पुराणों की पौराणिकता - bharatkaitihas.com

पुराणों की पौराणिकता का महत्त्व

इस आलेख में पुराणों की पौराणिकता का विवेचन वैदिक साहित्य, उपनिषदों, ब्राह्मण ग्रन्थों, प्राचीन आख्यानों तथा भगवान् श्रीकृष्ण के स्वरूप के संदर्भ में किया गया है, जो भारतीय ज्ञान-परम्परा को समझने में सहायक है।

1. भारतीय वाङ्मय में पुराणों का स्थान : पुराणों की पौराणिकता का महत्त्व

भारतीय वाङ्मय में पुराणों का स्थान अतुलनीय है। पुराणों के शाब्दिक, साहित्यिक, धार्मिक एवं आध्यात्मिक आदि चिन्तन का क्षेत्र वेदों से भी बढ़कर है। पुराणों से साक्षात्कार के बिना वेद और उपनिषदों का ज्ञान भी अधूरा है। जैसा कि वायु पुराण में कहा गया है—

वह ब्राह्मण, जो उपनिषदों और अंगों सहित वेदों को जानता है, शास्त्र-निपुण नहीं कहा जा सकता, यदि उसे पुराणों का बोध नहीं है। उसे अपना वेदज्ञान इतिहास और पुराणों की सहायता से पूर्ण करना चाहिए, क्योंकि वेद स्वयं ऐसे व्यक्ति से, जिसका ज्ञान पुराणादि का बोध न होने के कारण कम है, भय मानता है कि कहीं मेरा अनर्थ न हो जाए।

2. पुराण शब्द का निर्वचन और पुराणों की पौराणिकता

पुराण शब्द का निर्वचन कई तरह से किया गया है—

  1. ‘पुराणं पुराभवम्’।
  2. ‘पुराणे प्रतनप्रत्नपुरातनचिरन्तनाः’। इसी की व्याख्या करते हुए लिखा गया है—

‘पुराभवं यद्वा, पुरापि नवं भवति यद्वा, पुरा अतीतानागतौ-अर्थौ अणति।’

  1. ‘पुराणं कस्मात्? पुरा नवं भवति।’
  2. ‘पुरा परम्परां वक्ति पुराणं तेन वै स्मृतम्।’
  3. ‘पुराणि अन्तःकरणानि जीवहृदयानि अनति (अण्यते) उज्जीवयति इति पुराणम्।’

इन सभी निरुक्तियों से पुराण शब्द सनातन, पुरातन, पुराना होते हुए भी नया तथा जीवों के अन्तःकरणों को परिपूर्ण करने वाला आदि अर्थों में प्रयुक्त हुआ है। जीवों के हृदयों को परिपूर्ण करने के कारण पुराण परमात्मा का ही स्वरूप है।

3. पुराण वेदों के ज्येष्ठ भ्राता : पुराणों की पौराणिकता का वैदिक आधार

पुराणों के बारे में यह भी कहा जाता है कि पहले पुराण प्रकट हुए, बाद में वेद। प्रमाण के रूप में निम्नलिखित श्लोक प्रस्तुत किया जाता है—

पुराणं सर्वशास्त्राणां प्रथमं ब्रह्मणा स्मृतम्।

अनन्तरं च वक्त्रेभ्यो वेदास्तस्य विनिर्गताः॥

इसका अर्थ करते हुए स्वामी अखण्डानन्द सरस्वती कहते हैं—

“ब्रह्माजी के हृदय में जो पुराण भरा हुआ था, उसको उन्होंने पहले याद करके निकाल दिया। फिर जब पुराणों का प्रवचन कर दिया, हृदय खाली हो गया, तब उसमें वेद प्रकट हुए। इस प्रकार पहले पुराण प्रकट हुए, बाद में वेद प्रकट हुए। जो पुराना होता है, वह बड़ा भाई होता है, इसलिए पुराण वेद के ज्येष्ठ भ्राता हैं।”

3.1 वेदों और उपनिषदों में पुराणों की पौराणिकता के संकेत

पुराण-साहित्य के वेदों से भी पहले होने के संकेत स्वयं वेदों, ब्राह्मण ग्रन्थों और उपनिषदों में भी प्राप्त होते हैं—

1. अथर्वसंहिता

अथर्वसंहिता के अनुसार ऋक्, साम, छन्द और पुराण यजुर्वेद के साथ उत्पन्न हुए—

ऋचः सामानि छन्दांसि पुराणं यजुषा सह।

2. शतपथ ब्राह्मण

शतपथ ब्राह्मण में आया है—

अध्वर्युस्ताक्ष्ये वै पश्यतो राजयेत्याह ………….

पुराणं वेदः सोऽयमिति किञ्चित् पुराणमाचक्षीत।

3. बृहदारण्यक उपनिषद्

बृहदारण्यक में उल्लिखित है—

ऋग्वेदो यजुर्वेदः सामवेदोऽथर्वाङ्गिरस इतिहासः पुराणं विद्या उपनिषद् ………. अस्यैव एतानि सर्वाणि निःश्वसितानि।

4. छान्दोग्य उपनिषद्

छान्दोग्य उपनिषद् की उक्ति है—

स होवाच ऋग्वेदं भगवोऽध्येमि यजुर्वेदं सामवेदमथर्वणं चतुर्थमितिहासं पुराणं पञ्चमं वेदानां वेदम्।

इत्यादि अनेक स्थल हैं, जहाँ पुराण-वाङ्मय का उल्लेख मिलता है।

4. वैदिक साहित्य में पौराणिक आख्यान और पुराणों की पौराणिकता

जहाँ तक पुराणों के विषयों अथवा आख्यानों की बात है, वैदिक साहित्य में ऐसे अनेक उल्लेख मिलते हैं, जहाँ कहीं सूक्ष्म रूप में तो कहीं विस्तार से पौराणिक कथाएँ उपलब्ध हैं—

4.1 विभिन्न अवतारों और आख्यानों में पुराणों की पौराणिकता

  1. ऋक्संहिता (1.12.17) में वामनावतार का स्पष्ट वर्णन मिलता है—

इदं विष्णुर्विचक्रमे त्रेधा निदधे परम्।

  1. शतपथ ब्राह्मण (1.2.5.7) में वामनावतार से सम्बन्धित पूरी आख्यायिका ही दी गई है।
  2. तैत्तिरीय आरण्यक (1.23.1) और शतपथ ब्राह्मण (7.3.35) में कूर्मावतार का वर्णन है।
  3. शतपथ ब्राह्मण (1.81.210) में मत्स्यावतार का वर्णन है।
  4. तैत्तिरीय संहिता (7.1.5.1) तथा तैत्तिरीय ब्राह्मण (1.1.3.5) में वराहावतार का वर्णन है।
  5. तैत्तिरीय आरण्यक (10.16) में वासुदेव श्रीकृष्ण की कथा है।

5. पुराणों की पौराणिकता और भगवान् श्रीकृष्ण का स्वरूप

उपर्युक्त सभी प्रमाणों के आधार पर पुराणों के अत्यन्त पौराणिक होने में कोई सन्देह नहीं रह जाता है। न केवल वेद, अपितु पुराण भी भगवान् के निःश्वास हैं।

श्रीमद्भागवत महापुराण की संस्तुति को यदि स्वीकार करें, तो परम पुराण-पुरुष के रूप में एकमात्र उत्तम पुरुष, अन्वय पुरुष, देवकीनन्दन वासुदेव भगवान् श्रीकृष्ण ही अवतरित होते हैं। भगवान् ब्रह्माजी से कहते हैं—

अहमवमेवासमेवाग्रे नान्यद्यत्सदसत्परम्।

पश्चादहं यदेतच्च योऽवशिष्येत सोऽस्म्यहम्॥

अर्थात् सृष्टि के पहले सदसत् से परे केवल मैं ही था, स्थितिकाल में भी मैं ही हूँ और विनाश के बाद भी मैं ही रहूँगा। ग्रन्थावतार श्रीकृष्ण भगवान् का यह उद्घोष केवल उन्हें ही अतीत-अनागत, अद्यतन-अनद्यतन, सनातन-पुरातन तथा परम पुराण सिद्ध करता है।

6. पुराणों की पौराणिकता : संदर्भ-ग्रन्थ सूची

  1. वायु पुराण, 1, 200–201—

यो विद्याच्चतुरो वेदान् साङ्गोपनिषदो द्विजः।

न चेत्पुराणं संविद्यान्नैव स स्याद् विचक्षणः॥

इतिहासपुराणाभ्यां वेदं समुपबृंहयेत्।

बिभेत्यल्पश्रुताद् वेदो मामयं प्रहरिष्यति॥

  1. पद्मचन्द्र कोश, सम्पादक गणेशदत्त शास्त्री, 1925, पृ. 320।
  2. अमरकोश, वृत्तिकार, श्लोक 76।
  3. निरुक्त, 3.19.24।
  4. पद्म पुराण, 1.2.53।
  5. मत्स्य पुराण, 53.3।
  6. भागवत-दर्शन, भाग 1, माहात्म्य, पृ. 5, सत्साहित्य प्रकाशन ट्रस्ट, मुम्बई, 1981।
  7. अथर्व, 71.7.24।
  8. शतपथ ब्राह्मण, 13.4.3.13।
  9. बृहदारण्यक उपनिषद्, 2.4.10।

डॉ. मोहनलाल गुप्ता

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