भारतीय परम्परा में इतिहास की प्राचीनता और पुराणों में कालगणना
पारम्परिक मान्यताओं के अनुसार भारतीय इतिहास इतना प्राचीन (सृष्टि संवत् 1955885106) [1] है कि यदि आदिकाल से आज तक का इतिहास अत्यन्त संक्षेप से लिखे जाने के क्रम में एक शताब्दी का इतिहास मात्र एक पृष्ठ में समाविष्ट कर दिया जाता तब भी वह प्रायः 19558851 पृष्ठों के अन्तर्गत सम्पूर्ण हो पाता। यदि एक हजार पृष्ठों का एक इतिहास-खण्ड होता तो 19559 मोटी-मोटी जिल्दें होतीं।
यदि एक पृष्ठ में तीस पंक्तियाँ एवं एक पृष्ठ का एक मिनट में पढ़ा जाना मानकर छः घंटे प्रतिदिन जीवन पर्यन्त पढ़ना मान लें तब भी इस इतिहास की समस्त जिल्दें लगभग 149 वर्षो में पढ़ा जाना सम्भव हो पाएगा। उपर्युक्त उदाहरण से स्पष्ट है कि इतनी सुदीर्घ परम्परा का पाश्चात्य पद्धति द्वारा मान्य तिथिक्रमिक इतिहास लिखा जाना असंभव है और यदि येन-केन प्रकारेण सम्भव भी हो तब भी व्यक्ति तथा संसार हेतु नितान्त निरर्थक सिद्ध होगा। इस चर्चा में पुराणों में कालगणना भारतीय परम्परा की समय-दृष्टि को सामने लाती है।
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पाश्चात्य विद्वानों की सृष्टि-सम्बन्धी धारणाएँ — पुराणों में कालगणना
वस्तुतः मानव-सृष्टि के संबंध में अत्यल्प ज्ञान तथा अविकसित वैज्ञानिक अवधारणाओं के कारण 18-19 वीं शताब्दी के पाश्चात्य विद्वानों के विचार में सृष्टि मात्र कुछ हजार वर्ष पूर्व ही आरंभ हुई। इसी भ्रान्तिवश उनके द्वारा भारतीय सभ्यता-संस्कृति को अधिक से अधिक चार-पाँच हजार वर्ष प्राचीन परिकल्पित किया गया।
इस पूर्वाग्रहयुक्त मान्यता एवं अवरोधक धारणावश उन्होंने सम्पूर्ण भारतीय इतिहास-परम्परा को इसी कालावधि के अन्तर्गत समाविष्ट करने का प्रयास करते हुए प्रत्येक महत्त्वपूर्ण काल-खण्ड को यथासम्भव परवर्ती तिथि प्रदान करने की चेष्टा की। इस दृष्टिकोण को समझने में पुराणों में कालगणना का विवरण उपयोगी है।
सृष्टि की आयु के विषय में विभिन्न मत — पुराणों में कालगणना
सृष्टि की अर्वाचीनता के परिप्रेक्ष्य में कतिपय पाश्चात्य विचारकों की मान्यताओं का उल्लेख प्रासंगिक प्रतीत होता है। आर्कबिशप उशर के मतानुसार सृष्टि ईसा से 4004 वर्ष पूर्व अस्तित्व में आई थी। अन्य ईसाई विद्वानों के विचार में सृष्टि का प्रारम्भ 6984 ई. पू. हुआ था।
कतिपय पाश्चात्य वैज्ञानिकों द्वारा ग्रह-नक्षत्रों की उष्णता के परिमाणानुसार सृष्टि की उत्पत्ति प्रायः चालीस लाख वर्ष पूर्व अनुमानित की गई, जबकि भूगर्भशास्त्रियों ने पृथ्वी की आयु लगभग दस करोड़ वर्ष परिकल्पित की। सुप्रसिद्ध अस्थित तत्त्ववेत्ता डॉ. विलियम एवं डॉ. स्मिथ एडवर्ड द्वारा भूगर्भ विशारदों के मत की पृथ्वी की उष्णता तथा समुद्र-जल के खारेपन के आधार पर सम्पुष्टि की गई।
धातुविज्ञानियों ने इस गणना को 24 से 30 करोड़ वर्षा तक बढ़ाया जबकि प्रो. निशचाफ, प्रो. रेड और प्रो. हक्सल सृष्टि-निर्माण क्रमशः 35 करोड़ वर्ष, 50 करोड़ वर्ष तथा एक अरब वर्ष पूर्व मान्य करते हैं। [2] आधुनिक वैज्ञानिक अधुनातन कार्बन-14 पद्धति के परीक्षण द्वारा पृथ्वी की आयु प्रायः साढ़े चार अरब वर्ष अनुमानित करते हैं जिसके अन्तर्गत सृष्ट्यारम्भ लगभग दो अरब वर्ष पूर्व निर्धारित किया गया है। उक्त गणना पारम्परिक पुराणोक्त कालगणना के तथ्यों से पूरी तरह मेल खाती है।
इतिहास-लेखन में पुराणों का महत्त्व — पुराणों में कालगणना
वस्तुतः भारत के प्राचीन इतिहास के अनुसंधान हेतु रामायण एवं महाभारत सरीखे इतिहास-ग्रन्थों के अतिरिक्त मात्र पुराणों के ही सर्वाङ्गीण अनुशीलन से क्रमबद्ध यथार्थ इतिहास -लेखन सम्भव है। इनके अनुशीलनकर्त्ता विद्वानों का एक वर्ग पुराणों के परिवर्तन-परिवर्द्धन में विश्वास नहीं करते हुए पुराण-कथनों में अत्यन्त श्रद्धा रखकर किंचिन्मात्र भी शंका नहीं करना चाहता किन्तु दूसरा वर्ग पुराणों को कपोल-कल्पित तथा भ्रामक तथ्यों का पिटारा घोषित कर सर्वथा उपेक्षणीय समझता रहा है।
उपर्युक्त दोनों वर्गों के विद्वान् अतिवादी दृष्टिकोण के कारण पुराणों के यथार्थ अन्वेषण द्वारा क्रमबद्ध इतिहास लिखने में विफल रहे। यद्यपि जैकोबी और पार्जिटर प्रभृति पाश्चात्य विद्वानों ने पुराणों के वंशानुचरित भाग को महत्त्व प्रदान कर ऐतिहासिक तथ्यों के संकलन के प्रयत्न किए तथापि पौराणिक कालगणना का सामंजस्य न कर पाने के कारण वे भी प्राचीन भारत का परम्परा-मान्य सुव्यवस्थित क्रमिक इतिहास लिखने में सफल न हो सके।
वस्तुतः पुराणों के अन्तर्गत ज्योतिष, आयुर्वेद, राजनीति, समाज-व्यवस्था, आचार-व्यवहार, दर्शन, धर्म-अध्यात्म के समानान्तर इतिहास तथा कालगणना आदि का यथोचित समावेशन प्राप्त होता है। [3] इस प्रसंग में पुराणों में कालगणना से सम्बद्ध पारम्परिक मान्यताओं का उल्लेख किया गया है।
पुराणों में कालगणना की मूल अवधारणा
पुराणोक्त कालगणना एवं कालमान सृष्टिकर्त्ता ब्रह्मा की आयु पर समाधारित है। इसे आरोही और अवरोही दोनों क्रमानुसार निर्दिष्ट किया गया है। आरोही क्रम का आरंभ जहाँ परमाणु से होता है वहीं अवरोही क्रम ब्रह्म की पूर्णायु ‘‘पर’’ से गणनीय है। विविध पुराणों में वर्णित कालगणना से सम्बंधित तथ्यों को सरल, सुबोध तथा सारणीबद्ध रूप से विवेचित करने का प्रयास किया जा रहा है। अतः पुराणों में कालगणना को इस विमर्श का एक प्रमुख आधार माना गया है।
श्रीमद्भागवत पुराण में कालगणना — पुराणों में कालगणना
श्री मद्भागवत पुराण के अनुसार-
अणुर्द्वौ परमाणु स्यात्त्रसरेणुस्त्रयः स्मृतः।
जालार्करश्म्यवगतः खमेवानुपतन्नगात्।। 5।।
त्रसरेणुत्रिकं भुङ्क्ते यः कालः स त्रुटि स्मृतः।
शतभागस्तु वेधः स्यात्तैस्त्रिभिस्तु लवः स्मृतः।
निमेषस्त्रिलवो ज्ञेय आम्नातस्ते त्रयः क्षणः।
क्षणान् पंच विदुः काष्ठां लघु ता दश पंच च।। 7।।
लघूनि वै समाम्नाता दश पंच च नाडिका।
ते द्वे मुहूर्त्तः प्रहरः षड्यामः सप्त वा नृणाम्।। 8।।
यामाश्चत्वारशचत्वारो मर्त्यनामहनी उभे।
पक्षः पंचदशाहानि शुक्लः कृष्णश्च मानद।। 10।।
तयोः समुच्चयो मासः पितृणां तदहर्निशम्।
द्वौ तावृतुः षडयनं दक्षणं चोत्तरं दिवि।। 11।।
अयने चाहनी प्राहुर्वत्सरो द्वादश स्मृतः।
संवत्सरशतं नृणां परमायुर्निरूपितम्।। 12।।
कृतं त्रेता द्वापरं च कलिश्चेति चतुर्युगम्।
दिव्यैर्द्वादशभिर्वर्षैः सावधानं निरूपितम्।। 18।।
चत्वारि त्रीणि द्वे चैकं कृतादिषु यथाक्रमम्।
संख्या तानि सहस्त्राणि द्विगुणानि शतानि च।। 19।।
सन्ध्यांशयोरन्तरेण यः कालः शतसंख्ययोः।
तमेवाहुर्युगं तज्ज्ञा यत्र धर्मो विधीयते।। 20।।
त्रिलोक्या युगसाहस्रं बहिराब्रह्मणो दिनम्।
तावत्येव निशा तात यन्निमीलति विश्वसृक्।। 22।।
निशावसान आरब्धो लोककल्पोऽनुवर्तते।
यावद्दिनं भगवतो मनून् भुंजश्चचतुर्दश।। 23।।
स्वं स्वं कालं मनुर्भुङ्क्ते साधिकां ह्येकसप्ततिम्।
मन्वन्तरेषु मनवस्तद्वंश्या ऋषयः सुराः।
भवन्ति चैव युगपत्सुरेशाश्चानु ये च तान्।। 24।।
एवं विधैरहोरात्रैः कालगत्योपलक्षितैः।
अपक्षितमिवास्यापि परमार्युवयः शतम्।। 32।।
यदर्धमायुषस्तस्य परार्धमभिधीयते।
पूर्वः परार्धोऽपक्रान्तो ह्यपरोऽद्य प्रवर्तते।। 33।।
पूर्वस्यादौ परार्धस्य ब्राह्मो नातम महानभूत्।
कल्पो यत्राभवद्ब्रह्मा शब्दब्रह्मेति यं विदुः।। 34।।
तस्यैव चान्ते कल्पोऽभूद् यं पाद्मभिचक्षते।
यद्धरेर्नाभिसरस आसील्लोक सरोरुहम्।। 35।।
अयं तु कथितः कल्पो द्वितीयस्यापि भारत।
वाराह इति विख्यातो यत्रासीत्सूकरो हरिः।। 36।।
कालोऽयं द्विपरार्धाख्यो निमेष उपचर्यते।
अव्याकृतस्यानन्तस्य अनादेर्जगदात्मनः।। 37।। [4]
अर्थात् दो ‘परमाणु’ मिलकर एक ‘अणु’ और तीन अणुओं के संयोग से एक ‘त्रसरेणु’ होता है। जो झरोखे से आई सूर्य-किरणों के प्रकाश में आकाश में उड़ता देखा जाता है। ऐसे तीन त्रसरेणुओं को पार करने में सूर्य-किरणों को लगने वाला समय ‘त्रुटि’ तथा इसका सौगुना समय ‘वेध’ कहलाता है।
तीन वेध का एक ‘लव’ एवं तीन लव का एक ‘निमेष’ होता है। तीन निमेष का एक ‘क्षण’ पाँच क्षण की एक ‘काष्ठा’ और पन्द्रह काष्ठा का एक ‘लघु’ होता है। पन्द्रह लघु की एक ‘नाडिका’ (दण्ड), दो नाडिका का एक ‘मुहूर्त्त’ तथा दिन के घटने-बढने के अनुसार (दिन एवं रात्रि की दोनों संधियों के मुहूर्त्तों को छोड़कर) छः अथवा सात नाड़िका का एक ‘प्रहर’ (याम) होता है।
चार-चार प्रहर के मनुष्य के ‘दिन और रात’ तथा पन्द्रह दिन-रात काएक ‘पक्ष’ होता है जो शुक्ल एवं कृष्ण के भेद से दो प्रकार का माना गया है। ये दोनों पक्ष मिलकर एक ‘मास’ कहलाते हैं, जो पितरों का एक दिन-रात हे। दो मास की एक ऋतु और छः मास का एक ‘अयन’ होता है। ये ‘दक्षिणायन’ तथा ‘उत्तरायण’ के भेद से दो प्रकार के हैं। दोनों अयन मिलकर देवताओं के एक दिन-रात एवं मनुष्यलोक में ये ‘वर्ष’ अथवा बारह मास कहे जाते हैं।
ऐसे सौ वर्ष की मनुष्य की परम आयु निरूपित की गई है। सत्ययुग, त्रेता, द्वापर और कलि-ये चार युग अपनी संध्या तथा सन्ध्यांश सहित दिव्य बारह हजार वर्षों तक रहते हैं, ऐसा निरूपित किया है। इन चारों युगों के अन्तर्गत क्रमशः चार, तीन, दो एवं एक हजार दिव्य (देवताओं के) वर्ष होते हैं और प्रत्येक में जितने सहस्र वर्ष होते हैं उससे दुगुने सौ वर्ष उनकी संध्या तथा सन्ध्यांशों में होते है। युग के आदि में सन्ध्या एवं अन्त में सन्ध्यांश होते हैं।
इनके मध्यवर्ती काल को ‘युग’ कहा गया है। त्रिलोकी से बाहर यहाँ की एक हजार चतुर्युगी (चारों युगों के काल का योग) का एक दिन तथा इतनी ही बड़ी रात्रि होती है, जिसमें ब्रह्मा शयन करते हैं। उस रात्रि का अन्त होने पर इस लोक का ‘कल्प’ प्रारम्भ होता है, उसका क्रम ब्रह्म के दिन पर्यन्त चलता रहता है। उस एक कल्प में चौदह मनु अथवा मन्वन्तर हो जाते हैं।
प्रत्येक मनु इकहत्तर चतुर्युगी से कुछ अधिक काल (6/15 चतुर्युगी) पर्यन्त अपना अधिकार- भोग करता है। प्रत्येक मन्वन्तर के अन्तर्गत भिन्न-भिन्न मनुवंशी राजा, सप्तर्षि, देवता, इन्द्र एवं अधीनस्थ गन्धर्वादि साथ-साथ ही अपना अधिकार भोगते हैं। इस प्रकार काल की गति से एक-एक हजार चतुर्युग के रूप में प्रतीत होने वाले दिन-रात के हेर फेर से ब्रह्मा की सौ वर्ष की परमायु भी बीती हुई सी दिखाई देती है।
ब्रह्मा की आयु के आधे भाग का परार्ध कहते है। अब तक प्रथम परार्ध व्यतीत हो चुका है, द्वितीय चल रहा है। पूर्व परार्ध के आरंभ में ‘ब्राह्म’ नामक महान् कल्प हुआ था, जिसमें वर्तमान ब्रह्मा की उत्पत्ति हुई थी। उसी परार्ध के अन्तिम ‘पादम्’ कल्प में भगवान् नारायण की नाभि से सर्वलोकमय कमल प्रकट हुआ था।
वर्तमान ‘श्वेतवाराह’ कल्प द्वितीय परार्ध का प्रथम कल्प है, जिसमें भगवान् शूकर (वाराह) रूप में अवतीर्ण हुए थे। यह दो परार्ध का काल श्री नारायण का एक ‘निमेष’ मात्र माना जाता है। इस तुलना के लिए पुराणों में कालगणना का वर्णन विशेष रूप से प्रासंगिक है।
विष्णु पुराण में कालगणना — पुराणों में कालगणना
विष्णु पुराण के अन्तर्गत प्रायः श्रीमद्भागवत पुराण के समरूप विवरण ही सम्प्राप्त होता है। यथा-
काष्ठा पंचदशाख्याता निमेषा मुनिसत्तम।
काष्ठात्रिंशत्कला त्रिंशत्कला मौहूर्त्तिको विधिः।। 8।।
तावत्संख्यैरहोरात्रं मुहूर्त्तैर्मानुषं स्मृतम्।
अहोरात्राणि तावन्ति मासः पक्षद्वयात्मकः।। 9।।
तैः षड्भिरयनं वर्षं द्वेऽयने दक्षिणोत्तरे।
अयनं दक्षिणं रात्रिर्देवानामुत्तरं दिनम्।। 10।।
दिव्यैर्वर्षसहस्रैस्तु कृतत्रेतादि संज्ञितम्।
चतुर्युगं द्वादशभिस्तद्विभागं निबोध मे।। 11।।
चत्वारि त्रीणि द्वै चैकं कृतादिषु यथाक्रमम्।
दिव्याब्दानां सहस्राणि युगेष्वाहुः पुराविदः।। 12।।
तत्प्रमाणैः शतैः सन्ध्या पूर्वा तत्राभिधीयते।
सन्ध्यांश्चैव तत्तुल्यो युगस्यानन्तरो हि सः।। 13।।
सन्ध्या सन्ध्यांशयोरन्तर्यः कालो मुनिसत्तम।
युगाख्यः स तु विज्ञेयः कृतत्रेतादि संज्ञितः।। 14।।
कृतं त्रेता द्वापरश्च कलिश्चैव चतुर्युगम्।
प्रोच्यते तत्सहस्रं च ब्रह्मणो दिवसं मुने।। 15।।
ब्रह्मणो दिवसे ब्रह्मन्मनवस्तु चतुर्दश।
भवन्ति परिमाणं च तेषां कालकृतं शृंणु।। 16।।
सप्तर्षयः सुराः शक्रो मनुस्तत्सूनवो नृपाः।
एक काले हि सृज्यन्ते संह्नयन्ते च पूर्ववत्।। 17।।
चतुर्युगाणां संख्याता साधिका ह्येकसप्ततिः।
मन्वन्तरं मनोः कालः सुरादीनां च सत्तम।। 18।।
अष्टौ शत सहस्राणि दिव्यया संख्यया स्मृतम्।
द्विपंचाशत्तथान्यानि सहस्राण्यधिकानि तु।। 19।।
त्रिंशत्कोट्यस्तु सम्पूर्णाः संख्याताः संख्यया द्विज।
सप्तषष्टिस्तथान्यानि नियुतानि महामुने।। 20।।
विंशतिस्तु सहस्राणि कालोऽयमधिकं विना।
मन्वन्तरस्य संख्येयं मानुषैर्वत्सरैर्द्विज।। 21।। [5]
अर्थात् पन्द्रह निमेष की ‘काष्ठा’, तीस काष्ठा की कला, तीस कला का ‘मुहूर्त्त’, तीस मुहूर्त्त का मानवीय दिन-रात एवं तीस दिन-रात का दो पक्ष युक्त एक ‘मास’ होता है। छः मास का ‘अयन’ और ‘दक्षिणायन’ दो अयन मिलकर एक ‘वर्ष’ होता है। दक्षिणायन देवताओं की रात्रि है एवं उत्तरायण दिन।
देवताओं के बारह हजार वर्षों के सत्ययुग, त्रेता, द्वापर और कलियुग नामक चार युग होते हैं। जिनका परिणाम क्रमशः चार, तीन, दो तथा एक हजार दिव्य वर्षों का बतलाया गया है। प्रत्येक युग के पूर्व उतने ही सौ वर्षों की सन्ध्या एवं युग के पश्चात् उतने ही परिमाण वाले सन्ध्यांश होते हैं।
इन सन्ध्या और सन्ध्यांशों के मध्यवर्ती काल को ही सत्य-त्रेता संज्ञक युग जानना चाहिये। ये चारों युग मिलकर चतुर्युग कहलाते हैं, ऐसे हजार चतुर्युग का ब्रह्मा का एक दिन होता है। ब्रह्मा के एक दिन के अन्तर्गत चौदह मनु अपना काल व्यतीत करते हैं।
सप्तर्षि, देवता, इन्द्र, मनु तथा मनुवंशी राजा प्रत्येक मनु के काल में रचे एवं संहार किए जाते हैं। इकहत्तर चतुर्युग से कुछ अधिक (6/15 चतुर्युगी) काल का एक मन्वन्तर (एक मनु का समय) होता है। इस प्रकार दिव्य वर्ष-गणनानुसार एक मन्वन्तर के अन्तर्गत आठ लाख बावन हजार वर्ष तथा मानवीय वर्ष-गणनानुसार यह परिमाण पूरे तीस करोड़ सड़सठ लाख बीस हजार वर्ष बताया जाता है। इस प्रकार पुराणों में कालगणना का अध्ययन काल-बोध के विभिन्न स्तरों को स्पष्ट करता है।
कूर्म पुराण में कालगणना
कूर्मपुराण का वर्णन ‘काष्ठा’ से चतुर्युग परिमाण पर्यन्त विष्णुपुराण के अनुरूप ही है। [6] तदनन्तर चारों युगों की संध्या तथा सन्ध्यांशों के सन्दर्भ में अधिक स्पष्ट विवरण उपलब्ध होता है। यथा-
चत्वार्याहुः सहस्राणि वर्षाणां तत्कृतं युगम्।
तस्य तावच्छती संध्या संध्यांशश्च कृतस्य तु।। 8।।
त्रिशती द्विशती संध्या तथा चैकशती क्रमात्।
अंशकं षट्शतं तस्मात् कृतसंध्यांशकं विना।। 9।। [7]
अर्थात् चार हजार दिव्य वर्षों का सत्ययुग और उतने ही सौ वर्षों (अर्थात् चार सौ वर्षों) की संध्या तथा सन्ध्यांश होते हैं। सत्ययुग के संध्या-सन्ध्यांश को छोड़कर क्रमशः तीन सौ, दो सौ एवं एक सौ- इस प्रकार कुल दिव्य छः सौ वर्षों के त्रेता, द्वापर तथा कलियुग के सन्ध्या एवं इतने ही परिणाम के सन्ध्यांश होते हैं।[8]
आगे मन्वन्तर और कल्प के वर्णन भी अन्य पुराणों के समतुल्य हैं। ब्रह्म की परमायु के परिप्रेक्ष्य में यह उल्लेख द्रष्टव्य है-
त्रीणि कल्पशतानि स्युः तथा षष्टिद्विजोत्तमाः।
ब्रह्मणः कथित वर्श पराख्यं तच्छतं विदुः।। 16।। [9]
अर्थात् तीन सौ साठ कल्पों को ब्रह्मा का एक वर्ष एवं उसके सौ गुने (अर्थात् 36000 कल्पों) काल को ‘पर’ संज्ञा प्रदान की गई है।
मत्स्य पुराण में कालगणना
मत्स्य पुराण के अन्तर्गत ‘काष्ठा’ से अयन तक का काल-विवेचन पूर्व पुराणों के अनुसार ही है। [10] तत्पश्चात् पितरों, सप्तर्षि, देवताओं तथा ध्रुव के कालमान का उल्लेख हुआ है। यथा-
पित्र्ये रात्र्यहनी मासः प्रविभागस्तयोः पुनः।
कृष्णपक्षस्त्वह स्तेषां शुक्लः स्वप्नाय शर्वरी।। 6।।
त्रिंशद् ये मानुषा मासाः पैत्रो मासः स उच्यते।
शतानि त्रीणि मासानां षष्ट्या चाभ्यधिकानि तु।
पैत्रः संवत्सरो ह्येष मानुषेण विभाव्यते।। 7।।
मानुषेणैव मानेन वर्षाणां यच्छतं भवेत्।
पितृणां तानि वर्षाणि संख्यातानि तु त्रीणि वै।
दश च द्वयधिका मासाः पितृसंख्येह कीर्तिताः।। 8।।
त्रीणि वर्ष शतान्येवं षष्टिर्वर्षास्तथैव च।
दिव्यः संवत्सरो ह्येष मानुषेण प्रकीर्तितः।। 12।।
त्रीणि वर्ष सहस्त्राणि मानुषेण प्रमाणतः।
त्रिंशदन्यानि वर्षाणि स्मृतः सप्तर्षिवत्सरः।। 13।।
नवयानि सहस्त्राणि वर्षाणां मानुषाणि च।
वर्षाणि नवतिश्चैव ध्रुवसंवत्सरः स्मृतः।। 14।। [11]
अर्थात् पितरों के रात-दिन का एक मानवीय मास होता है। कृष्णपक्ष पितरों का अर्थात् पितरों का दिन तथा शुक्लपक्ष रात्रि है। मनुष्यों के तीस मास का पितरों का एक मास और तीन सौ साठ मानव-मासों का पितरों का एक वर्ष होता है। इस प्रकार सौ मानव-वर्ष पितरों के तीन वर्ष से कुछ अधिक (चार मास) माने गये हैं।
मानवीय गणना के अनुसार तीन सौ साठ वर्षों का एक दिव्य (देव) वर्ष, तीन हजार तीस वर्षों का एक ‘सप्तर्षि-वर्ष’ तथा नौ हजार नब्बे वर्षों का एक ‘ध्रुव-संवत्सर’ होता है। यहाँ पुराणों में कालगणना की इकाइयों और उनके पारस्परिक सम्बन्धों पर विचार किया गया है।
तदुपरान्त मानव – वर्षो के अन्तर्गत चतुर्युग-परिमाण तथा मन्वन्तर का काल वर्णित किया गया है। यथा-
नियुतानि दश द्वे च पंच चैवात्र संख्यया।
अष्टाविंशत्सहस्त्राणि कृतं युगमथोच्यते।। 24।।
प्रयुतं तु तथा पूर्णं द्वे चान्ये नियुते पुनः।
षण्णवतिसहस्त्राणि संख्यातानि च संख्यया।
त्रेतायुगस्य संख्यैषा मानुषेण तु संज्ञिता।। 25।।
अष्टौ शतसहस्त्राणि वर्षाणां मानुषाणि तु।
चतुःषष्टिसहस्त्राणि वर्षाणां द्वापरं युगम्।। 26।।
चत्वारि नियुतानि स्युर्वर्षाणि तु कलिर्युगम्।
द्वात्रिंशच्च तथान्यानि सहस्त्राणि तु संख्यया।
एतत् कलियुगं प्रोक्तं मानुषेण प्रमाणतः।। 27।।
मनवन्तरस्य संख्या तु मानुषेण निबोधत।
एकत्रिंशत् तथा कोट्यः संख्याताः संख्यया द्विजैः।। 30।।
तथा शतसहस्त्राणि दश चान्यानि भागशः।
सहस्त्राणि तु द्वात्रिंशच्छतान्यष्टाधिकानि च।। 31।।
आशीतिश्चैव वर्षाणि मासाश्चैवाधिकास्तु षट्।
मन्वन्तरस्य संख्यैषा मानुषेण प्रकीर्तिता।। 32।। [12]
अर्थात् मानवीय गणना के अनुसार सत्ययुग सत्रह लाख अट्ठाईस हजार वर्ष, त्रेतायुग बारह लाख छियानवे हजार वर्ष, द्वापरयुग आठ लाख चौंसठ हजार वर्ष एवं कलियुग चार लाख बत्तीस हजार वर्ष का निर्दिष्ट किया गया है। एक मन्वन्तर की वर्ष-संख्या एकतीस करोड़ दस लाख बत्तीस हजार आठ सौ अस्सी वर्ष छः मास बतलाई जाती है। इस विवरण से पुराणों में कालगणना की पारम्परिक संरचना समझने में सहायता मिलती है।
अन्य पुराणों में कालगणना के समान विवरण
कालमान के संदर्भ में पद्मपुराण, [13] मार्कण्डेय पुराण, [14] नृसिंह पुराण, [15] तथा हरिवंश पुराण [16] के उल्लेख उपर्युक्त वर्णन के समान ही हैं। इनके विवरणों की सम्पुष्टि महाभारत [17], मनुस्मृति [18] और सूर्य सिद्धान्त [19] आदि ग्रन्थों से अनेकशः होती है। इस क्रम में पुराणों में कालगणना का विवेचन क्रमबद्ध रूप से प्रस्तुत होता है।
वर्तमान कालखण्ड का निर्धारण
पुराणोक्त कालमान के विशद विवेचन के अनन्तर कालगणना के अन्तर्गत वर्तमान कालखण्ड के निर्धारण के परिप्रेक्ष्य में भी विविध पुराणों में स्पष्ट कथन समुपलब्ध होते हैं।
विष्णु पुराण का कथन
विष्णु पुराण में कहा गया है-
विवस्वतस्सुतो विप्र श्राद्धदेवो महाद्युतिः।
मनुससंवर्तते धीमान् साम्प्रतं सप्तमेऽन्तरे।। 30।।
साम्प्रतं महीतलेऽष्टाविंशतितममनोश्चतुर्युगमतीतप्रायं वर्तते।। 76।।
आसन्नो हि कलिः।। 77।। [20]
अर्थात् इस समय सातवें मन्वन्तर में सूर्य-पुत्र महातेजस्वी और बुद्धिमान श्राद्धदेव मनु हैं। इस समय पृथ्वी पर इस (सातवें) मनु का अट्ठाईसवाँ चतुर्युग समाप्तप्रायः है तथा (अट्ठाईसवें द्वापर के उपरान्त अट्ठाईसवाँ) कलियुग प्रारंभ होने वाला है। इस मान्यता के सन्दर्भ में पुराणों में कालगणना का उल्लेख ध्यान देने योग्य है।
कूर्म पुराण का कथन
कूर्म पुराण में कहा गया है-
विवस्वत् सुतो विप्राः श्राद्धदेवो महाद्युतिः।
मनु स वर्तते साम्प्रतं सप्तमेऽन्तरे।। 23।।
अष्टाविंशे पुनः प्राप्ते ह्यस्मिन् वै द्वापरे द्विजाः।
पराशरसुतो व्यासः कृष्णद्वैपायनोऽभवत्।। 9।। [21]
अर्थात् विवस्वान् के पुत्र श्राद्धदेव इस समय सातवें मन्वन्तर के मनु हैं। (इसी से यह मन्वन्तर ‘‘वैवस्वत’’ नाम से विख्यात है।) इस अट्ठाईसवें द्वापर युग में पराशर के पुत्र कृष्णद्वैपायन ‘‘व्यास’’ हुए।
हरिवंश पुराण का कथन — पुराणों में कालगणना
हरिवंशपुराणमें कहा गया है-
मनोर्वैवस्वतस्यैते वर्तन्ते साम्प्रतेऽन्तरे।
इक्ष्वाकुप्रमुखाश्चैव दश पुत्रा महात्मनः।। 37।।
चतुर्विशे युगे चापि विश्वामित्रपुरस्सरः।
राज्ञो दशरथस्याथ पुत्रः पद्मायतेक्षणः।। 121।।
नवमे द्वापरे विष्णुरष्टाविंशे पुराभवत्।
वेदव्यासस्तथा जज्ञे जातूकर्ण्यपुरस्सरः।। 161।। [22]
अर्थात् इस वर्तमान वैवस्वत मन्वन्तर में महात्मा वैवस्वत (श्राद्धदेव) मनु के इक्ष्वाकु आदि दस पुत्र हैं। चौबीसवें त्रेतायुग में श्रीविष्णु राजा दशरथ के पुत्र कमलनयन श्रीराम के रूप में प्रकट हुए तथा कुछ काल तक विश्वामित्र के अनुयायी रहे।
अट्ठाईसवें द्वापर में श्रीविष्णु का यह श्रीकृष्ण नामक नवम् अवतार हुआ था। इससे कुछ पूर्व ही उनका जातुकर्ण्य के साथ प्रकट होने वाला ‘वेदव्यास’ नामक अवतार भी हो गया था। इस प्रसंग से पुराणों में कालगणना और युग-चक्र की अवधारणा का सम्बन्ध स्पष्ट होता है।
कलियुग के आरम्भ का पारम्परिक निर्धारण — पुराणों में कालगणना
उपर्युक्त विवेचन से यह तथ्य पूर्णतः स्पष्ट हो जाता है कि वर्तमान में ब्रह्मा के द्वितीय परार्ध के प्रथम श्वेतवाराह कल्प के सातवें वैवस्वत मन्वन्तर का अट्ठाईसवाँ कलियुग चल रहा है। इस निष्कर्ष की पुष्टि मत्स्य पुराण [23], पद्मपुराण, [24] ब्रह्मपुराण, [25] नृसिंह पुराण, [26] मार्कण्डेय पुराण [27], एवं भविष्य पुराण [28], से भी अनेकशः होती है।
विष्णु पुराण से यह भी प्रमाणित होता है कि श्रीकृष्ण के धरा – धाम त्याग के समय से ही कलियुग प्रारंभ हो गया। यथा- इसलिए पुराणों में कालगणना के विभिन्न विवरणों को साथ रखकर पढ़ना उपयोगी है।
यस्मिन्दिने हरिर्यातो दिवं सन्त्यज्य मेदिनीम्।
तस्मिन्नेवावतीर्णोऽयं कालकायो बली कलिः।। 8।। [29]
इसका समानार्थी उल्लेख वायुपुराण के अन्तर्गत भी प्राप्त होता है।
यस्मिन् कृष्णो दिवं यातस्तस्मिन्नेव तदा दिने।
प्रतिपन्नः कलियुगस्तस्य संख्यां निबोधत।। 428।। [30]
मत्स्यपुराण का भी यही कथन है-
यस्मिन् कृष्णो दिवं यातस्तमिन्नेव तदाहनि।। 49।।
प्रतिपन्नं कलियुगं प्रमाणं तस्य में शृंणु। [31]
इस प्रकार वर्तमान कालखण्ड सातवें मन्वन्तर का अट्ठाईसवाँ कलियुग सुनिश्चित हो जाने, जिसकी पुष्टि नित्य-संकल्प [32] तथा प्राचीन भारत के ज्योतिर्विज्ञान ग्रन्थ ‘सूर्य-सिद्धान्त’ से भी होती है [33], के उपरान्त इस कलियुग के अब तक व्यतीत वर्षों का निर्धारण ही शेष रहता है। भारतीय परम्परा के अनुसार इस समय कलियुग संवत् 5106 प्रवर्तमान् है [34]
अतः इसका 5106-2005 = 3101 ईसवी पूर्व आरंभ होना विदित होता है। इस पारम्परिक मान्यता की विविध पुरातात्त्विक एवं साहित्यिक साक्ष्यों द्वारा सम्पुष्टि होती है। इस विवेचन में पुराणों में कालगणना की पारम्परिक व्याख्या को प्रमुखता दी गई है।
कलियुग संवत् के निर्धारण के साक्ष्य — पुराणों में कालगणना
(1) आर्यभट्ट द्वारा ‘‘काल क्रिया पाद’’ ग्रन्थ के अन्तर्गत निर्दिष्ट किया गया है कि जब चतुर्युग के तीन पाद (सत्ययुग, त्रेता तथा द्वापर) एवं 3600 वर्ष व्यतीत हो चुके थे, तब वे 23 वर्ष के थे। इस आधार पर पुराणों में कालगणना के वर्णनों का तुलनात्मक अध्ययन किया जा सकता है।
षष्टचाब्दानों षष्टिर्यदा व्यतीताः त्रयश्च युगपादाः।
त्र्यधिका विंशतिरब्दास्तदेह ममजन्मनोतीताः।। 10।। [35]
आर्यभट्ट का जन्म 476 ई. में मान्य है। अर्थात् 476$23 = 499 ई. में कलियुग के 3600 वर्ष व्यतीत हो चुके थे। इस प्रकार 3600-499 = 3101 ई.पू. में कलियुग का प्रारंभ होना प्रमाणित होता है।
चोल अभिलेखों में कलियुग संवत् — पुराणों में कालगणना
2. 943 ई. के चोल वृत्तान्त लेखन के अन्तर्गत कलियुग संवत् 4044 के निर्देश के साथ अनेक शिलालेखों में उल्लिखित कलियुग संवत् का विवेचन किया गया है। [36] इस प्रकार 4044-943 त्= 3101 ई.पू. में कलियुग का समारम्भ प्रकट होता है। इस विषय पर आगे विचार करते समय पुराणों में कालगणना का संदर्भ महत्त्वपूर्ण बना रहता है।
सिद्धान्त-शिरोमणि में कालगणना — पुराणों में कालगणना
3. भास्कराचार्यकृत ज्योतिष ग्रंथ ‘‘सिद्धान्त-शिरोमणि’’ के अन्तर्गत निर्दिष्ट सूत्र’’ नन्दाद्रीन्दुगुणा’’ [37] (जो कि कलि संवत् के अन्तर्गत शक संवत् के आरंभ को निर्देशित करता है) से भी उपर्युक्त तथ्य सिद्ध होते हैं। यथा:- नन्द = 9, अद्रि = 7, इन्दु = 1, गुण = 3, अर्थात् 9713, ‘‘अंकानां वामतो गतिः’’ सूत्र के अनुसार 3179 का अंक प्राप्त होता है। चूंकि शक संवत् 78 ई. में आरम्भ हुआ था, इसलिये 3179-78 = 3101 ई.पू. में कलियुग संवत् का प्रणयन पुनः सिद्ध होता है। इस प्रकार पुराणों में कालगणना की चर्चा केवल छोटी इकाइयों तक सीमित नहीं रहती।
कालगणना का संक्षिप्त सारणीबद्ध विवेचन — पुराणों में कालगणना
निष्कर्षतः 2004 ई. तक कलियुग के 3101 + 2004 = 5105 वर्ष व्यतीत होना अर्थात् कलियुग संवत् 5106 प्रवर्तमान् होना प्रमाणित होता है। इस प्रकार पुराणोक्त कालमान और कालगणना के माध्यम से वर्तमान ब्रह्मा की वय के इक्यावनवें वर्ष के प्रथम दिवस रूपी श्वेतवाराह कल्प के अन्तर्गत सातवें वैवस्वत मन्वन्तर की अट्ठाईसवीं चतुर्युगी के कलियुग के प्रवर्तमान 5106 वें वर्ष का निर्धारण सुनिश्चित रूप से सम्पन्न हो गया।
इस गणना को अधिक सरल एवं सुबोध रूप से विवेचित करने हेतु अग्रांकित सारणी [38] का व्यवहार अधिक समीचीन प्रतीत होता है:- इस विवरण में पुराणों में कालगणना के साथ मन्वन्तर और कल्प की अवधारणाएँ भी जुड़ी हैं।
(क.) काल-परिमाण — पुराणों में कालगणना
| समय-मान की इकाई | = | आधुनिक समय-मान |
| 1 परमाणु | 1 परमाणु को पार करने में सूर्य किरण को लगने वाला समय | 0.000013 सैकंड |
| 2 परमाणु | 1 अणु को पार करने में सूर्यकिरण को लगने वाला समय | 0.000026 सैकंड |
| 3 अणु | 1 त्रसरेणु को पार करने में सूर्य किरण को लगने वाला समय | 0.000079 सैकंड |
| 3 त्रसरेणु | 1 त्रुटि = तीन त्रसरेणु को पार करने में सूर्य किरण को लगने वाला समय | 0.000237 सैकंड |
| 100 त्रुटि | 1 वेध | 0.0237 सैकंड |
| 3 वेध | 1 लव | 0.071 सैकंड |
| 3 लव | 1 निमेष | 0.213 सैकंड |
| 15 निमेष | 1 काष्ठा | 3.20 सैकंड (3 1/5 सैकंड) |
| 30 काष्ठा | 1 कला | 1 मिनट 36 सैकंड |
| 15 कला | 1 घड़ी | 24 मिनट |
| 2 घड़ी | 1 मुहूर्त्त | 48 मिनट |
| 30 मुहूर्त्त | 1 दिन-रात | 24 घण्टे |
| 15 दिन-रात | 1 पक्ष | इतनी ही |
| 2 पक्ष | 1 मास | इतनी ही |
| 6 मास | 1 अयन | इतनी ही |
| 2 अयन | 1 वर्ष | इतनी ही |
| 30 मास | 1 पितृ-मास | इतनी ही |
| 360 मास | 1 पितृ-वर्ष | इतनी ही |
| 360 वर्ष | 1 दिव्य वर्ष | इतनी ही |
(ख.) युग, मन्वन्तर और कल्प का काल-प्रमाण — पुराणों में कालगणना
| इकाई | काल मान | |
| दिव्य वर्षों में | मानव वर्षों में (दिव्य वर्ष× 360) | |
| 1. सत्य युग | 4,000 | 14,40,000 |
| संध्या | 400 | 1,44,000 |
| सन्ध्यांश | 400 | 1,44,000 |
| योग | 4,800 | 17,28,000 |
| 2. त्रेता युग | 3,000 | 10,80,000 |
| संध्या | 300 | 7,20,000 |
| सन्ध्यांश | 300 | 72,000 |
| योग | 3,600 | 12,96,000 |
| 3. द्वापर युग | 2,000 | 7,20,000 |
| संध्या | 200 | 72,000 |
| सन्ध्यांश | 200 | 72,000 |
| योग | 2,400 | 8,64,000 |
| 4. कलियुग | 1,000 | 3,60,000 |
| संध्या | 100 | 36,000 |
| सन्ध्यांश | 100 | 36,000 |
| योग | 1,200 | 4,32,000 |
| चतुर्युग अथवा महायुग = (1+2+3+4) | 12,000 | 43,20,000 |
| 71 चतुर्युग = 1 मन्वन्तर (मनु तथा इन्द्र का काल) | 8,52,000 | 30,67,20,000 |
| मन्वन्तर आरंभ की संधि का काल [39] | 4,800 | 17,28,000 |
| चौदह मन्वन्तरों की संधियों का कुल काल | 67,200 | 2,41,92,000 |
| कल्पान्त की सन्धि का काल | 4,800 | 17,28,000 |
| समस्त चौदह मन्वन्तरों का काल | 1,19,28,000 | 4,29,40,80,000 |
| समस्त पन्द्रह सन्धियों का काल | 72,000 | 2,59,20,000 |
| कल्प का कालमान (ब्रह्मा का दिन) | 1,20,00,000 | 4,32,00,00,000 |
| ब्रह्मा की रात्रि | 1,20,00,000 | 4,32,00,00,000 |
| ब्रह्मा की अहोरात्र (दिन + रात) | 2,40,00,000 | 8,64,00,00,000 |
| ब्रह्म-मास (अहोरात्र × 30) | 72,00,00,000 | 2,59,20,00,00,000 |
| ब्रह्म-वर्ष (मास × 12) | 8,64,00,00,000 | 31,10,40,00,00,000 |
| पर ‘‘ब्रह्मा की परमायु (वर्ष × 100) | 8,64,00,00,00,000 | 31,10,40,00,00,00,000 |
सृष्टि के व्यतीत और शेष काल की गणना — पुराणों में कालगणना
| सृष्टि का अब तक का व्यतीतकाल = छः मन्वन्तर + 7वें मन्वन्तर के 27 चतुर्युग + अट्ठाईसवीं चतुर्युगी के तीन युग + कलियुग के 5105 वर्ष = श्वेतवाराह कल्प के सातवें वैवस्वत मन्वन्तर की अट्ठाईसवीं चतुर्युगी के कलियुग के व्यतीत 5105 वर्ष के बाद मुक्तकाल | छः मन्वतर के वर्ष | 1,84,03,20,000 |
| इनकी सात संधियों के वर्ष | 1,20,96,000 | |
| सातवें मन्वन्तर की सत्ताईस चतुर्युगीयों के वर्ष | 11,66,40,000 | |
| अट्ठाईसवीं चतुर्युगी के तीन युगों के वर्ष | 38,88,000 | |
| अट्ठाईसवें कलियुग के मुक्त वर्ष | 5,105 |
| वर्तमान श्वेत वराह कल्प के व्यतीत वर्षों का योग | (कल्पाब्द) | 1,97,29,49,105 |
| सृष्टि-निर्माण में प्रयुक्त आरम्भिक वर्ष [40] | (-) | 1,70,64,000 |
| कल्पाशब्द-सृष्टि निर्माण में प्रयुक्त वर्ष | (सृष्टि संवत्) | 1,95,58,85,105 |
| सृष्टि का अब से शेष काल = सातवें मन्वन्तर की 28 वीं चतुर्युगी के कलियुग के शेष वर्ष + शेष 43 चतुर्युगों के वर्ष + शेष सात मन्वतरों के वर्ष | भविष्य के सात मन्वंतरों के वर्ष | 2,14,70,40,000 |
| उनकी आठ सन्धियों के वर्ष | 1,38,24,000 | |
| सातवें मन्वन्तर की तैतालीस चतुर्युगियों के वर्ष | 18,57,60,000 | |
| अट्ठाईसवें कलियुग के शेष वर्ष | 4,26,895 | |
| वर्तमान श्वेतवाराह कलप के शेष वर्षों का योग | 2,34,70,50,895 |
निष्कर्षतः सम्प्रति ब्रह्मा के द्वितीय परार्ध के प्रथम कल्प श्वेतवाराह के सातवें वैवस्वत मन्वन्तर के अट्ठाईसवें चतुर्युग का कलियुग प्रवर्तमान है, जिसके 5105 वर्ष व्यतीत हो चुके हैं एवं 4,26,895 वर्ष शेष हैं। समग्र रूप से पुराणों में कालगणना इसी प्रकार की गई है।
भारतीय परम्परा के प्रमुख संवत् — पुराणों में कालगणना
उपर्युक्त पुराणोक्त कालमान तथा काल-गणना के आधार पर भारतीय पारम्परिक इतिहास के प्रमुख संवत् सहजता से निर्धारित किये जा सकते हैं।
| 1. | ब्रह्म-संवत् | 15,55,21,97,29,49,106 |
| (ब्रह्मा की आयु के शेष वर्ष) | 15,55,18,02,70,50,894 | |
| 2. | कल्पाब्द | 1,97,29,49,106 |
| (कल्प के शेष वर्ष) | 2,34,70,50,894 | |
| 3. | सृष्टि-संवत् | 1,95,58,85,106 |
| 4. | मन्वन्तराब्द | 12,05,33,106 |
| 5. | महायुगाब्द | 38,93,106 |
| 6. | युगाब्द | 5,106 |
संवत्-गणना सम्बन्धी टिप्पणी — पुराणों में कालगणना
उपर्युक्त संवतों के अन्तर्गत पूर्व वर्णित काल-गणना के बीते वर्षों में प्रवर्तमान वर्ष को जोड़कर एक वर्ष बढ़ाते हुए साम्प्रतिक वर्ष-संवत् की गणना की गई है।
उपसंहार — पुराणों में कालगणना
सारांशतंः पुराणों के अन्तर्गत विवेचित भारतीय कालमान तथा कालगणना यहाँ के मनीषियों एवं तत्त्ववेत्ताओं की विलक्षण अन्तर्दृष्टि और त्रिकालज्ञता की परिचायक है। जिसमें समय-मापन की लघुत्तम इकाई ‘परमाणु’ से ‘पर’ (ब्रह्मा की परमायु) सदृश महत्तम इकाई के परिगणन को सम्भव बनाया गया है।
उपर्युक्त कालगणना जहाँ प्रथम दृष्ट्या अत्यन्त जटिल तथा मानवीय बुद्धि हेतु दुरूह और सीमातीत प्रतीत होती है, वहीं इसका आस्थापरक परिष्कृत स्वरूप सर्वथा सहज, सुबोध एवं स्वाभाविक लगता है। अन्य मत-मतान्तरों के काल-विषयक निर्देशों से परे पुराणोक्त भारतीय कालमान तथा कालगणना पूर्णतया वैज्ञानिक सिद्धान्तों पर आधारित है, जिसके निष्कर्षों की अद्यतन वैज्ञानिक अनुसंधानों द्वारा अनेकशः सम्पुष्टि होती जा रही है।
वर्तमान में इसकी सर्वाधिक विशिष्ट उपादेयता सीमातीत काल के समक्ष पूर्वाग्रह परक दृष्टिकोण की नगण्यता को सिद्ध कर निष्पक्ष एवं यथार्थ इतिहास के विवेचन को संभव बनाना है। इस सारणी के माध्यम से पुराणों में कालगणना के मानों को व्यवस्थित रूप से देखा जा सकता है।
पुराणों में कालगणना पर विस्तृत अध्ययन हेतु-
(2.) डॉ. मोहनलाल गुप्ता द्वारा लिखित पुस्तक भारतीय ज्योतिष एवं कालगणना का इतिहास
सन्दर्भ-सूची — पुराणों में कालगणना
[1] द्रष्टव्य प्रवर्तमान् वर्ष 2005 ई. का पंचांग, वैद्यनाथ कालदर्शक, नीमच।
[2] हिन्दू-संस्कृति अंक (कल्याण-विशेषांक) पृ. 342, वर्ष 24, जनवरी 1950 ई. गीताप्रेस, गोरखपुर।
[3] खेडवाल, देवकीनन्दन-भारतीय कालगणना, प्राक्कथन, पृ. 5, फतेहपुर, 1951 ई.
[4] श्रीमद्भागवत महापुराण: प्रथम खण्ड, तृतीय स्कन्ध, अध्याय। श्लोक सं. 5-8, 10-12,
[5] 18-20, 22-24, 32-37, पृ. 246-249, गीता प्रेस, गोरखपुर, 1983 ई.
[6] विष्णु पुराण: प्रथम अंश, अध्याय 3, श्लोक 8-21, पृ. 12-13, गीताप्रेस, गोरखपुर, 1984 ई.
[7] कूर्म पुराणः पूर्व विभाग अध्याय 5, श्लोक 3-7, पृ. 26, गीताप्रेस, गोरखपुर, 1997 ई.
[8] उपरिवत्, श्लोक 8-9
[9] वही, श्लोक 10-15, तुलनीयः श्रीमद्भगवद्गीता 8/17
[10] वही, श्लोक 16
[11] मत्स्यपुराणः उत्तरार्द्ध, अध्याय 142, श्लोक 4-10, पृ. 515-516, गीता प्रेस, गोरखपुर 1985 ई.
[12] उपरिवत्, श्लोक 6-8, 12-14; तुलनीय-तैत्तिरीय ब्राह्मण 3/9/22/1 (एकं वा एतद् देवानामहर्यत् संवत्सरः।)
[13] वही, श्लोक 24-27, 30-32
[14] पद्मपुराणः सृष्टि खण्ड, अध्याय 3, पृ. 6-7, गीता प्रेस, गोरखपुर 1986 ई.
[15] मार्कण्डेय पुराण: अध्याय 46, पृ. 141-42 गीताप्रेस, गोरखपुर, 1993 ई.
[16] नृसिंह पुराण: अध्याय 2, श्लोक सं. 3-25, पृ. 8-9 गीताप्रेस, गोरखपुर, 1971 ई.
[17] हरिवंश पुराणः हरिवंश पर्व, अध्याय 8, श्लोक 3-29, 33-34, पृ. 33-35, गीताप्रेस, गोरखपुर, 1987 ई.
[18] महाभारतः द्वितीय खण्ड, वनपर्व, अध्याय 188, श्लोक 22-28, पृ. 1482-1483, गीताप्रेस, गोरखपुर 1987 ई.
[19] महाभारतः पंचम खण्ड, शान्तिपर्व अध्याय 231 श्लोक 12-21, 29-31, पृ. 5035-5037 गीताप्रेस, गोरखपुर 1987 ई.
[20] मनुस्मृतिः प्रथम अध्याय, श्लोक 64-72, 79 पृ. 16-18, 20 पुस्तक मंदिर, मथुरा 1966 ई.
[21] सूर्य सिद्धान्तः 1/13-16, 18-23 वां पद्य, उद्धृत-हिन्दू संस्कृति अंक, पृ. 340
[22] विष्णु पुराणः तृतीय अंश, अध्याय 1, श्लोक 30, पृ. 199, चतुर्थ अंश, अध्याय 1, श्लोक 76-77, पृ. 274
[23] कूर्म पुराणः पूर्व विभाग, अध्याय 49, श्लोक 23, पृ. 219 अध्याय 50, श्लोक 9, पृ. 222
[24] हरिवंश पुराण हरिवंश पर्व, अध्याय 7, श्लोक 37, पृ. 29, अध्याय 41, श्लोक 121, 161 पृ. 152, 155
[25] मत्स्य पुराणः पूर्वार्ध, अध्याय 9, श्लोक 26, पृ. 29, गीताप्रेस, गोरखपुर 1984 ई.
[26] पद्मपुराणः सृष्टि खंड, अध्याय 8, पृ. 19
[27] ब्रह्म पुराणः अध्याय 3, पृ. 283-84
[28] नृसिंह पुराणः अध्याय 23, श्लोक 14, पृ. 67
[29] मार्कण्डेय पुराणः अध्याय 39-40, पृ. 180-82
[30] भविष्य पुराणः ब्राह्मपर्व, अध्याय 1-2, पृ. 21, प्रतिसर्ग पर्व, प्रथम खण्ड, अध्याय 160, पृ. 239
[31] गीताप्रेस, गोरखपुर, 1992 ई.
[32] विष्णु पुराण: चतुर्थ अंश, अध्याय 24, श्लोक 113, पृ. 113, पृ. 356, पंचम अंश, अध्याय 38, श्लोक 8, पृ. 485
[33] वायु पुराणः अध्याय 99, श्लोक 428-29
[34] मत्स्य पुराणः उत्तरार्द्ध, अध्याय 273, श्लोक 49-50, पृ. 1054
[35] ‘‘ ऊँ तत्सदद्य ब्रह्मणोऽह्नि द्वितीय परार्धे श्वेतवाराहकल्पे वैवस्वत मन्वन्तरेऽष्टाविंशतितमे कलियुगे कलिप्रथमचरणे बौद्धावतारे भूर्लोके जम्बूद्वीपे भरतखण्डे भारतवर्षे….क्षेत्रे…नगरे….ग्रामे…संवत्सरे….मासे….पक्षे….तिथौ…..वासरे…गोत्रः शर्मा/वर्मा/गुप्तोऽहं …..(काल) सर्वकर्मसु शुद्धयर्थं श्रुतिस्मृतिपुराणोक्तफलप्राप्त्यर्थ श्री भगवत्प्रीत्यर्थं च….कर्म करिष्ये।’’ उद्धृतः-नित्य-कर्म-पूजा प्रकाश, पृ. 19-20, गीताप्रेस, गोरखपुर, 2003 ई. इस अन्तिम विवेचन में पुराणों में कालगणना के महत्त्व को संक्षेप में रेखांकित किया गया है.
[36] सूर्य सिद्धान्तः 1/13-15, 19-20 वाँ पद्य
[37] द्रष्टव्यः वैद्यनाथ कालदर्शक, 2005 ई. नीमच कैण्ट (मध्यप्रदेश)
[38] सिंह, ओंकार नारायण-प्राचीन भारतीय इतिहास की कतिपय विसंगतियाँ, पृ. 24 (राजस्थान प्राच्यविद्या प्रतिष्ठान की कार्ययोजना के अन्तर्गत लिखित) भरतपुर, 1998 ई.
[39] जर्नल ऑव दि रॉयल एशियाटिक सोसाइटी, लंदन 1911 ई., पृ. 689-94
[40] काणे, पांडुरंग वामन-धर्मशास्त्र का इतिहास, भाग-2, पृ. 987
