प्रस्तावना : पुराण का वास्तविक स्वरूप समझने की आवश्यकता
सर्वसाधारण की पुराण के प्रति आज अगाध श्रद्धा है। कुछ मनीषी विश्व-सृष्टि-ज्ञान के लिए पुराण को एकमात्र स्रोत मानकर उसे महत्त्व देते हैं। भगवन् व्यास की महाभारत में कही उक्ति के अनुसार इतिहास-पुराण को वेदार्थ के सुस्पष्ट अर्थ के लिए कतिपय विद्वान् पुराण को अतीव सहायक मानते हैं, तो कुछ विचारक पुराण को काल्पनिक भी मानते हैं। ऐसी स्थिति में इतिहास के अनुसंधान में पुराण के योग के विश्लेषण की दृष्टि से विचार करने का अवसर देना वस्तुतः श्लाघनीय प्रक्रम है।
गत पौने दो सौ वर्षों से पश्चिमी विद्वान् भी पुराणों का नाना पक्षों से सम्बन्धित अध्ययन कर रहे हैं। भारतीय वाङ्मय को विविध रूपों में देखना और उसे प्रकाशित करना उनका प्रशंसनीय एवं अनुकरणीय कार्य है। हमारे अधिकांश अध्येता मूल रूप में पुराणों को न देखकर उन लोगों के अनुवादों तथा उनकी टीका-टिप्पणियों और समालोचनाओं पर निर्भर करते हैं। इससे अनेकत्र भ्रान्तियाँ पनपती हैं तथा कुछ त्रुटिपूर्ण स्थापनाएँ भी दृढ़ हो जाती हैं। ऐसे समय में संगोष्ठी के माध्यम से पुराण का वास्तविक स्वरूप देखने तथा इसकी मौलिकता को समझने-परखने का यत्न मिल-जुलकर करना सर्वथा समयानुकूल है। इस दृष्टि से पुराण का संक्षेप में स्वरूप प्रस्तुत करने की चेष्टा की जा रही है।
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1. पुराणों के प्रति विभिन्न दृष्टिकोण : पुराण का वास्तविक स्वरूप और प्रचलित धारणाएँ
भारतीय आस्तिक जनता पुराणों को धार्मिक ग्रन्थ मानती है। यद्यपि धर्म अपने स्वस्थ रूप में सब कुछ समाहित कर लेता है तथा धर्मग्रन्थ होने से ये मानव-जीवन के सम्पूर्ण अभ्युदय तथा निःश्रेयस के साधक होने के कारण कालजयी होकर सदैव सभी के लिए समान रूप से उपादेय हैं, इसमें कोई सन्देह नहीं है; किन्तु आस्तिक जनता की दृष्टि में धर्म कुछ सामान्य कर्मकाण्डों तथा उपास्य देव की साम्प्रदायिक उपासना-पद्धति तक सीमित हो जाता है। अतः कुछ प्रौढ़ विचारशील लोग पुराण-कथाओं के प्रति उन्मुख नहीं हो पाते हैं।
कतिपय लोग इन्हें ऐतिह्य-ग्रन्थों के रूप में देखना चाहते हैं; किन्तु आज के इतिहास की स्थापनाओं तक सीमित ज्ञान होने से वे इनको पूर्ण श्रद्धा और परीक्षा की दृष्टि से न देखकर इतिहास को काँट-छाँट कर लेते हैं। फलतः न तो पुराणों को ही अपने यथार्थ रूप में प्रस्तुत कर पाते हैं और न इतिहास को ही उसके शुद्ध रूप में प्रस्तुत कर पाते हैं।
कुछ लोग पुराणों को सर्वथा मिथ्या मानते हैं। उनकी दृष्टि में ‘पुराण’ शब्द मिथ्या का पर्यायवाचक है, अतः वे पुराणों के अध्ययन से सर्वथा दूर रहते हैं। कुछ इसमें मिथक का अस्तित्व मानकर उचित सीमा तक उपयोग की सलाह देते हैं।
यह सब कुछ इसी कारण है कि आस्था और तर्क की समन्वित तथा तटस्थ विधि से पुराणों का अध्ययन करने का प्रयास और प्रवृत्ति कभी नहीं रही। आज एक परम्परा-सी बन गई है कि शोधप्रवण विद्वान् अपने शोध-विषय का मूल वेदों तक देखना चाहते हैं। तदनुसार पुराणों का मूल भी वेद में देखा जाता है। कुछ पुराणों को वेदसम्मित (वेदतुल्य) मानते हैं तो कुछ पुराणों को औपचारिक रूप में वेद ही कह देते हैं, जो वेद-भक्तों को अप्रिय लगता है। पुराणों में प्राप्त उल्लेखों के आधार पर कुछ पुराणों को वेदों से भी अधिक मानते हैं।
2. पुराण और वेद का सम्बन्ध : पुराण का वास्तविक स्वरूप वैदिक सन्दर्भ में
पुराणं सर्वशास्त्राणां प्रथमं ब्रह्मणा स्मृतम्।
अनन्तरं च वक्त्रेभ्यो वेदास्तस्य विनिर्गताः।। — मत्स्य पुराण, 53/3
इस पद्य का पूर्वार्ध मत्स्य पुराण 313 तथा पद्म पुराण, सृष्टिखण्ड 1/45 में भी है। इसका अर्थ स्पष्ट है—ब्रह्मा ने सभी शास्त्रों से पहले पुराण का स्मरण किया, इसके अनन्तर उनके मुख से वेद प्रकट हुए।
वेदादप्यधिकं मन्ये पुराणार्थ वरानने।
भगवान् शिव पार्वती से कहते हैं—हे सुमुखि! मैं पुराणार्थ को वेद से भी अधिक मानता हूँ।
पुराण का वास्तविक स्वरूप समझ लेने पर इन विरोधी विचारों की स्वतः निवृत्ति हो जाती है।
ऋक्, यजुः, साम और अथर्व नाम से प्रसिद्ध वेद केवल चार ही हैं, भले ही इनको ग्रन्थबद्ध करने वाली संहिताएँ कितनी ही हों। ये सभी संहिताएँ वाक्य-रूप में हैं। अतः यह कहा जा सकता है कि वाङ्मय-रूप में वेद चार ही हैं; इनका कोई पाँचवाँ रूप नहीं है। इन चारों वेदों में प्रतिपादित विषय निश्चित गणना में आबद्ध न होने से अनन्त कहे जाते हैं। ये वस्तुतः अर्थवेद हैं। इन अर्थवेदों में एक विषय का नाम पुराण है।
ऋचः सामानि छन्दांसि पुराणं यजुषा सह।
उच्छिष्टाज्जज्ञिरे सर्वे दिवि देवाः दिवि श्रिताः।।
इस मन्त्र में आया ‘पुराण’ शब्द ऋक्, साम, अथर्व और यजु शब्दों के साथ पढ़ा गया है। अतः जैसे ऋक् आदि वेद हैं, वैसे ही यह भी वेद है। वेदों को अपौरुषेय, अनादि और सनातन माना गया है; फलस्वरूप पुराण भी वैसा ही है। इससे सिद्ध है कि पुराण भगवान् व्यास की रचना है—जैसी मान्यता अधूरी है। व्यास ने तो इसी पुराण-विषय का बहुत-बहुत काल के पश्चात् व्याख्या के साथ प्रवचन कर शिष्यों को पढ़ाया है। भगवान् ब्रह्मा से लेकर अपने पिता पराशर तक 27 व्यासों तथा अन्य वेद-महर्षियों के पुराण-ग्रन्थों की सामग्री लेकर कृष्ण द्वैपायन वेदव्यास ने पुराण-प्रवचन किया है।
3. पुराण : सृष्टि-विज्ञान का ग्रन्थ और पुराण का वास्तविक स्वरूप
पुराण में आने वाले प्रमुख विषय का निर्देश भी अथर्ववेद के निम्नलिखित मन्त्र में किया गया है—
येत आसीद् भूमिः पूर्वा यामद्धातय इद् विदुः।
यो वै तां विद्यान्नामथा स मन्येत पुराणवित्।।
हम जिसमें विद्यमान हैं, इस भूमि अर्थात् जगती की जो पूर्ववर्ती भूमि-जन्मदात्री कारण-सन्तति रही है, उसे सत्यद्रष्टा साधक ही जानते हैं। जो उसे उसके नाम तथा नाम-प्रकार के साथ जानता है, वह ‘पुराणवित्’ कहलाता है।
इसका अभिप्राय है कि पुराण सृष्टि-विद्या है, जिसमें सृष्टि के मूल तथा उससे सृष्टि के जन्म का विज्ञान है। इस सृष्टि-विद्या को मिथक अथवा पौराणिक कथा-समूह कहना वास्तविकता से कितना दूर है, विज्ञजन स्वयं विचारें।
सृष्टि-विद्या में सृष्टि की उत्पत्ति (सर्ग), सृष्टि का लय (प्रतिसर्ग), वंश-सृष्टि के प्रारम्भ के वंश-प्रवर्तकों तथा उनके उत्तराधिकारियों का वर्णन, मन्वन्तर-कालगणना तथा वंशानुचरित का वर्णन प्रमुख रूप में रहता है। वंशानुचरित में वंशों का शाखाओं में विस्तार तथा वंश के अतिशय प्रभावशाली व्यक्तियों का चरित रहता है।
जब सृष्टि के मूल से ही प्रारम्भ करते हैं तो धर्म, दर्शन और पुराण में स्वाभाविक रूप में रहेंगे। सृष्टि का व्यक्त रूप त्रिलोकी में है। इसमें द्युलोक, अन्तरिक्षलोक तथा पृथ्वीलोक का समावेश है। इन सबका वर्णन करने में खगोल और भूगोल भी पुराण का विषय है।
4. पुराणों में पृथ्वी, लोक और मानव-समुदाय
पुराण का वास्तविक स्वरूप केवल धार्मिक आख्यानों तक सीमित नहीं है। पुराणों में पृथ्वी, लोक, पर्वत, नदियों, वन, मैदानों, बस्तियों तथा विभिन्न मानव-समुदायों का भी वर्णन मिलता है।
पृथ्वी जल और स्थल में विभाजित है। स्थल में नदी, पर्वत, वन, मैदान तथा बस्तियाँ हैं। पृथ्वी सात द्वीपों में विभाजित है। इन द्वीपों के वर्णन में वहाँ के मूलवासियों—देव, दैत्य, असुर, राक्षस, यक्ष, गन्धर्व, किन्नर, नर, नाग, सुपर्ण, ऋक्ष, वानर, मत्स्य आदि—का विस्तृत वर्णन है। ये भिन्न-भिन्न नाम वाले मनुष्य ही हैं।
इस तथ्य को समझकर पुराण का अध्ययन करने पर हम प्राचीनतम विश्व के इतिहास और भूगोल का यथार्थ ज्ञान प्राप्त कर सकते हैं। हम समझ सकते हैं कि देवों, राक्षसों, नागों के साथ मनुष्यों के विवाह आदि के विभिन्न सम्बन्ध काल्पनिक नहीं हैं। अपने अधूरे ज्ञान के बल पर पुराणों को काल्पनिक समझने वालों को अपने मत की असारता का ज्ञान हो जाएगा।
5. पुराणों की कालगणना : पुराण का वास्तविक स्वरूप और मन्वन्तर-व्यवस्था
पुराणों में की गई कालगणना ज्योतिष के आधार पर है तथा सृष्टि के सन्दर्भ में यह गणना है। इसे मानव-इतिहास के साथ जोड़ने की भूल हम करते हैं तथा दोष पुराण को देते हैं।
एक महायुग 43,20,000 वर्षों का होता है। महायुगों की 71 आवृत्तियों तथा सन्धिकाल के वर्षों की इकाई का नाम ‘मन्वन्तर’ है। गणना की सुविधा के लिए प्रत्येक मन्वन्तर को पृथक्-पृथक् नाम दिए गए हैं, जो स्वायम्भुव, स्वारोचिष आदि हैं। अभी ‘वैवस्वत मन्वन्तर’ चल रहा है।
14 मन्वन्तरों का पूरा काल अपने सन्धिकाल के सहित एक कल्प कहलाता है। यह एक सहस्र चतुर्युग की अवधि का, अर्थात् 4,32,00,00,000 वर्षों का है। यह सृष्टि की स्थिति का काल है। इतना ही लय-काल है। इन्हें क्रमशः अह (दिन) और रात्रि कहा गया है, जिनका सम्बन्ध ब्रह्मा से है।
स्वाभाविक है कि यह मानव-इतिहास नहीं हो सकता है। यह दृष्टि भी पुराण ही देते हैं। पुराणों में वंश-वर्णन के इतिहास को भी स्वायम्भुव आदि मन्वन्तर-नामों में विभाजित किया गया है। दोनों वर्णनों में नाम की समता से यह भ्रान्ति पैदा हुई, फलस्वरूप इतिहास विकृत हो गया है। वंश की पीढ़ियों की गणना को ध्यान से देखते हैं तो स्पष्ट होता है कि यहाँ लाखों-करोड़ों वर्षों की गणना नहीं ली गई है। महाभारत युद्ध के पूर्व की तथा बाद की पीढ़ियों की गणना से यह स्पष्ट होता है।
6. अध्यात्म, अधिदेव और अधिभूत की त्रिलोकी
पुराण का वास्तविक स्वरूप समझने के लिए अध्यात्म, अधिदेव और अधिभूत की अवधारणाओं को समझना आवश्यक है।
नाम की एकता का भी विशेष अभिप्राय है। पुराणवेद अध्यात्म, अधिदेव और अधिभूत विषयों को साथ लेकर चलता है। अतः जो अधिदेव त्रिलोकी में है, वह अध्यात्म तथा अधिभूत त्रिलोकी में भी है।
अध्यात्म-त्रिलोकी में सिर द्युलोक है, मध्य भाग अन्तरिक्ष है तथा पाद तक का भाग पृथ्वी है। इस पृथ्वी पर भी तीन लोक हैं। हिमालय से दक्षिण सागर तक का सम्पूर्ण भाग पृथ्वीलोक है। हिमालय, उसकी श्रेणियाँ तथा आसपास का भाग अन्तरिक्ष है। इससे परवर्ती उत्तर ध्रुव तक का भाग द्युलोक अथवा स्वर्ग है।
स्वर्ग के वासी देव, पृथ्वी के निवासी मनुष्य तथा अन्तरिक्षवासी शेष गन्धर्व आदि हैं। ये मनुष्यों की पारिभाषिक संज्ञाएँ हैं।
अधिदेव त्रिलोकी की कालगणना की इकाइयाँ अपने इन्हीं नामों के साथ पार्थिव त्रिलोकी की गणना के लिए ले ली गई हैं; बस मान (माप) में अन्तर है। हम इन नामों को एक मानकर एक ही गणना ले लेते हैं, जिससे विसंगतियाँ पैदा होती हैं।
7. सूर्यवंश और चन्द्रवंश : पुराण का वास्तविक स्वरूप और वंश-परम्परा
पार्थिव स्वर्ग के विवस्वान् अर्थात् सूर्य से आरम्भ हुआ वंश उसी नाम से वैवस्वत अंश कहलाता है। विवस्वान्–मनु–इक्ष्वाकु वहाँ का क्रम है। इसी में राम का जन्म हुआ।
इसी भाँति पार्थिव चन्द्र से चन्द्रवंश का आरम्भ हुआ। ब्रह्मा–अत्रि–चन्द्र–बुध–पुरुरवा–आयु–नहुष और ययाति इस वंश का क्रम है। ययाति के ज्येष्ठ पुत्र यदु से यादव वंश का आरम्भ हुआ, कनिष्ठ पुत्र पुरु से पौरव वंश चला। मध्यम तीन पुत्रों—अनु, द्रुह्यु और तुर्वसु—से चले वंश दूर तक नहीं टिक सके। अनु की सन्तति म्लेच्छ कहलायी, तुर्वसु की सन्तति यवन नाम से प्रसिद्ध हुई। यदुवंश में कृष्ण तथा पुरुवंश में युधिष्ठिर आदि का जन्म हुआ।
8. पुराण और प्राचीन इतिहास
पुराण का वास्तविक स्वरूप इतिहास की दृष्टि से भी महत्त्वपूर्ण है। रामायण और महाभारत प्राचीन इतिहास के प्रामाणिक ग्रन्थ अवश्य हैं, तथापि ये वंश-विशेष के उसी काल के चरित्र को बताते हैं। सम्पूर्ण पृथ्वी का तथा पार्थिव अन्तरिक्ष और द्युलोक का इतिहास नहीं बताते हैं। यह इतिहास केवल पुराणों में ही सुरक्षित है।
महाभारत के उत्तरकाल का लगभग दो सहस्राब्दियों का भारतीय इतिहास भी इनमें निबद्ध है। इस दृष्टि से पुराणों का असाधारण महत्त्व है। महाभारत से 12–11 सहस्र वर्ष पूर्व का एवं आज से 17–16 सहस्र वर्ष पूर्व का इतिहास पुराणों से ज्ञात होता है। इस प्राचीनता तक विश्व का इतिहास किसी भी देश के वाङ्मय में सुरक्षित नहीं है।
9. ‘पुराण’ शब्द की व्युत्पत्ति : पुराण का वास्तविक स्वरूप और शब्दार्थ
प्रायः पुराण का ‘पुराना’ अर्थ ही लोकविदित है। इसी अर्थ के आधार पर वाङ्मय की इस विधा को भी पुराण कहा जाता है। पुराणों में भी एतद्विषयक वचन मिलते हैं—
पुरा परात्परां वक्ति पुराणं तेन चोच्यते।
पुराण इसीलिए पुराण कहा जाता है कि यह पुराकालिक परम्परा को कहता है। प्रायः इसी आधार पर पुराण के निर्वचन भी किए गए हैं, जैसे—
यस्मात् पुरा ह्यनन्ती पुराणं तेन तत् स्मृतम्। — ब्रह्माण्ड पुराण, 1
चूँकि यह पुरातन को व्यक्त करता है, अतः पुराण है।
यस्मात्पुराह्यणन्तीदं पुराणं तेन उच्यते।
पुरातन काल को कहने से पुराण कहे जाते हैं।
इस प्रकार पुरातनता को लेकर ही पुराण का अर्थ किया जाए तो इतिहास तथा पुराण में क्या अन्तर है? वह भी भूत अर्थात् घटित घटना का वर्णन करता है। अतः नवीन-पुरातन का भेद इनका भेदक नहीं है। सृष्टि के वृत्त का वर्णन पुराण, मानव-चरित्र का वर्णन इतिहास है। पुराण के इस अर्थ की प्रतीति इस शब्द के निर्वचन से होती है।
10. ‘पुर’ और ‘पुराण’ की वैकल्पिक व्याख्या
सभी विद्वानों ने ‘पुराण’ में ‘पुरा’ अंश को प्राचीन अर्थ बताने वाले अव्यय ‘पुरा’ पद के रूप में लिया है। यह ‘पुर’ शब्द माना जाए तो पुराण शब्द का वास्तविक अर्थ प्राप्त हो सकता है।
‘पुर’ का एक अर्थ शरीर भी है। शान्तिपर्व 254.1 में कहा गया है— शरीरं पुरमित्याहुः।
अर्थात् शरीर को पुर कहते हैं। ईश्वर का एक नाम पुरुष इसीलिए है कि वह पुर में वास करता है, इस पुर को बनाता है, इसमें व्याप्त रहता है तथा अन्त में इसे नष्ट भी कर देता है।
इसी प्रकार पुराण का अर्थ है—पुर का आनयन; पुर में प्राणों के अनाहत घोष का करना; पुर को व्यक्त करना अथवा पुर में व्यक्त होना; पुर के माध्यम से स्तुति प्राप्त करना। इन निर्वचनों पर ध्यान दें तो पुराण शब्द के अनेक अर्थ हमारे समक्ष आते हैं।
11. पुराण का प्रथम अर्थ : सृष्टि-निर्माण
पुराण का वास्तविक स्वरूप सृष्टि-निर्माण की अवधारणा से भी सम्बद्ध है। पुराण का प्रथम अर्थ है—सृष्टि-निर्माण।
भगवान् की स्तुति में भीष्म पितामह कहते हैं—
पुराणे पुरुषं प्रोक्तं ब्रह्म प्रोक्तं युगादिषु।
क्षये सङ्कर्षणं प्रोक्तं तमुपास्यमुपास्महे।। — शान्तिपर्व
जिसे पुराण में पुरुष कहा गया है, युग के आदि में ब्रह्म तथा क्षय में संकर्षण कहा गया है, इस उपास्य-उपासनायोग्य ईश्वर की उपासना करते हैं। जैसे युग और क्षय अवस्था-विशेष हैं, वैसे ही पुराण भी अवस्था-विशेष को बताता है। यह अवस्था पुर-निर्माण की है। एक-एक परमाणु पुर है और सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड भी एक पुरुष है।
पुर को जो बनाता है, वह पुर का कर्त्ता भी पुराण है। अतः ईश्वर के नामों में जगह-जगह पुराण नाम है—
मही महीजाः पवनोऽन्तरिक्षं जलौकसश्चैव जलं दिवश्च।
दिवौकसश्चापि यतः प्रसूताः तदुच्यतां मे भगवन् ‘पुराणम्।। — शान्तिपर्व, 201/6
पृथ्वी, पृथ्वी से उद्भूत सत्त्व, पवन, अन्तरिक्ष, जलस्थ प्राणी, जल, द्यु तथा द्युचर पदार्थ जिससे उत्पन्न हुए हैं, उस ‘पुराण’ को मुझे कहिए।
ग्रन्थ इन सबकी उत्पत्ति का कथन करता है, उत्पत्ति नहीं करता है। अतः स्पष्ट है कि यहाँ उत्पत्तिकर्त्ता को पुराण कहा गया है।
12. अथर्ववेद में पुराण की सृष्टि-सम्बन्धी अवधारणा
इस प्रकार के व्यापक ज्ञान से शून्य तथा ऐसी जिज्ञासा से रहित विद्वद्गण इस प्रकार के भावों को पौराणिक, अतएव वेद-विरुद्ध कहकर अमान्य कर देते हैं, क्योंकि उन्होंने वेद भी नहीं देखे हैं। अथर्ववेद का यह उद्धृत मन्त्र यही कहता है—
यत्र स्कम्भः प्रजनयन् पुराणं व्यवर्तयत्।
एकं तदङ्ग स्कम्भस्य पुराणमनुसंविदुः।।
सृष्टि के सर्जन के लिए उद्यत स्कम्भ (जगदाधार परमात्मा) ने पुराण का विवर्तन किया। स्कम्भ के एक अंग को पुराण जानते हैं।
यहाँ पुराण की सृष्टि-रचना में उपादेयता बताई गई है, क्योंकि वह परमात्मा की एक शक्ति, उसके अंग के रूप में है। इसी दृष्टि से ब्राह्मणादि ग्रन्थों में पुराण को ईश्वर के नाम के रूप में व्यवहृत किया है। शतपथ ब्राह्मण के ही एक भाग बृहदारण्यकोपनिषद् में ‘खं ब्रह्म खं पुराणम्’ रूप में ख, ब्रह्म और पुराण नाम पर्यायवाचक के रूप में पढ़े हैं।
13. गीता और गरुड़ पुराण में पुराण की अवधारणा
श्रीकृष्ण की स्तुति में अर्जुन का कथन है—
त्वमादिदेवः पुरुषः पुराणस्त्वमस्य विश्वस्य परं निधानम्।
वेत्तासि वेद्यं च परं च धाम त्वया ततं विश्वमनन्तरूपम्।। — गीता, 11.38
गरुड़ पुराण, ब्रह्मकाण्ड में यह और भी स्पष्ट है—
ब्रह्माणमाहुश्च पुराणमाहुः क शब्द वाच्यं सर्वलोकेशमाहुः।
ईशं चाहं रुद्रमित्येव चाहुः तत्प्रेरकं सृष्टिसंहारकार्ये।। — गरुड़ पुराण, 24.41
14. पुराण और धर्म का सम्बन्ध : पुराण का वास्तविक स्वरूप और आचार-परम्परा
मानव का धर्म शाश्वत है। देश-काल की परिस्थिति से वह अप्रभावित है। वेद से बोधित वह धर्म यद्यपि स्मृतियों तथा धर्मसूत्रों में भली-भाँति व्याख्यात है, तथापि सर्वसाधारण के लिए उसे सैद्धान्तिक रूप में जानना कष्टकर है। यदि उसे आचरित रूप में बताया जाए तो वह सामान्य बुद्धिजनों के लिए भी सरलता से ग्राह्य हो जाता है।
पुराण सिद्धान्त-रूप में तो धर्म का कथन करते ही हैं, महापुरुषों के चरित्र में उस धर्म का अनुवर्तन बताते हुए उसका व्यवहार-पक्ष भी भली-भाँति व्याख्यायित करते हैं। इसकी व्याख्या की तथा व्यवहार की व्यापकता के निर्देश से धर्म का एक नाम ही पुराण हो गया है।
वेदाहं जाजले! धर्म सरहस्यं सनातनम्।
सर्वभूतहितं मैत्रं पुराणं यं जना विदुः।। — शान्तिपर्व, 262.5
जाजले! मैं धर्म को उसके सरहस्य सहित सनातन रूप में जानता हूँ, जिसे लोग सर्वभूतहित, मैत्र और पुराण मानते हैं।
अष्टा आत्मगुणाः प्रोक्ताः पुराणस्य तु कोविदैः।
विद्वानों ने पुराण अर्थात् धर्म के निजी आठ गुण बताए हैं।
15. पुराणों में त्रिलोकी और तीर्थ-परम्परा
पुराण का वास्तविक स्वरूप समझने के लिए पुराणों में वर्णित त्रिलोकी, तीर्थ और भौगोलिक संकेतों का अध्ययन भी महत्त्वपूर्ण है।
पुराणों के इस स्वरूप को जान लेने पर इतिहास आदि की दृष्टि से अनेक पद्यों का सही संगत अर्थ किया जा सकता है। एक-दो उदाहरण से इसे स्पष्ट किया जा सकता है।
पृथिव्यां नैमिषं पुण्यमन्तरीक्षे च पुष्करम्।
त्रयाणामपि लोकानां कुरुक्षेत्रं विशिष्यते।। — मत्स्य पुराण, 108/3
पृथ्वी में नैमिष पुण्यस्थल है, अन्तरिक्ष में पुष्कर, किन्तु तीनों लोकों में कुरुक्षेत्र की विशेषता है।
तिस्र कोटयोऽर्धकोटिश्च तीर्थानां वायुरब्रवीत्।
दिवि भुव्यन्तरिक्षे च तन्सर्वं जाह्नवी स्मृता।। — मत्स्य पुराण, 109/7
वायु ने साढ़े तीन करोड़ तीर्थ द्यौ, पृथ्वी और अन्तरिक्ष में बताए हैं; वे सारे तीर्थ जाह्नवी (गंगा) हैं।
विश्व में भ्रमण कर मनचाहे तीर्थों में यात्रा की जा सकती है, किन्तु यह भ्रमण भूलोक में ही सम्भव है, अन्तरिक्ष और द्युलोक में नहीं। पुष्कर अन्तरिक्ष में है। इससे स्पष्ट होता है कि यह हिमालय से लगा उस ओर का स्थान है।
पुष्कर द्वीप, पुष्कर पर्वत तथा पुष्कर स्थान-विशेष महाभारत तथा सभी पुराणों में वर्णित हैं। इसका अपभ्रंश ‘बुखारा’ शब्द है, जैसे अपने इस पुष्कर का अपभ्रंश पोखर है, पुष्करारण्य पोकरणा है।
वायु तीर्थ-सत्ता पृथ्वी, अन्तरिक्ष और द्युलोक में बताते हैं। ये यदि हमारे गम्य नहीं हैं तो इनका वर्णन ही व्यर्थ होगा; किन्तु ऐसा नहीं है। आयुर्वेद, ज्योतिष, रामायण और महाभारत में भी पार्थिव त्रिलोकी वर्णित है।
महाभारत का एक पद्य देखिए—
उत्तरे हिमवत्पार्श्वे पुण्ये सर्वगुणान्विते।
पुण्यः क्षेमश्च काम्यश्च परो लोक उच्यते।। — शान्तिपर्व, 192.8
हिमालय के पुण्य तथा सभी गुणों से युक्त उत्तर पार्श्व में पुण्य, क्षेम—कल्याण-रूप, सभी का काम्य (इच्छित) स्थान है, जो परलोक कहलाता है।
16. मेरु, पामीर और प्राचीन भूगोल : पुराण का वास्तविक स्वरूप और भूगोल
पार्थिव ब्रह्मा यहीं मेरु पर रहकर सृष्टि-व्यवस्था करते हैं—
प्रजाविसर्ग विविधं कथं सं सृजते विभुः।
मेरुमध्ये स्थितो ब्रह्मा तद्ब्रूहि द्विजसत्तम।। — शान्तिपर्व, 183.1
भरद्वाज भगवान् भृगु से पूछते हैं कि मेरु-मध्य में अवस्थित ब्रह्मा नाना प्रकार के प्रजाविसर्ग की रचना कैसे करते हैं, हे द्विजश्रेष्ठ! कृपया मुझे बताइए।
मेरु को पामीर के साथ समीकृत किया गया है। इस विषय में ज्योतिष और भूगोल के ग्रन्थों के साथ इस युग के महान् वेदज्ञ समीक्षा-चक्रवर्ती श्रीमधुसूदनजी ओझा के ग्रन्थ—1. जगद्गुरुवैभवम्, 2. इन्द्र विजय तथा अत्रिख्याति आदि—के निर्देश से हम विश्व का प्राचीनतम इतिहास प्रस्तुत करने में समर्थ हो सकते हैं तथा पुराण का वास्तविक स्वरूप नए प्रकाश में विश्व के समक्ष प्रस्तुत कर सकते हैं।
निष्कर्ष : पुराण का वास्तविक स्वरूप और उसका शोध-महत्त्व
पुराण का वास्तविक स्वरूप केवल धार्मिक कथा-साहित्य, मिथक अथवा कल्पित आख्यानों के संग्रह तक सीमित नहीं माना जा सकता। प्रस्तुत अध्ययन में पुराण को सृष्टि-विज्ञान, कालगणना, वंश-परम्परा, भूगोल, खगोल, धर्म और मानव-चरित्र के समन्वित वाङ्मय के रूप में देखने का आग्रह किया गया है।
पुराणों में वर्णित सर्ग, प्रतिसर्ग, मन्वन्तर, वंश और वंशानुचरित की अवधारणाएँ उनके विशिष्ट ज्ञान-संरचना का संकेत देती हैं। इसी प्रकार अध्यात्म, अधिदेव और अधिभूत की अवधारणाओं को साथ रखकर देखने पर पुराणों में प्रयुक्त त्रिलोकी, लोक, देव, मनुष्य, गन्धर्व आदि संज्ञाओं के एक विशिष्ट पारिभाषिक अर्थ की स्थापना की गई है।
इतिहास के अनुसन्धान की दृष्टि से पुराणों का महत्त्व इस तथ्य में निहित है कि इनमें वंश-परम्पराओं, प्राचीन भूगोल, कालगणना तथा सांस्कृतिक स्मृतियों का विशाल भण्डार सुरक्षित है। अतः पुराण का वास्तविक स्वरूप समझने के लिए पुराणों का अध्ययन न तो केवल श्रद्धा के आधार पर होना चाहिए और न पूर्वनिर्धारित संशय के आधार पर। आवश्यकता इस बात की है कि पुराणों को उनके मूल पाठ, पारिभाषिक शब्दावली, वैदिक सन्दर्भों तथा भारतीय ज्ञान-परम्परा के व्यापक परिप्रेक्ष्य में समझा जाए।
इस दृष्टि से पुराण का वास्तविक स्वरूप भारतीय वाङ्मय की ऐसी महत्त्वपूर्ण परम्परा के रूप में सामने आता है, जिसका सम्यक् अध्ययन इतिहास, संस्कृति, भूगोल, कालगणना, धर्म और भारतीय सभ्यता के प्राचीन स्वरूप के अनुसन्धान के लिए नए प्रश्न और सम्भावनाएँ प्रस्तुत कर सकता है।
इस विषय पर यह भी पढ़े- निगम, आगम और पुराण: सनातन धर्म और हिन्दू संस्कृति के आधार स्तम्भ
