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संगत – डॉ मोहनलाल गुप्ता की कहानी

डॉ. मोहनलाल गुप्ता की संगत कहानी कूंडा पंथ एवं उंदरिया पंथ की मान्यताओं और क्रियाविधि पर आधारित है। यह कहानी वर्ष 1990 में कहानी संग्रह एक प्लेनेट की मौत में प्रकाशित हुई थी।

हीरा कोटवाल पूरे गाँव में दबे पाँव घूम गया है। शाम ढलने से पहले उसे गुरुजी का संदेसा (संदेश) जरगाजी के भक्तों को पहुँचाना है। इस सम्प्रदाय के बारे में केवल वे ही जानते हैं जो इस संप्रदाय के सदस्य हैं। सदस्य चूंकि पुश्तैनी हैं इसलिये हीरा जानता है कि जरगाजी के भक्तों के घर कौनसे हैं।

वह भक्त के घर पर पहुँच कर खास ढंग से खाँसता है। कूंडा अर्थात् भक्त या भक्तन उस खाँसी को सुनकर ही समझ जाते हैं कि हीरा कोटवाल आया है और संगत का संदेसा लाया है। अवश्य ही गुरुजी आस-पास के किसी गाँव में आये हुए हैं। बड़े भाग जो गुरू पधारे।

गुरू के दरसन (दर्शन) बड़े भाग (भाग्य) से होते हैं और फिर ऐसा विरक्त गुरू तो बड़े भाग से नसीब होता है। हीरा की खाँसी सुनकर कूंडा या उसकी पत्नी घर से बाहर आते हैं। हीरा लगभग फुसफुसा कर संदेसा देता है- ‘गुरुजी आज मणिये की ढाणी में हैं। समझे ! आज रात संगत होगी। ठीक समय पर पहुँच जाना।

मणिये की ढाणी गोगूंदा से लगभग ढाई कोस दूर घुमावदार पहाड़ियों में है। संगत में समय पर पहुँचने के लिये जरूरी है कि सूरज पहाड़ी की ओट में उतरने लगे तभी घर से निकला जाये। हीरा जल्दी में है। इसलिये बहुत संक्षेप में ही अपनी बात कहता है।

वह आस-पास की तीन ढाणियों और दोनों गाँवों में खबर कर आया है। यह आखिरी गाँव है। यहाँ कूण्डों के कुल आठ घर हैं जिन्हें आज की संगत में शामिल होने का संदेसा मिला है।

जल्दी-जल्दी पाँव बढ़ाता हुआ हीरा धानू की झौंपड़ी के सामने जा खड़ा होता है। यह आखिरी घर है, जहाँ संदेसा देना है। अतः यहाँ चैन से बात कर सकता है हीरा।

वैसे भी धानू की झौंपड़ी में अधिक देर बैठने को मन होता ही है हीरा का। इसलिये सब घरों को संगत में आने का संदेशा देने के बाद सबसे अंत में यहाँ आता है ताकि चैन से कुछ देर बैठ सके। गजरी के हाथ की चाय बहुत पसंद है हीरा को। जाने क्या बात होती है गजरी के हाथों से बनी चाय में कि हर बार खिंचा सा चला आता है। कौन जाने गजरी को यह बात पता भी हो कि नहीं।

वह झौंपड़ी के सामने आकर खाँसता है। गजरी बाहर निकल कर आती है। हीरा को सामने देखकर आदर से मुस्कुराती है- ‘ पधारो सा। ’

  – ‘ संगत है आज।’

  – ‘ कहाँ ?’

  – ‘ मणिये की ढाणी में।’

  – ‘ गुरुजी कब पधारे ?’

  – ‘ आज ही, मणिया आया था कहने। उसी ने दिया गुरुजी का संदेसा। कह रहा था तुम्हें (गजरी को) जरूर-जरूर आने का हुकुम हुआ है।’

  – ‘ गुरुजी का हुकुम सिर-माथे पर, चाय पियोगे ?’

  – ‘ क्यों नहीं ! तुम्हारी चाय के लिये तो मैं दौड़ता हुआ चला आता हूँ। ’ आगे बोल नहीं पाता हीरा। हर बार ऐसा ही होता है। गजरी सब समझती है। औरत से मर्द की भला कौनसी बात छिपी रहती है ! फिर भी वह कुछ बोलती नहीं। औरत को ऐसे ही करना चाहिये। ऐसा गजरी को उसकी माँ ने बताया था, बहुत पहले जब वह छोटी थी।

गजरी के पीहर वाले इस सम्प्रदाय से नहीं थे। इसलिए उसके पीहर में संगत नहीं होती थी। इस सम्प्रदाय के रिवाज कुछ दूसरी तरह के हैं फिर भी वह धरम-पुण्य का काम होने के कारण सब निबाह लेती है वरना गजरी बड़ी लाज-शरम वाली औरत है लेकिन हीरा को देखकर कुछ पिघल सी जाती है। जाने क्या है उसकी आँखों में जो दूसरे मरदों की आँखों में दिखाई नहीं देता।

गजरी चाय बना कर लाती है। मिट्टी के तेल का स्टोव है उसके पास। अतः चाय बनाने में देर नहीं लगती उसे। गजरी के सामने आकर दिमाग सुन्न हो जाता है हीरा का। कुछ देर यूँ ही सिर खुजलाता रहा फिर कुछ सोचकर बोला- ‘ धानू कहाँ है ?’

गजरी कुछ जवाब नहीं देती सिर्फ मुस्कुराती है। हीरा संकोच से दोहरा हो जाता है।

गुड़ और सौंफ की चाय पीकर जब हीरा धानू की झौंपड़ी से चला तो फिर से उसने संगत का संदेसा दोहराया। सूरज देवता टेसू, कूमट और देशी बबूल के पेड़ों की सबसे ऊपर की चोटी पर उतरने को ही है। गर्मियाँ है लेकिन पहाड़ों में शाम जल्दी ही उतर आती है।

धानू की औरत गजरी, गुरुजी की खास शिष्या है। इष्टदेव की भी बड़ी कृपा है उस पर। हो भी क्यों न ! जब वह भाव में डूब कर ‘परवाणा’ गाती है तो सुनने वाले दंग रह जाते हैं। तेरा-ताली में भी उसका कोई सानी नहीं। इतनी ताकत कहाँ से आती है गजरी की दुबली-पतली देह में !

देखने में भी कितनी नाजुक सी दिखती है। रंग भी कितना साफ है। जैसे किसी ने कांसे की बाटकी (कटोरी) पर पीतल की पालिस (पॉलिश) कर दी हो। सुना है आठवीं तक स्कूल में भी पढ़ी है।

गजरी जल्दी-जल्दी झौंपड़ी का काम निबटाती है ताकि धानू के आते ही चल पड़ें। धानू यहीं कहीं रेगरों के मुहल्ले में गया है। किसी कूण्डे से खबर हो जायेगी उसे भी। वह बकरी का दूध दुहकर एक बोतल में भर लेती है। मणिये के यहाँ इतना दूध कहाँ से आयेगा जो सब की चाय बन सके ! वह तो पाट का इंतजाम कर ले वही बहुत है।

जब धानू और गजरी मणिये की ढाणी पहुँचे तो चांद आकाश में काफी चढ़ आया था लेकिन अभी संगत शुरू नहीं हुई थी। कुछ कूंडे आने बाकी थे। हीरा कोटवाल और मणिये की औरत धापूड़ी अंगार के पास बैठे हुए रोटे (बाटियां) पलट रहे थे। गजरी ने दूध की बोतल धापूड़ी को पकड़ाई और खुद गुरुजी को धोक देने के लिये झौंपड़े में चली गई।

गुरुजी एक तरफ चौकी पर बैठे हैं, निरविकार भाव से। दुनियादारी से कोई लेना देना नहीं है गुरुजी को। केवल शिष्यों का परलोक सुधारने की चिंता है। पूरी जिंदगी संगत करने में निकाल दी है गुरुजी ने। गजरी बड़ी श्रद्धा से गुरुजी के पाँव पड़ती है। गुरुजी सिर पर हाथ फेरते हैं- ‘ क्यांन (कैसी) हो गजरी ?’

  – ‘ सब बाबा की कृपा है महाराज।’

  – ‘ बाबो सब भली करसी। तू भजन तो नैम (नियम) से करे है ?’

  – ‘ शरीर सूं बणै बितरो तो करूं महाराज।’

गुरुजी आगे कुछ बोलते उससे पहले धापूड़ी ने आकर सिर नवाया- ‘ पाट तैयार है महाराज।’

  – ‘ तू देख तो गजरी पाट ढंग सूं तो बण्या है।’ गुरुजी ने आदेश किया।

  – ‘ हाँ महाराज।’

गजरी ने आकर देखा। संगत की सब व्यवस्था हो गई है। पाट पर सवा हाथ का सफेद कपड़ा झौंपड़ी के बीचों बीच बिछा है। उस पर उतना ही बड़ा लाल कपड़ा भी बिछा है। चारों किनारों पर पंचमेवा-खारक, बादाम, दाख, पिश्ता तथा मिश्री रखे हुए हैं।

कपड़े के बीच में सतिया बना हुआ है, उसके ऊपर की तरफ दोनों ओर चांद और सूरज बने हुए हैं। दोनों के बीच में देवता का घोड़ा और नीचे देवता के पगल्ये बने हुए हैं।

दोनों ओर पाँच-पाँच टोपे मंडे हुए हैं। सतिये पर कलश थापित है। कलश पर जोत रखी है। पाट पूजने के लिये सवा सेर चावल तैयार हैं। पास में एक केवेलू में चूरमे और खोपरे की धूप भी कर दी है। गजरी ने सावधानी पूर्वक सारी वस्तुओं की जाँच की और संतुष्टि में सिर हिलाया।

गजरी से सब तैयारियाँ पूरी हो जाने की सूचना पाकर गुरुजी पाट के पास आकर बैठते हैं। संगत के लिए संगतिये चारों ओर घेरा बनाकर बैठ जाते हैं। औरतें एक तरफ और मरद एक तरफ। संगतिये सभी तरह के हैं। तंदूरे, मंजीरे और ढोलक बजाने वाले शिष्य अलग-अलग जातियों के हैं। संगत में बिना जोरू के आना मना है। अकेले के लिये मुक्ति का मारग नहीं है। साधना के लिये तिरिया का होना जरूरी है।

पहला भजन गुरुजी स्वयं गाते हैं, शिष्य मंडली उनके साथ गाती है। गुरुजी की गहन-गंभीर वाणी से सारा वातावरण रहस्यमय हो उठता है। गुरुजी के भजन भी बड़े गूढ़ अर्थ वाले होते हैं। आसानी से समझ में कहाँ आते हैं ! एक दिन उसने ही पूछा था गुरुजी से- ‘ सांप मरै बांबी उठि नाचै ऐसा परन हमारा’ कैसे संभव है ?’

मुस्कुराये थे गुरुजी उसके सवाल पर- ‘गुरुवाणी पर संदेह नहीं करनी चाहिये गजरी।’

  – ‘ संदेह नहीं गुरुजी, जानना चाहती हूँ, गुरु क्या कहना चाहते हैं ?’

  – ‘ यह गोरखवाणी है। इसे समझना आसान नहीं। गुरु महाराज की कृपा से ही अंतरमन की आँखें खुलती हैं। बाबा रामदेव का रास्ता बहुत सरल है। भजन-सुमरन मात्र से ही मुक्ति मिल जाती है। गुरू गोरख की वाणी ज्ञानपंथियों की वाणी है। भक्ति से ज्ञान का पंथ बड़ा कठिन है। तलवार पर चलने जैसा है। इसीलिये तो रामदेवजी ने मानस (मनुष्य) के उद्धार के लिये भक्ति का मार्ग दिखाया।‘  गुरुजी कहीं गहरे में डूब गये।

 गजरी की बेचैनी और बढ़ गई। क्या कहना चाहते हैं गुरुजी ? आखिर इस भजन में कितना गहरा रहस्य छुपा है ?

कुछ देर बाद गुरुजी ने आँखे खोलीं- ‘साँप मरै बांबी उठि नाचै का रहस्य जानना चाहती हो ? तो लो सुनो, साँप है आदमी का अहंकार और बांबी है आत्मा। जब आत्मा रूपी बांबी में साँप रूपी अहंकार आकर रहने लगता है तो आदमी उसके विष से झुलसने लगता है।

जब अहंकार रूपी साँप मर जाता है तो प्राणी को उसके विष से मुक्ति मिल जाती है इसी प्रसन्नता में आत्मा रूपी बांबी प्रसन्नता से नाचने लगती है। यही परम रहस्य छिपा हुआ है गुरुजी के इन शब्दों में।’

गुरुजी फिर कहीं गहरे में डूब गये- ‘अहंकार आदमी का सबसे बड़ा शत्रु है इसी अहंकार को मारने वाला गुरू का सच्चा भक्त है। तभी तो हमारी साधना में तिरिया का सहारा लिया गया है। तिरिया ही आदमी के मन में अहंकार उत्पन्न करती है और तिरिया ही अहंकार को मार कर आदमी को इस भयानक विषधर से मुक्ति दिलवा सकती है।’

गुरुजी की बात से गजरी की आत्मा से जैसे बहुत बड़ा बोझ उतर गया था। तो यह भेद है इस सम्प्रदाय की साधना का। सचमुच ही गुरुजी के ज्ञान का कोई पार नहीं है। वे चाहें तो अपने शिष्यों को सदेह सुरग (स्वर्ग) पहुँचा दें।

  – ‘ लो गजरी तुम अब परवाणा सुनाओ।’ गुरुजी ने आदेश दिया।

गुरुजी के आदेश से गुजरी वर्तमान में लौटती है। वह अपने शरीर पर बंधे तेरह मंजीरों की जाँच करती है और अपने हाथ के मंजीरे से उन पर आवाज करती है। मंजीरे की मधुर खन-खन झौंपड़े में गूंजने लगती है। गजरी लम्बा अलाप खींचती है- ‘हे ऽ ऽ ऽ ऐ ऽ ऽ ऽ  . . . .   ऐ ऽ  ऽ ऽ ऽ हे म्हारो हेलो सुनोजी रामा पी ई ई ई र। म्हारो हेलो सुनो जी रामा पी ई ई ई र।’

जैसे-जैसे परवाणा आगे बढ़ता है गजरी अपने अंदर उतरती जाती है। कई बार उसे लगता है कि उसका दिल एक गहरा कुँआ है जिसमें उतरने के लिये कई सीढ़ियाँ बनी हुई हैं। यही कारण है कि गजरी जब-तब अपने दिल के कुँए में गहरी उतर जाती है और उसमें यादों की गागर खंगालने लगती है। परवाणा तो वैसे भी लगभग एक-डेढ़ घंटे तक चलता है। अतः गायक भजन गाता जाता है और उसे यह अवकाश भी रहता है कि वह अपने आप में भी डूबा रहे।

गजरी मन के कुँए में एक सीढ़ी उतरती है- जब गजरी नई नवेली दुलहन बनकर आई थी तब गजरी की सास गजरी को गुरुजी की महिमा का गुणगान सुनाती थी। उन दिनों गजरी को विश्वास नहीं होता था। इतने चमत्कारी पुरुष हैं गुरुजी ! पत्थर की कूंडी को अपने चमत्कार से पानी में तैरा देते हैं। आकाश में उड़ सकते हैं। काठ के घोड़े को हाड़-माँस का बना सकते हैं। हाँड़ी में पके हुए तीतर जीवित करके हवा में उड़ा सकते हैं।

घनघोर तिरिया साधना की है गुरुजी ने। यह बड़ी कठिन साधना है। हर किसी के बस की बात नहीं है विरक्त रह कर तिरिया साधना करना। जम की फांसी कट जाती है तिरिया साधना से। नई नवेली गजरी सास की बातों का अधिकांश हिस्सा तो समझ भी नहीं पाती थी।

हाँलाकि गजरी कामड़ परिवार से ही आई थी। उसके पीहर में भी रामदेवजी को आराध्य देव माना जाता था किंतु गजरी के ससुराल की तरह इस सम्प्रदाय को नहीं माना जाता था। संगत के बारे में पहले कभी सुना भी नहीं था उसने। गजरी के पिता अपने गाँव के स्कूल में चपरासी थे। इसलिये गजरी आठवीं कक्षा तक पढ़ ली थी। पढ़ी-लिखी होने के कारण उसे धरम-करम का अधिक ज्ञान न था।

हाथ पैर और पीठ पर बंधे मंजीरों पर बारी-बारी से मंजीरे खनकाती गजरी लम्बा अलाप लेकर गाती है- ‘हे रूणीचे रा धनिया, अजमालजी रा कंवराँ, म्हारो हेलो सुनोजी रामा पी ऽ ऽ ऽ र  . . . .  भजन की पंक्ति के साथ वह एक सीढ़ी और उतरती है- जब गजरी की शादी के बाद पहली-पहली बार गुरुजी उनके घर आये तो इस पंथ से गजरी का वास्तविक परिचय हुआ। गुरुजी लगभग दिन ढले आये। उसके सास-ससुर, पति और ननद सभी गुरुजी के पाँव पड़े। वह भी सास के आदेश से गुरुजी के पाँव लगी।

गुरुजी की बड़ी आवभगत हुई। छाछ-राबड़ी, दूध, दही, घी, सोगरे, पटोळिये (कच्चे छोलों की सब्जी), जो कुछ भी झौंपड़ी में था गुरुजी के लिये हाजिर कर दिया गया। शाम को भजन हुए। झौंपड़े के बाहर गुरुजी को एक माचे (खाट) पर बैठाया गया। पूरा परिवार गुरुजी के चारों ओर बैठ गया। गाँव में जो और भी इस सम्प्रदाय को मानने वाले परिवार थे, वे भी भजनों में शामिल हुए। वे सभी कूण्डा कहलाते हैं। लगभग आधी रात तक भजनों का कार्यक्रम चलता रहा।

भजन समाप्त होने पर सब लोग अपने-अपने घरों को गये। गुरुजी की आव-भगत में गजरी कुछ थक सी गई थी, अतः अपने झौंपड़े में जाकर सोने की तैयारी करने लगी। आज धानू को मना कर देगी वह। उसने सोचा। कल कर लेंगे। हाँलाकि धानू मानेगा थोड़े ही। जब तक वह गजरी की एक-एक हड्डी को मचका (चरमरा) न देगा तब तक उसे नींद नहीं आयेगी। कैसा दीवाना है वह भी ! कुछ भी हो, है मरद का बच्चा। क्या कड़ियल देह है ! तृप्ति के उन क्षणों में निहाल हो जाती है गजरी।

 वह चारपाई पर गुदड़ी डाल ही रही थी कि दरवाजे पर आहट हुई। आ गया दीवाना। वह मन ही मन हँसी। लेकिन उसका अनुमान गलत निकला। यह धानू नहीं था। धानू की माँ अर्थात् गजरी की सास थी जो उसे बुलाने आई थी।

  – ‘ गजरी आज रात तुझे गुरुजी के पास भोग चढ़ाना है।’

  – ‘ ठीक है।’ कहकर वह चुपचाप खड़ी हो गई। उसे अपनी सास की बात का मतलब समझ में नहीं आया।

  – ‘ स्नान करके शादी के दिन वाले कपड़े पहन ले।’ आज्ञा देकर सास चली गई। थोड़ी देर में स्नान करके जब गजरी अपनी सास के पास पहुँची तो सास उसे गुरुजी के पास ले गई। गजरी का पति धानू और गजरी का सुसर हरिया अभी तक गुरुजी के पास ही बैठे थे। सास की आज्ञा के मुताबिक गजरी ने गुरुजी के चरणों की धूल अपने माथे से लगाई।

गुरुजी ने कुछ मंत्र पढ़े और गजरी तथा धानू के सिर पर पानी छिड़का। फिर कुछ और मंत्र पढ़े तथा अपनी थैली में से राख की पुड़िया निकाल कर उनके माथे पर लगाई और कहा -‘आज से मैं धानू और गजरी को कूंडा पंथ में शामिल करता हूँ। मैं तुम दोनों को अपना शिष्य स्वीकार करता हूँ। बोलो- हम बाबा रामदेव की सौगंध खाकर कूंडा पंथ में शामिल होना स्वीकार करते हैं।’

धानू और गजरी ने हाथ में पानी लेकर शपथ ली कि आज से हम कूंडा पंथ में शामिल होते हैं। हम नेम-धरम से रोज भजन करेंगे। धरम की मर्यादा के विरूद्ध कोई काम नहीं करेंगे। गुरू को परमेश्वर समझेंगे क्योंकि गुरू हमें संसार के बंधनों से मुक्त करेंगे। हम बिना गुरू की आज्ञा के इस पंथ के बारे में किसी को कुछ नहीं बतायेंगे।   धर्म के सभी रहस्य गुप्त रखेंगे।’

मन के कुएं से कुछ देर के लिये बाहर निकलती है गजरी। परवाणा अब अपने चरम पर है- ‘ घर-घर होवे थारी पूजा, गाँव-गाँव गुण गावेजी  . . . . हे ऐ ऽ ऽ ऽ  . . . .  ऐ ऽ ऽ ऽ  . . . . ’ मंजीरों की खनखनाहट उसी तरह जारी है। तंदूरे और ढोलक उसकी आवाज का अनुसरण कर रहे हैं। गजरी फिर से अपने मन के कुएँ में उतर जाती है।

उस दिन दीक्षा की रस्म पूरी हो जाने के बाद गुरुजी ने कहा था कि अब भोग लगाया जायेगा अतः घर के सभी सदस्य धावलिये (सफेद कपड़े) की ओट में जाकर बैठ जाएं। भोग के लिये प्रस्तुत तिरिया यहीं रुक जाये। सास ने गजरी को रुकने का संकेत किया और सभी सदस्य धावलिये की ओट में चले गये।

गजरी की सांस गले में फंसने सी लगी थी। क्या होने वाला है ? भोग चढ़ाने का अर्थ क्या है ? सब लोग धावलिये की ओट में क्यों चले गये हैं ? कुछ ही देर में सारी बातें शीशे की तरह उसके सामने साफ हो गईं जब गुरुजी ने उससे सामने बिछी दरी पर लेटने के लिये कहा। कुछ नहीं बोल सकी गजरी। क्या करे ! क्या न करे!

यह कैसी पूजा है ? जिस काम को दुनिया के सारे लोग गंदा बताते हैं वह काम भजन-पूजा का कैसे हो सकता है ? वह पराये आदमी के साथ कैसे यह काम कर सकती है ! नहीं-नहीं यह तो पाप है। उसे अपनी माँ की याद आती है। माँ कहती है जिस काम र्को िछपा कर करना पड़े वह पाप होता है लेकिन इस काम में तो घर के सारे लोग शामिल हैं । फिर यह पाप कैसे हो सकता है ?

गजरी को अपनी जगह से नहीं हिलते देखकर गुरुजी ने फिर कहा- ‘ देह के अहंकार को नष्ट करके आत्मा की उन्नति के लिये तुम्हें भोग के लिये प्रस्तुत होना ही होगा। अब तुम मेरी शिष्या हो और तुम्हारी उन्नति की जिम्मेदारी मेरे ऊपर है।’

कुछ क्षण तक गजरी ऐसे ही खड़ी रही। जैसे मन ही मन कुछ तय कर रही हो। गुरुजी पर एक दृष्टि डाली और- ‘मुझसे नहीं होगा।’ कहकर बाहर निकल आई ।

गजरी को झौंपड़े से बाहर निकलते देखकर धानू लपककर धावलिये की ओट से बाहर आया और बोला- ‘यह क्या अनर्थ करती हो ? भोग नहीं लगा तो शिष्यत्व खण्डित हो जायेगा। घोर नरक का दरवाजा खोल रही हो अपने लिये भी और मेरे लिये भी।’ मुझे किसी स्वर्ग की खोज नहीं है। मेरा स्वर्ग तो तुम्हारे घर में है।’ गजरी धानू के पैरों में बैठ गई।

  – ‘ लेकिन गुरुजी का कोप ? उसके बारे में सोचा है ?’

  – ‘ यह पाप है।’

  – ‘ यह पाप नहीं मनुष्य का देह जनित अभिमान है। इससे मुक्ति पाकर ही आदमी ऊपर उठ सकता है।’ धानू गुरुजी की भाषा बोल रहा था।

धानू ने लाख प्रयास किया किंतु गजरी भोग के लिये प्रस्तुत नहीं हुई। गुस्से में आकर धानू ने गजरी को दो थप्पड़ भी लगा दिये किंतु गजरी ने अपना हठ नहीं छोड़ा। गजरी के सास-ससुर और पति ने गुरुजी के चरणों में सिर रखकर क्षमा माँगी।

विरक्त व्यक्ति होने के कारण गुरुजी ने गजरी के आचरण का कतई बुरा नहीं माना और उसे क्षमा करते हुए बोले- ‘देह का अभिमान आसानी से नहीं जाता। इसके लिये अभ्यास करना पड़ता है। अभी इसे एक-दो बार संगत में आना होगा। तभी इसके सोये हुए संस्कार जागेंगे।’ अंत में गजरी की सास भोग के लिये प्रस्तुत हुई।

इस बार गजरी अपने पति और ससुर के साथ धावलिये की ओट में थी और सास गुरुजी के पास भोग में थी। धावलिये के पीछे से सास की चूड़ियों की आवाज आती रही। कुछ देर बाद सास वाणी लेकर धावलिये के पीछे आई।

गजरी के ससुर और पति ने वाणी को सिर और आँखों से लगाया श्रद्धा पूर्वक ग्रहण कर अपना जन्म कृतार्थ समझा। जब सास ने प्रसाद वाला हाथ गजरी की ओर बढ़ाया तो हैरान रह गई गजरी। यह कैसा प्रसाद है ? उसने सहम कर अपनी सास की ओर देखा।

  – ‘ देखती क्या है ? वाणी ले।’

  – ‘ वाणी मतलब ?’

  – ‘ वाणी मतलब प्रसाद।’

  – ‘ यह कैसा प्रसाद है ?’

  – ‘ गुरुजी के भोग का महाप्रसाद है। माथे से लगाकर ग्रहण कर। सारे पाप धुल जायेंगे।’

  – ‘ मैं यह प्रसाद नहीं लूंगी।’

  – ‘ क्यों नहीं लेगी ? हमने नहीं लिया क्या ?’

  – ‘ आपकी बात और है।’

  – ‘ बात और कैसे है ? तूने अभी थोड़ी देर पहले सौगंध खाकर गुरुजी को अपना गुरू बनाया है।’

  – ‘ यदि मखाने और खोपरे का प्रसाद हो तो मुझे लेने में कोई आपत्ति नहीं है।’

  – ‘ गुरू का वचन अकारथ करती है।’ धानू के हाथ का एक झन्नाटेदार चाँटा उसके गाल पर पड़ा।

गुरुजी को धानू की यह मारपीट पसंद नहीं आई और उन्होंने भविष्य में कभी भी गजरी पर हाथ नहीं उठाने का निर्देश दिया। गुरुजी का कहना था कि मारपीट भी तो देहजनित अभिमान ही है। देह का अभिमान साधना से दूर होगा, न कि मारपीट से।

उन्होंने गजरी से कहा- ‘यह सृष्टि का महाप्रसाद है। इसी से समस्त सृष्टि उत्पन्न होती है। इसमें ब्रह्म और जीव दोनों की रचना के रहस्य छुपे हुए हैं। यदि यह गंदी चीज होती तो इससे हमारी देह की सृष्टि कैसे होती ? इसी देह से मनुष्य ईश्वर को प्राप्त करता है।’

गुरुजी की बातों का कोई जवाब नहीं दे सकी थी गजरी किंतु उसने वाणी ग्रहण नहीं की। अगला दिन बड़ा खराब निकला गजरी का। ससुराल के किसी सदस्य ने उससे बात नहीं की। गुरुजी के आदेशानुसार शाम को धानू गजरी को संगत में लेकर गया था। गुरुजी का यह भी आदेश था कि संगत में या तो गजरी के सास-ससुर आयेंगे या फिर धानू और गजरी। दोनों जोड़े एक साथ संगत में हाजिर नहीं हो सकते।

संगत पहाड़ियों की तलहटी में एक तंग जगह पर आयोजित की गई थी। जहाँ चलते-फिरते आदमी का अचानक आ धमकना संभव नहीं था। आज की ही तरह पाट पूरा गया था। दाल-बाटी और चूरमा बनाये गये थे। धूप-ध्यान किया गया था। धावलिये की ओट की गई थी। भजन हुए थे। परवाणे गाये गये थे। औरतों ने अपने शरीर पर मंजीरे बांध कर तेरह-ताली के भजन गाये थे। भजन रामदेवजी तथा उनके शिष्य जरगाजी को समर्पित थे।

गजरी ने अपने पीहर में रामदेवजी के बारे में तो सुना था किंतु इस संप्रदाय के प्रमुख देवता जरगाजी के बारे में नहीं सुना था। बाद में कभी गुरुजी ने ही बताया था कि जरगाजी जाति के बलाई थे और रामदेवजी के प्रमुख शिष्य और प्रमुख भजनी थे। रामदेव जी की सेवा करने के लिये वे रामदेवजी के घोड़े के चरवादार (चंवर ढुलाने वाले) बन गये थे। एक बार रामदेवजी कहीं परचा देने (चमत्कार प्रदर्शन) के लिये गये।

जरगाजी भी उनके साथ गये। चलते-चलते काफी रात हो गई। एक स्थान पर रामदेवजी ने जरगाजी को घोड़े की देखभाल करने के लिये कहा और स्वयं थोड़ी देर में आने का कहकर चले गये। वहाँ से रामदेवजी कहीं अन्यत्र परचा देने चले गये और घोड़े तथा जरगाजी के बारे में बिल्कुल भूल गये। रामदेवजी और जरगाजी एक स्थान पर खड़े-खड़े निर्जीव हो गये।

बाद में अचानक रामदेवजी को उन दोनों की याद आई तो वे वहाँ आये जहाँ जरगाजी और घोड़े को छोड़ गये थे। वहाँ आकर रामदेवजी ने देखा वे दोनों तो काठ के बने खड़े हैं। रामदेवजी ने दोनों को फिर से जीवित किया और जरगाजी से वरदान मांगने को कहा। जरगाजी ने कहा- तुम्हारे साथ-साथ मेरा नाम भी अमर रहे। इस पर रामदेवजी ने कहा कि यहाँ पर तुम्हारे नाम से एक मेला लगा करेगा किंतु उसमें धाम मेरी चला करेगी। तभी से रामदेवजी के भजनों के साथ जरगाजी को भी याद किया जाता है।

गजरी मन के कुंए में कई सीढ़ियां नीचे उतर चुकी है। मंजीरों के साथ उठते गिरते उसके हाथ अनवरत गति से गतिमान हैं। परवाणा अब उतार पर है- ‘हे ऽ ऽ ऽ ऐ ऽ ऽ ऽ . . .  . मरूए का फूल चढ़ावां, मेवा को भोग लगावां, म्हारो हेलो ओ म्हारो हेलोऽ सुनो जी रामा पी ई ऽ ऽ ऽ ई . . . .  र। म्हारो हेलो सुनो जी रामा पीर।’

मन की सीढ़ियों पर उसका उतरना जारी है। उस रात आज की ही तरह पूनम की रात थी। लगभग आधी रात तक भजन और परवाणे गाये जाते रहे। गुरुजी के आदेश से गजरी ने भी परवाणा सुनाया था। गजरी जितनी सुंदर दिखने में है उतना ही सुंदर गाती भी है। यह बात गजरी के ससुराल वालों को उसी दिन ज्ञात हुई।

गजरी के कंठ से झरती सुकोमल स्वर लहरी और आसमान में स्थित चंद्रमा से झरती ज्योत्सना जाने कैसे आपस में घुल-मिलकर एकाकार हो गये और अद्भुत वातावरण रचने लगे। चारों ओर पसरी पहाड़ियाँ और उनपर खड़े टेसू, कुमट और देशी बबूल के पेड़, नागफणियां, थोर के झुरमुट और बांवळ की झाड़ियाँ मानो हड़बड़ाकर नींद से जाग गयी हों।

आसपास बड़ी संख्या में खड़े गुग्गुल के पेड़ों से मन और आत्मा को मस्त कर देने वाली सुगंध फूटने लगी। चारों ओर चांदनी ही चांदनी, खुशबू ही खुशबू और संगीत ही संगीत। मानो एक नदी हो जिसमें सब बहे चले जा रहे हों।

गुरुजी को लगा कि जीवन में उन्होंने बहुत सारी संगतें करवाई हैं किंतु उस रात जैसी संगत पहले कभी नहीं हुई। जब चांद आसमान के ठीक बीच में आया तो गुरुजी ने भोग की आज्ञा दी। औरतों ने मंजीरे खोलकर रख दिये। पुरूषों ने तंदूरे और ढोलकें एक तरफ सरका दीं। पाट के पास पहले से ही रखे एक खाली कूंडे में शराब डाली गई।

आदमी पाट के एक तरफ पंक्ति बद्ध होकर बैठ गये, औरतों की पंक्ति पाट के दूसरी ओर ठीक उनके सामने बैठी। गुरुजी के आदेश से औरतों ने अपनी-अपनी कांचलियाँ उतारनीं शुरू कर दीं। संगत का यह कैसा मोड़ था?

अभी तक तो सारा वातावरण भक्ति रस से सरोबार था किंतु अचानक ही जैसे सब कुछ बदल गया हो। चांदनी के मद्धिम प्रकाश में कांचलियां उतारती हुई औरतें ऐसे प्रतीत हो रही थीं मानों स्वर्ग से उतर कर आई अप्सरायें चांदनी के सरोवर में नहाने की तैयारी कर रही हों।

गजरी का मन हुआ कि वह संगत से उठ कर चली जाये किंतु काठ के टुकड़े की भाँति अपनी जगह पर जड़ होकर बैठी रही वह। मरदों की पंक्ति में से धानू ने कई बार संकेत किया किंतु गजरी ने उसके संकेतों को अनदेखा कर दिया। क्या करने को कहता है धानू ? मैं भला इतने सारे मरदों के बीच अपनी कांचली उतार लूंगी ? मर जाऊंगी लेकिन ऐसा तो हरगिज नहीं कर सकूंगी।

गुरुजी के आदेश पर भी गजरी सिर झुकाये रही। हार कर गुरुजी ने उसे कांचली न उतारने की छूट दे दी और धानू को पुरूषों की पंक्ति से अलग हटकर बैठने का संकेत किया। जब सब औरतों ने कांचलियाँ उतार लीं तो उन्होंने बारी-बारी से अपनी कांचली पाट के पास रखे कूंडे में भरी शराब में डुबोकर अपनी देह को शुद्ध किया और अपनी कांचली उसी कूंडे में डाल दी।

गुरुजी ने सादके धरे। अर्थात् पाट पर रखे गेहूँ के दानों को अपने हाथ में लेकर गिना। सादके पाँच की गुणा में आये थे अतः कोटवाल ने कूंडे में पड़ी सारी कांचलियों को अच्छी तरह हिलाया और एक कांचली निकाल कर पंक्ति में सबसे पहले नम्बर पर बैठे कूण्डे की तरफ बढ़ाई।

जैसे ही कूण्डे ने वह कांचली अपने हाथ में ली, कांचली वाली औरत धावलिये की ओट के पीछे चल दी। उसके पीछे-पीछे वह कूण्डा भी धावलिये की ओट में चल दिया। गजरी ने ध्यान किया कि धावलिये के पीछे जाने वाले स्त्री-पुरूष धणी-लुगाई (पति-पत्नी) नहीं थे।

थोड़ी देर में वे दोनों स्त्री-पुरूष धावलिये की ओट से बाहर आये। स्त्री अपने हाथ में वाणी लाई थी जिसे उसने पाट के पास रखे कटोरे में डाल दिया। गुरुजी ने फिर सादके धरे। सादके पुनः पाँच की संख्या में आये थे अतः कोटवाल ने दूसरी कांचली निकाली और दूसरे कूण्डे की ओर बढ़ा दी। इस बार भी वही हुआ।

जिस स्त्री की कांचली निकली वह स्त्री उस पुरूष के साथ धावलिये की ओट में चली गई और थोड़ी देर में हाथ में वाणी लेकर आई। गुरुजी ने फिर सादके धरे। इस बार चार की गुणा में सादके थे। अतः पंक्ति में जो कूण्डा अब सबसे आगे बैठा था वह उठ कर पंक्ति के अंतिम छोर पर जा बैठा।

इस प्रकार गुरुजी सादके धरते रहे और हीरा कोटवाल कांचलियाँ निकालता रहा। एक-एक करके सब कांचलियाँ चुक गईं। केवल रह गये धानू और गजरी। अंत में गुरुजी ने कटोरे में एकत्र वाणी में मिश्री मिलाकर कोटवाल को दी। कोटवाल ने सब भक्तों के बीच वाणी फेरी।

धानू और गजरी को छोड़कर शेष सभी को वाणी का अधिकारी समझा गया। हीरा वाणी का कटोरा लेकर प्रत्येक भक्त के सामने जाता और जोर-जोर से कड़ावे कहता।

  – ‘ हुकुम हड़मान को।’ हीरा जोर लगाकर विशेष अंदाज में कहता।

  – ‘ आग्या ईश्वर की।’ भक्त जवाब देता।’

  – ‘ दुवो ?’ हीरा पूछता।

  – ‘ चारी जुग में हुवो।’ भक्त जवाब देता।

  – ‘ चोकी ?’

  – ‘ हिंगलाज की।’

  – ‘ परमाण?’

  – ‘ संत चढ़ै निरवाण।’

  – ‘ थेगो ?’

  – ‘ अलख रा घर देखो।’

यह जवाब सुनकर हीरा भक्त को वाणी देता। भक्त बड़ी श्रद्धा से उसे ग्रहण करता। वाणी के साथ-साथ कोली (चूरमे का प्रसाद) तथा भाव (मेवे का प्रसाद) भी फेरे गये। गुरुजी के कहने पर गजरी और धानू ने कोली और भाव को ग्रहण किया।

संगत से लौटते हुए गजरी बहुत उद्विग्न थी। उद्विग्न धनिया भी था लेकिन गुरुजी के समझाने के कारण उसने गजरी को कुछ नहीं कहा। अगले माह फिर वैसी ही संगत हुई। गजरी ने परवाणा गाया किंतु कांचली उतारने से मना कर दिया लेकिन इस बार उसे पहले का सा संकोच अनुभव नहीं हुआ।

उसे लगा कि जब सभी कर रही हैं तो उसे करने में क्या है ? वह भी कर सकती है यह सब। जब गुरुजी स्वयं अपनी देख-रेख में यह सब करवा रहे हैं तो उचित-अनुचित का प्रश्न ही शेष नहीं रहता। गुरुजी ने जैसे गजरी के मन की बात ताड़ ली।

जब संगत बिखरी और सभी शिष्य अपने-अपने घर लौटने लगे तो गुरुजी ने धानू और गजरी को अपने पास बुलाया और कहा- ‘ कल हम तुम्हारे यहाँ भोग की क्रिया पूरी करने आयेंगे।’ गजरी ने न हाँं की, न ना की। चुप खड़ी रही।

रास्ते भर समझाता रहा था धानू- ‘ इस बार गुरुजी को कुपित मत करना। गुरू का कोप आदमी को जला कर भस्म कर सकता है। तुझे पता नहीं तेरे मना करने से गुरुजी की तिरिया साधना खण्डित होती है। ऐसा नहीं है कि केवल इस सम्प्रदाय में ही ऐसी परंपरायें हैं। कूंडा पंथ के अलावा ऊंदर्या (चूहा) पंथ में भी तिरिया साधना और देह का अभिमान गलाने की परंपरा है। . . .

. . . एक बार गुरुजी ने ऊंदर्या पंथ के एक गुरू के साथ ऊंदर्या पंथ की संगत में भाग लिया था। उनकी साधना तो और भी कठिन है। उनके यहाँ पाट नहीं पूरा जाता। घी में पके मोटे आटे में शक्कर मिलाकर माताजी का प्रसाद बनाया जाता है और उसे बीच में रख कर एक कच्चा धागा चूरमे से लेकर झौंपड़े की छत तक बांधते हैं। सभी भक्त अपनी औरत के साथ संगत में भाग लेते हैं। . . . .

. . . . संगत शुरू होने पर सभी औरतें और मर्द देवी को रिझाने के लिये कपड़े उतार कर एक दूसरे के साथ मिल-जुल कर नाचते हैं। यह कठिन परीक्षा की घड़ी होती है। सभी को मर्यादा में रहना पड़ता है। कोई भी मर्यादा का उल्लंघन करके यदि काम के बस में हो जाता है तो देवी उसका सर्वनाश कर देती है। यहाँ तक कि गुरू की आज्ञा से उस व्यभिचारी की हत्या भी कर दी जाती है।’

धानू पहाड़ी दर पहाड़ी पार करता जाता था और गजरी को समझाता जाता था। गजरी ने अनुभव किया कि अनपढ़-गंवार सा दिखने वाला धानू उतना गँवार भी नहीं है जितना वह सोचती है। गुरुजी के प्रभाव से उसे धर्म और अध्यात्म की काफी जानकारी है।

  – ‘ सुन रही है ना ?’ गजरी की ओर से हाँ नहीं आई तो धानू ने उसे टोका।

  – ‘ हाँ, सुन तो रही हूँ।’

धानू फिर से विषय पर लौटकर आया- ‘ इसके बाद सभी स्त्री-पुरूष चूरमे के चारों ओर घेरा बनाकर चुपचाप बैठ जाते हैं और देवी के आने की प्रतीक्षा करते हैं। रात्रि में केवल मौन साधना होती है और दिन में भजन और नृत्य होते हैं। कई-कई दिन और कई-कई रात देवी की प्रतीक्षा की जाती है।

जब तक देवी प्रकट नहीं होती तब तक कोई भी व्यक्ति आहार ग्रहण नहीं करता। कभी-कभी तो देवी को प्रसन्न होने में सात-सात दिन लग जाते हैं। देवी अक्सर रात में आती है। वह भी चूहिया के रूप में। झौंपड़े की छत से उतर कर कच्चे धागे पर चलती हुई देवी प्रसाद तक आती है और भक्तों पर कृपा करके प्रसाद ग्रहण करती है। देवी के प्रकट होने की प्रसन्नता में सभी नर-नारी पुनः नाचते हैं और प्रसाद ग्रहण करके देवी के सामने ही एक साथ भोग में रत हो जाते हैं . . . .   । ’

अचानक धानू को एक झाड़ी में बैठा सियागोश दिखाई दिया। उसने नीचे झुककर पत्थर उठाया और झाड़ी की तरफ उछाल दिया। अंधेरे में चमकती आँखों को देखकर गजरी की तो जैसे जान ही निकल गई। वह मजबूती से धानू से लिपट गई। काफी देर तक दोनों उसी तरह चुपचाप चलते रहे थे।

घनी झाड़ियों के क्षेत्र से निकलकर अपेक्षाकृत मैदानी हिस्से में पहुँच कर धानू ने फिर अपनी बात शुरू की- ‘ गुरुजी को एक बार मध्य प्रदेश के सीहोर जिले में चोली पूजन संप्रदाय की संगत में जाने का अवसर भी मिला था। वहाँ की काछी, धीमर तथा मछुआ जातियों के कुछ लोग अघोर पंथ के चोली पूजन संप्रदाय के भक्त हैं। वे अपनी संगत को भी चोली पूजन कहते हैं।

उनमें पंच मकार माँस, मदिरा, मैथुन, मीन तथा मुद्रा की मान्यता है। जब उनका गुरू देवी को नई चोली धारण कराता है तो सभी औरतें अपनी चोलियाँ उतार कर शराब में भिगोती हैं और पुजारी मेमने की बलि देता है। इसके बाद पुरूष बारी-बारी से शराब के पात्र से चोलियाँ निकाल कर पुरूषों को देता जाता है।

जिस स्त्री की चोली जिस पुरूष के हाथ में आती है वह उसी स्त्री के साथ भोग करता है। लेकिन उनमें भी धावलिये की प्रथा नहीं है। सभी स्त्री-पुरूष ऊंदर्या पंथियों के समान एक साथ देवी के सामने भोग करते हैं।’

चुपचाप सुनती रही थी वह। कुछ तय नहीं कर पा रही थी। जाने कल क्या होगा!अगले दिन संध्या से कुछ पहले ही आये थे गुरुजी। वही सब कुछ दोहराया गया जैसा पिछली बार हुआ था। जब गुरुजी ने भोग के लिये तिरिया को प्रस्तुत होने का आदेश दिया तो गजरी की सास ने गजरी को संकेत किया।

गजरी गुरुजी की सेवा में प्रस्तुत हो गई। इसके बाद क्या हुआ गजरी को कुछ नहीं पता। उसे तो तब चेता हुआ जब गुरुजी ने वाणी एकत्र करने के लिये तैयार रहने को कहा। गुरुजी के आदेशानुसार उसने वाणी ले जाकर परिवार के सदस्यों को दी।

गजरी में आये इस परिवर्तन से धानू बहुत प्रसन्न था। अब उसकी नाक बीसनामियों के बीच कटने से बच गयी थी। वह धर्म का अपराधी होने से भी बच गया था। इसके बाद तो जाने कितनी बार ऐसी संगतें हुई। फिर कभी गजरी को कोई कठिनाई नहीं हुई।

गुरुजी के आदेश पर वह तत्काल कांचली खोलकर सादके धरे जाने की प्रतीक्षा करने लगती है। अपनी बारी आने पर चुपचाप धावलिये के पीछे चली जाती है और लौटकर वाणी पाट के पास के कटोरे में डाल देती है।

देह जनित अभिमान के गलने की प्रक्रिया तो उसे पता नहीं शुरू हुई या नहीं किंतु अब उसे किसी से लाज शर्म नहीं आती।

  – ‘ उठ गजरी मंजीरे खोल दे।’ हीरा कोटवाल की आवाज से गजरी चौंकती है। वह जैसे बेहोशी से बाहर आती है। उसे आश्चर्य होता है अपने आप पर। मन के कुएँ में जाने कितनी गहरी उतर गई थी वह ! क्या-क्या सोचती रही थी और जाने कितनी देर गाती रही थी।

सब औरतें अपनी-अपनी कांचली उतार चुकी हैं। धानू मरदों की पंक्ति में बैठा बड़ी देर से संकेत कर रहा है किंतु गजरी है कि उस ओर देखती ही नहीं।

  ‘गजरी कांचली उतार और भोग के लिये तैयार हो जा।’

गुरुजी का आदेश पाकर गजरी गर्दन घुमाती है। मन में कुछ निश्चय करती है। आँखों ही आँखों में हीरा को कुछ संकेत करती है। हीरा जैसे उसके मन की बात पढ़ लेता है। वह एक-एक करके सब औरतों की कांचलियाँ संगतियों को पकड़ा देता है और अंत में केवल गजरी की कांचली बचती है।

अंतिम कांचली सदैव हीरा के लिये होती है। हीरा कूंडे में से कांचली उठाता है और गजरी को उठने का संकेत करता है। जैसे ही गजरी उठती है, गुरुजी उसे टोकते हैं- ‘ ठहरो गजरी। यह तो पाप है। मैं किसी को भी पाप नहीं करने दूँगा।’

गजरी सहमकर फिर से अपने स्थान पर बैठ जाती है। उसे कुछ समझ में नहीं आता। क्या पाप हो गया उससे? सब लोग चौंककर गुरुजी की ओर देखते हैं। क्या किया है गजरी ने ?

  – ‘ हीरा ने जान बूझ कर तुम्हारी कांचली अपने लिये बचाई। ताकि वह तुम्हारे साथ आनंद मना सके। यह तो व्यभिचार है। यह तिरिया साधना के विरूद्ध है और देह जनित अभिमान का परिणाम है। भोग करने का अर्थ यह नहीं है कि तुम अपनी मन पसंद की देह को भोगो।

भोग का अर्थ है कि अपनी देह का अभिमान तज कर सादके में गुरू के आदेश से प्राप्त देह के साथ रमण करके अपनी देह के अभिमान को हटाओ। हीरा मैं तुम्हें इस पहली गलती के लिये क्षमा करता हूँ। आज के बाद ऐसी गलती नहीं होनी चाहिये।’

हीरा शर्म से सिर झुका लेता है। सचमुच गुरुजी अंतर्यामी हैं। उनसे कुछ भी छिपा नहीं रहता। गजरी की समझ में नहीं आता कि अब वह क्या करे। सारे पुरूष भोग लगा चुके हैं।

हीरा अब भोग लगा नहीं सकता। धर्म के अनुसार गुरुजी संगत में भोग नहीं लगा सकते। यदि वे ऐसा करते  हैं तो उनकी साधना नष्ट होती है। साधना नष्ट होने से गुरुजी की सिद्धियाँ भी नष्ट हो जायेंगी। जिससे वे न तो हवा में उड़ सकेंगे और न काठ के घोड़े को सचमुच के घोड़े में बदल सकेंगे।

पंथ के नियम के अनुसार गुरू द्वारा सादके धरे जाने के बाद भोग के लिये प्रस्तुत तिरिया यदि वाणी प्राप्त करने में असफल रहती है तो वह घोर नरक का रास्ता देखती है। गजरी अचानक उपस्थित हुए इस संकट से हक्की-बक्की रह जाती है। अवश्य ही गुरुजी के पास कोई समाधान होगा। वे ही कोई रास्ता बतायेंगे। दो-चार क्षण इसी असमंजस में गुजरते हैं। सब की दृष्टि गुरुजी पर लगी है।

कुछ देर विचार मग्न रहकर गुरुजी चिंतन से बाहर आते हैं- ‘ मैंने जब तिरिया साधना की थी तो अपने गुरू को वचन दिया था कि मैं संगत में स्त्री से दूर रहूँगा किंतु यदि आज उसी प्रण पर अडिग रहता हूँ तो गजरी का नाश होता है। यह अभी और इसी वक्त नरक को चली जायेगी।

. . .  अतः मैं गजरी के कल्याण के लिये गुरू को दिये वचन से विमुख होता हूँ। मैं जानता हूँ कि गुरू से विमुख होने के कारण मेरी समस्त साधना नष्ट हो जायेगी और मैं फिर से संसार के बंधनों में जकड़ जाऊंगा लेकिन अपने शिष्यों की रक्षा करना मेरा धरम है। इस काम में चाहे मुझे प्राण ही क्यों न गंवाने पड़ें।’

गुरुजी ने आगे बढ़कर जमीन पर पड़ी गजरी को उठाया और उसे लेकर धावलिये की ओट में चले गये। गजरी के हृदय में मच रहे हाहाकार की सीमा नहीं है। आखिर वही अपने गुरू के पतन का कारण बनी। उसे लगा चांदनी के सरोवर में नहाने उतरी हुई अप्सरा पैर उलझ जाने से उसी सरोवर में डूब कर मर गई और अपने साथ बचाने वाले को भी ले मरी।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

इस कहानी वर्ष 1990 में कहानी संग्रह ‘एक प्लेनेट की मौत’ में प्रकाशित हुई थी। कहानी में वर्णित वामाचारी पंथ का आधार डॉ. महेन्द्र भानावत की पुस्तक अजूबा राजस्थान के अध्याय ‘कूंडा एवं उंदरिया पंथ’ से लिया गया है। यह पंथ किसी समय राजस्थान के मेवाड़ अंचल के पहाड़ी ग्रामीण क्षेत्रों में प्रचलित था।

डॉ. मोहनलाल गुप्ता की अन्य हिन्दी कहानियां इसी वैबसाइट के मुख्य मीनू में उपलब्ध ब्लॉग अनुभाग के अंतर्गत कहानियां खण्ड में पढ़ी जा सकती हैं।

लेखक डॉ. मोहनलाल गुप्ता राजस्थान सरकार के सूचना एवं जनसम्पर्क विभाग में उपनिदेशक रहे हैं तथा सेवानिवृत्ति के बाद राजस्थान साहित्य अकादमी की सरस्वती सभा के सदस्य भी रहे हैं।

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