया है। संसार के बंधन का मूल कारण यह माया ही है। इसलिए सन्तों ने माया की अनेक प्रकार से भर्त्सना की है। सन्तों ने माया को प्रपंचकारिणी तथा सांसारिक प्रलोभनों से युक्त बताया है।

इसी कारण जीव आवागमन के चक्र से मुक्ति प्राप्त नहीं कर पाता। यह माया इन्द्रजाल के समान है। जो भी इसके आकर्षण में आता है, वह इसी के साथ बंधता जाता है। यह माया अनेक रूपों में मनुष्य को ठगती रहती है। यह भक्तों को अनेक प्रकार के प्रलोभन देकर भक्ति से दूर करने का प्रयास करती है।

लेकिन सन्तों के सामने माया की एक नहीं चल पाती। इसलिए सन्तों ने अविद्या और अज्ञानजन्य माया का वर्णन किया है। सन्तों ने माया को नागिन, सर्पिणी, डाकिनी, मोहनी आदि नामों से पुकारा है। सन्त कमानी के अनुसार माया मोहिनी और महाठगिनी है –

कबीर माया मोहनी, जैसी मीठी खाँड।

सतगुर की माया भई, नहीं तो करती भांड।। (कबीर ग्रंथावली, सं. श्यामसुंदर दास)

दादू ने माया को कर्म-चक्र कहते हुए कहा है कि माया के भुलावे में आकर संसार स्वयं अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मारता है –

दादू करम कुहाड़ा, अंग वन काटन बारंबार।

अपने हाथों आपकूं, काटत है संसार।।

दादू जी माया की इसी विचित्रता के बारे में कहते हैं –

बिना भुवंगम हम डसे, बिन जल डूबे जाइ।

बिना पावक ज्यों जले, दादू कछु बसाइ।।

सन्त दादू ने माया को मृगजल और झूठी तिलमिलाहट की संज्ञा दी है, जो दादूदयाल के दर्शन में अद्वैतवाद के पारमार्थिक सत्य को समझने में सहायक है –

यहु सब माया मृगजल, झूठा झिल-मिल होइ।

दादू चिलका रैखि करि, संत करि जाना सोइ।।

कनक और कामिनी माया के दो प्रमुख साधन हैं। कंचन और कामिनी के अतिरिक्त काम, क्रोध, लोभ, मोह और अहंकार आदि भी माया के सहायक तत्व हैं, जिनके वशीभूत होकर कोई भी जीव अपने वास्तविक स्वरूप को विस्मृत कर बैठता है और माया इनके द्वारा सभी जीवों को अपने जाल में जकड़े रखती है। दादू कहते हैं –

काल कनक कामिनी, परिहरि इनका संगम।

दादू सब जग जलि मूवा, ज्यूं दीपक जोति पतंग।।

दादू जी ने इस माया के आवरण को दूर करने के लिए मायापति अर्थात् परमात्मा से प्रार्थना की है –

नाहिं प्रकट ह्वै रहा, है सो रहा लुकाय।

संइया परदा दूर कर, तू है प्रगट आय।।

माया मृत्यु का घर है। इस माया का आनन्द थोड़े समय के लिए होता है। इस माया के क्षणिक प्रभाववश अहंकारी हो जाना ठीक नहीं है –

दादू माया सुख पांच दिन, गब्यों कहाँ गवार।

सुपिनै पायो रामधन, जात लागे बार।।

यह माया सर्पिणी का रूप धारण करके सबको डसती है। यहाँ तक की ब्रह्मा, विष्णु और महेश भी इससे बच नहीं पाते हैं –

माया सापिणी जब डसै, कनक कामिनी होइ।

ब्रह्म, विष्णु, महेश लौ, दादू बचै कोइ।।

दादू ने अलग-अलग रूपों में माया का विश्लेषण किया है जो विभिन्न सिद्धान्तों पर आश्रित है –

माया का ठाकुर किया, माया ही महामाई।

ऐसे देव अनंत करि, सब जग पूजन जाइ।।

नारी और पुरुष अविद्या के कारण इसी माया के दो रूप हैं, परन्तु इस विभेद को दूर करना ही जीव का परम लक्ष्य होना चाहिए। सन्त दादू कहते हैं –

माता नारी पुरूष की, पुरूष नारि का पूत।

दादू ज्ञान विचारि करि, छाड़ि गए अवधूत।।

ईश्वर का स्मरण करने से ही मुक्ति मिलती है। अतः जीव को सभी बातों को छोड़कर मुक्ति का पथ तलाशना चाहिए। परन्तु जीव तो माया को देखकर प्रसन्नता अनुभव करता है और इसी प्रकार उसकी तृष्णा बढ़ती ही चली जाती है –

माया देखे मन खुसी, हिरदै होइ विकास।

दादू यह रीत जीव की, अंत पूगै आस।।

इस प्रकार हम कह सकते हैं कि जब तक मन में ब्रह्म की अनुभूति नहीं होती, तब तक माया का प्रभाव दृष्टिगोचर होता है। ईश्वरीय ज्ञान प्राप्त करके सच्चा साधक बना जा सकता है। माया रूपी पिंजरे से जीव की मुक्ति सत्पुरुष की कृपा से ही संभव हो सकती है और ईश्वर-कृपा प्राप्ति के लिए सद्गुरू की शरण में जाना जरूरी होता है।

सन्तों ने माया को ब्रह्म की शक्ति मानते हुए उसकी आकर्षण शक्ति को भी स्वीकार किया है, जिसके आकर्षण के कारण ही जीव अपने वास्तविक स्वरूप को भुलाकर मिथ्या जीवन जीता है। दादू ने भी माया का सम्बन्ध मन से जोड़ते हुए और भ्रम का रूप मानते हुए इसे विभिन्न रूपों में चित्रित किया है। उसका प्रसार सर्वत्र है।

सारे संसार की ठकुरानी होते हुए भी यह माया सन्तों की दासी है। सन्त दादू ने व्यावहारिक स्तर पर माया की भर्त्सना की है तथा इससे बचने का उपदेश दिया है। दादू का माया सम्बन्धी चिन्तन सन्त काव्य के पारम्परिक चिन्तन में एक महत्वपूर्ण कड़ी है, जो अंततः दादूदयाल के दर्शन में अद्वैतवाद के मूल स्वरूप को और अधिक चमका देता है।

मोक्ष (मुक्ति)

सन्तों का मोक्षविषयक चिन्तन वेदान्त के अनुरूप है जो विशेषतः उपनिषदों तथा गीता से प्रभावित है। उपनिषदों में जो अवस्था ‘जीवन्मुक्त’ की कही गई, गीता में उसे ‘स्थितप्रज्ञ’ कहा गया है, बौद्ध धर्म में उसे ‘बोधिसत्व’ नाम दिया गया है तो सन्त उसे ‘मरजीवा’, ‘जीवन्मृतक’ अथवा ‘जीवन्मुक्त’ कहकर पुकारते हैं। भारतीय अध्यात्म व दर्शन में जीवात्मा का जीवन-मरण या पुनर्जन्म के बन्धन से निजात पाना ही ‘मुक्ति’ है।

यह निर्विवाद भाव से कहा जा सकता है कि भारतीय अध्यात्म व दर्शन में ‘मुक्ति तत्व’ का जितना मंथन हुआ है, उतना कहीं अन्यत्र नहीं हुआ है।

महाभारत के गीता के उपदेश में भगवान श्रीकृष्ण का यह महावाक्य कि “सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज, अहंत्वां सर्व पापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः” (श्रीमद्भगवद्गीता, 18/66) स्पष्टतः मुक्ति-प्रदाता सिद्ध हुआ है और यही सिद्धता दादूदयाल के दर्शन में अद्वैतवाद की सार्थकता का प्रमाण है।

मोक्ष अथवा मुक्ति का साधारण अर्थ है – छुटकारा। अतः जब जीव अहंकार से रहित होकर सब प्रकार के सुख-दुख, आशा-निराशा, हर्ष-शोक आदि द्वन्द्वों से मुक्त हो जाता है, उसे मोक्ष कहते हैं।

सन्त लोग मुक्ति को पूर्ण अद्वैतावस्था मानते हैं, जहाँ दादूदयाल के दर्शन में अद्वैतवाद अपनी पूर्ण महिमा के साथ प्रकट होता है। भारतीय चिन्तन इस तर्क पर एकमत है कि यह दृश्यमान जगत ही परम सत्य और इन्द्रियसुख ही परम सुख नहीं है।

वास्तविक सत्य और आनन्द तो कुछ ओर ही है और उसकी खोज में ही सभी दर्शन और उसकी विभिन्न दार्शनिक विचारधाराएँ प्रयत्नशील रहती है। लगभग सभी सन्तों ने अपने अनुभव के आधार पर इस बारे में पर्याप्त चिन्तन-मनन किया है। यह निर्वाचन अथवा मुक्ति ब्रह्मानन्द है, परम आनन्द है।

जीवात्मा का यही चरम लक्ष्य है तथा यही दृष्टिकोण भी। सन्त दादू जीवितअवस्था में ही मुक्ति प्राप्त करने पर अधिक बल देते हैं। उनके अनुसार जहाँ जीवित अवस्था में ही शरीर सारे गुणों से छूट जाए, जीवित रहते हुए सब कर्मबन्धनों से छुटकारा पा ले, वास्तव में वही मुक्ति है –

दादू जीवित छूटै देह गुण, जीवित मुकता हो।

जीवित काटै करम सब, मुकति कहावै सोइ।।

सन्त दादू मानते है कि जीवित अवस्था में भवसागर से पार न उतर पाना निश्चित ही संसार रूपी सागर में डूबने और विनाश को प्राप्त होने के समान है –

जीवित दूतर ना तिरै, जीवित लाधै वार।

जीवित निर्भय ना भये, दादू ते संसार।।

उनके अनुसार मृत्यु के पश्चात मुक्ति की बात करना एक बड़ी भूल है, क्योंकि दादूदयाल के दर्शन में अद्वैतवाद परोक्ष मुक्ति की अपेक्षा साक्षात् जीवन्मुक्ति का पुरजोर समर्थन करता है –

मूवां पीछे मुकति बतावै, मूवां पीछे मेला।

मूवां पीछे अमर अमै पद, दादू भूल गाहिला।।

सन्त दादू ने मुक्ति का पथ-प्रदर्शक ‘गुरु’ को माना है। उनका मानना है कि यदि सद्गुरु की प्राप्ति हो जाए तो भक्ति, मुक्ति आदि सब कुछ प्राप्त हो जाता है –

सतगुरु मिलै, पाइए, भगति मुक्ति भंडार।

दादू सहजै देखिए, साहिब का दीदार।।

सन्त दादू के मतानुसार इस मुक्ति रूपी परमपद की प्राप्ति उसी समय होती है जब आत्मा और परमात्मा का विभेद समाप्त हो जाता है –

परआतम सों आत्मा, ज्यों जल उदधि समान।

तन मन पाणी लोंण ज्यों, पावै पर निर्वाण।।

इस प्रकार दादू कहते हैं कि परमात्मा से हृदय मिल जाने के बाद सारे अंतर समाप्त हो जाते हैं और साधक उसी में तल्लीन हो जाता है। किन्तु साधक को इसके लिए सच्चा गुरु मिलना आवश्यक है, क्योंकि वही जीव को ब्रह्म का अनुभव, चिन्तन और मनन करा सकता है। जीवन मुक्ति का पथ-प्रदर्शक सद्गुरू ही हो सकता है।

जीव के लिए राम या ब्रह्म के साथ जीवित अवस्था में ही तादात्म्य स्थापित करना ‘जीवन्मुक्ति’ की अवस्था है। सन्त दादू भी इसी मान्यता के पक्षधर हैं और उनके अनुसार यही मुक्ति का सार भी है। यहाँ दादूदयाल के दर्शन में अद्वैतवाद का अंतिम और परम लक्ष्य पूरी तरह स्पष्ट हो जाता है।

निष्कर्ष

निष्कर्षतः हम कह सकते है कि सन्त-साहित्य का प्रभाव देश-काल की सीमा से परे है। उनकी व्यापकता विश्वव्यापी तथा विश्वजनीन थी। वे किसी धर्म, सम्प्रदाय, जाति, भाषा, क्षेत्र आदि से नहीं बंधे हुए थे। विश्व-कल्याण तथा विश्व बन्धुत्व की भावना के साथ आध्यात्मिक व सांस्कृतिक एकता स्थापित करना उनका मुख्य ध्येय था। यही कारण है कि सन्तों का प्रभाव सम्पूर्ण मानवता पर पड़ा। सन्त दादू दयाल का भारतीय धर्म साधना एवं सन्त साहित्य में महत्त्वपूर्ण योगदान है। दादू एक सन्त थे कवि नहीं; चिन्तक थे, दार्शनिक नहीं, उनका ज्ञान स्वानुभूतियों पर आधारित था, शास्त्रों पर नहीं। कविता करना उनका लक्ष्य न था, वे तो एक लोक कल्याणकारी धर्मोपदेशक थे।

इन सब तथ्यों के बावजूद उनकी वाणी में दर्शन की गूढ़ बातों का समावेश भी सहजता से हो गया है, जो दादूदयाल के दर्शन में अद्वैतवाद की स्वाभाविक परिणति को दर्शाता है। उन्होंने स्वयं को कभी दार्शनिक नहीं माना और न ही ऐसा कोई दावा ही कहीं किया।

उनके अन्तःकरण से जो स्वाभाविक उद्गार व्यक्त हुए थे, वे स्वानुभूति पर आधारित थे और वे ही उनके सिद्धान्तों का कारण बन गए।

सन्त दादू ने ब्रह्म, जीव, जगत, मुक्ति, साधना आदि के बारे में जो उद्गार व्यक्त किये हैं वे किन्हीं पुस्तकीय ज्ञान पर आधारित न होकर उनके सहज चिन्तन का परिणाम है। दादू जी के सिद्धान्तों में आत्मा-परमात्मा तथा जगत में अभेदमयी मौलिक एकता है। सन्त दादू की हिन्दी भक्ति साहित्य को महान देन है।

हम यह भी अनुभव करते हैं कि सन्त दादू तथा उनके पंथ से जुड़े हुए परवर्ती कवियों के साहित्य को आधुनिक सन्दर्भ में देखने, समझने और परखने की जरूरत है। महत्त्वपूर्ण बात यह है कि एक ओर निर्गुण कवियों की ज्योति को कबीरपंथी जलाए हुए हैं, तो दूसरी ओर निर्गुण चेतना की लौ को दादू पंथी।

दादू-पंथ का यह प्रासंगिक सन्दर्भ उनकी काव्यानुशीलन-दृष्टि से आज भी उतना ही सार्थक है जितना कि पहले था, क्योंकि दादूदयाल के दर्शन में अद्वैतवाद की प्रासंगिकता कभी कम नहीं हो सकती। आज के भौतिकवादी युग में भी इनकी वाणी आत्मिक और मानसिक शान्ति प्रदान कर रही है।

संदर्भ ग्रंथ :

१. सन्त दादू दयाल की बाणी, सं. पं. चन्द्रिका प्रसाद त्रिपाठी, वैदिक मंत्रालय, अजमेर, 1907

२. श्री दादू दयाल की बाणी, सं. स्वामी मंगलदास, वैद्य जयराम दास स्वामी भिषगाचार्य, जयपुर

३. दादू दयाल (ग्रन्थावली), सं. परशुराम चतुर्वेदी, नागरीप्रचारिणी सभा, काशी, वि. स. 2023

लेखक डॉ. मोहनलाल गुप्ता राजस्थान सरकार के सूचना एवं जनसम्पर्क विभाग में उपनिदेशक रहे हैं तथा सेवानिवृत्ति के बाद राजस्थान साहित्य अकादमी की सरस्वती सभा के सदस्य भी रहे हैं।

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