आत्म-साक्षात्कार (Self-Realization) का सरल और गहरा अर्थ है—स्वयं के वास्तविक स्वरूप को जान लेना। सामान्यतः हम खुद को अपने नाम, शरीर, सामाजिक पद, विचारों या भावनाओं से पहचानते हैं। लेकिन भारतीय दर्शन और वेदांत के अनुसार, यह हमारी बाहरी पहचान है। जब कोई व्यक्ति इस बाहरी आवरण से परे जाकर अपने भीतर छिपी परम चेतना या ‘आत्मा’ का साक्षात् अनुभव कर लेता है, तो उसे ही आत्म-साक्षात्कार कहा जाता है।
सम्पूर्ण वेदांत दर्शन अन्य प्रकार का ज्ञान प्राप्त करने के स्थान पर आत्म-साक्षात्कार को ही अधिक महत्व देता है।
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प्रस्तावना
छान्दोग्य उपनिषद् के सप्तम अध्याय में देवर्षि नारद और महर्षि सनत्कुमार के बीच, आत्म-साक्षात्कार के माध्यम से परम शांति की अवस्था प्राप्त करने के सम्बन्ध में संवाद दिया गया है। जिस प्रकार अन्य समस्त उपनिषद संवाद शैली में लिखे गए हैं, उसी प्रकार छान्दोग्य उपनिषद् भी संवाद शैली में लिखा गया अत्यंत महत्वपूर्ण उपनिषद् है।
इस संवाद का निष्कर्ष यह है कि केवल सांसरिक विद्याएँ, वेद-वेदांग, कलाएँ और भौतिक विज्ञान मनुष्य को उद्भट विद्वान (Scholar) तो बना सकते हैं, परन्तु वे मन को पूर्ण शांति और शाश्वत आनंद प्रदान नहीं कर सकते। भौतिक और लौकिक ज्ञान ‘अल्प’ है, और जो सीमित है, उसमें वास्तविक या स्थायी सुख नहीं है; वह केवल क्षणिक संतोष दे सकता है। आत्म-साक्षात्कार के माध्यम से ही परम शांति प्राप्त की जा सकती है।
देवर्षि नारद की उत्कण्ठा
देवर्षि नारद ने समस्त मर्त्यलोक (Mortal world) और स्वर्गलोक (Heaven) में परिभ्रमण कर महत् ज्ञान प्राप्त किया था। फिर भी उनकी ज्ञान-जिज्ञासा (Thirst for knowledge) शान्त नहीं हुई। वे परम तत्त्व (Ultimate Reality) को जानने के लिए बेचैन रहते थे। वृहद्ज्ञान के होते हुए भी, वे अपने में किसी महत्त्वपूर्ण वस्तु की कमी का निरन्तर अनुभव करते थे। उनकी यह धारणा थी कि यद्यपि उन्होंने विपुल ज्ञान प्राप्त किया है तथापि अधिकांश जानना अभी भी शेष ही है।
देवर्षि नारद का महर्षि सनत्कुमार के पास जाना
देवर्षि नारद ने महर्षि सनत्कुमार की बड़ी प्रशंसा सुनी थी कि उन्होंने बाल्यावस्था (Childhood) में ही ब्रह्मज्ञान (Divine knowledge) प्राप्त कर लिया था। इसलिए नारद, महर्षि सनत्कुमार के पास गए और उनकी मुखाकृति पर एक अपूर्व आनन्दमय शान्ति के दर्शन किया। उनकी आन्तरिक शान्ति (Inner peace) स्वच्छ जल की तरंगहीन झील के समान थी।
नारद ने सनत्कुमार को प्रणाम कर विनम्रता से कहा- ” कृपया मुझे शिष्य रूप में स्वीकार करें तथा मुझे ब्रह्मविद्या (Knowledge of Brahman) का ज्ञान दें।”
सनत्कुमार, ऋषि नारद की विनम्रता से प्रभावित हुए और कहा- “मैं बहुत प्रसन्न हूँ कि आप ब्रह्मज्ञान प्राप्त्यर्थ आए हैं, किन्तु उपदेश देने के पूर्व मैं यह जानना चाहूँगा कि आपने क्या-क्या ज्ञान प्राप्त किया है ताकि मैं आगे बढ़ सकूँ।”
नारद ने कहा- “भगवन्! मैंने ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद का अध्ययन किया है तथा इतिहास और प्राच्य विद्या का ज्ञान प्राप्त किया है, जो पंचम वेद (Fifth Veda) के नाम से जाना जाता है। मैंने कर्मकाण्ड (Rituals) का अध्ययन किया है जिससे पितृगण संतुष्ट होते हैं। मुझे गणित, फलित ज्योतिष, अर्थशास्त्र, तर्कशास्त्र, नीतिशास्त्र, दर्शन शास्त्र, तत्त्व मीमांसा, भौतिकी तथा तक्षण विद्या का पूरा ज्ञान है।
ललित कलाओं में भी मेरी गहरी पैठ है। इन सभी विषयों का मैंने अध्ययन किया है किन्तु मैं समझता हूँ कि मैं अब तक केवल ज्ञान-पिपासु ही हूँ। मुझे आत्मा का कोई ज्ञान नहीं है। मैंने बहुत लोगों के मुख से आपकी उदात्त उक्ति को सुना है कि आत्मज्ञानी (Knower of the Self) दुःख को पार कर लेता है। मुझे खेद है कि इतना अध्ययन करने के बाद भी मुझे शांति नहीं मिली। हे महानुभाव, मुझे विश्वास है कि इस अशांति के सागर से आप मुझे अवश्य पार लगा देंगे।”
ज्ञान की क्रमिक श्रेणियाँ (Hierarchical Stages of Knowledge)
का महर्षि सनत्कुमार ने नारद का प्रश्न सुनकर उन्हें ज्ञान की श्रेणियों के बारे में बताया। सनत्कुमार ने कहा, “जो कुछ आपने अध्ययन किया है, वह अति विशाल है। किन्तु वह केवल नाम है, फिर भी नाम का अपना महत्त्व है। जो नाम की उपासना करता है वह नाम प्रभाव के सीमित क्षेत्र में मनवांछित कार्य प्राप्त करता है।”
नारद ने आश्चर्य से पूछा- “महानुभाव क्या नाम से बढ़कर भी कोई वस्तु है?”
सनत्कुमार ने उत्तर दिया- “वाणी (Speech) निश्चय ही नाम से श्रेष्ठतर है। पृथ्वी और उसके परे जो कुछ भी विद्यमान है, उसे हम वाणी के द्वारा ही समझ सकते हैं। सारे ज्ञान की अभिव्यक्ति वाणी द्वारा ही होती है। इसी के माध्यम से हम गुण-दोष, सत्य-असत्य, अच्छे-बुरे की पहचान कर पाते हैं। यदि वाणी नहीं होती तो किसी भी प्रकार की अभिव्यंजना व सम्प्रेषण (Communication) नहीं होता। इसलिए नारद, वाणी की उपासना करो। वाणी से ही सब कुछ ज्ञात होता है। अतः वाणी की अभ्यर्थना करो।”
नारद ने बड़ी तन्मयता के साथ, एकाग्रचित्त होकर सुनते हुए जिज्ञासा की- “महामहिम, वाणी से भी आगे कुछ है क्या?”
ऋषि सनत्कुमार ने कहा- “हाँ, मन (Mind), वाणी से महत्तर है। यह मन ही निरंतर संकल्प (Resolution/Will) करता रहता है। मन द्वारा तुम पवित्र मंत्रों को सीख सकते हो। अच्छे कार्य कर सकते हो। संतति और सम्पत्ति की कामना कर सकते हो। इसके अतिरिक्त इहलोक (This world) और परलोक (Other world) सुधारने की इच्छा कर सकते हो। वस्तुतः आत्मा ही मन है और वास्तव में मन ही ब्रह्म है। जो व्यक्ति मन की उपासना करता है वह मन की सीमाओं में स्थित, असीम स्वाधीनता का उपभोग कर सकता है।”
नारद ने सनत्कुमार से फिर पूछा- “श्रद्धेय ऋषिवर, क्या मन से परे कोई वस्तु है?”
सनत्कुमार ने नारद को बताया- “संकल्प (Will/Intention) मन से श्रेष्ठ है। जो संकल्प की उपासना ब्रह्म के रूप में करता है वह जो कुछ भी चाहता है उसे प्राप्त कर लेता है। संकल्प क्षेत्र के अंतर्गत वह सभी कार्य करने के लिए स्वतंत्र है।”
नारद ने फिर पूछा- “क्या संकल्प से भी बढ़कर कोई वस्तु है?”
सनत्कुमार ने बतलाया-“संकल्प से उच्चतर चित्त (Consciousness) अथवा बुद्धि (Intellect) है।”
इस प्रकार नारद और सनत्कुमार के बीच बृहत् संवाद चलता रहा। एक विचार के साथ तत् विषयक दूसरे विचार क्रमानुसार तार्किक उपक्रम से उद्धृत होते रहे।
इसी प्रकार बुद्धि (Intellect), ध्यान (Meditation), विज्ञान (Knowledge/Science), बल (Strength), अन्न (Food), जल (Water), तेज (Heat/Energy), आकाश (Space), स्मरण (Memory), आशा (Hope), प्राण (Vital Force/Life Energy), सत्य (Truth), मति (Understanding), श्रद्धा (Faith), निष्ठा (Steadfastness), कृति (Action) और सुख (Happiness) आदि पर परिचर्चा हुई।
नारद, सनत्कुमार के विशाल पाण्डित्य (Scholarship) पर मुग्ध हो गए। उनका ज्ञान ग्रंथों के संग्रह से नहीं लिया गया था अपितु उनके आध्यात्मिक अनुभव (Spiritual experience) से सम्भूत हुआ था।
भूमा: असीम सुख का स्वरूप (Bhuma: The Nature of Infinite Bliss)
अन्ततः नारद ने सनत्कुमार से पूछा- “क्या कोई वस्तु ऐसी है जो सुख से भी उच्चतर है?”
सनत्कुमार ने कहा- “सुख से परे भूमा (The Infinite) है, जो असीम है वही भूमा है। निश्चित ही भूमा में ही सुख है, अल्पता (The Finite/Limitation) में कुछ भी सुख नहीं है। इसलिए असीम में ही सुख है। भूमा को आत्म-साक्षात्कार के माध्यम से ही जाना जा सकता है। भूमा को पूर्णतया आत्मसात (Internalize) करना चाहिए।”
यह सुनकर नारद आनन्द से पुलकित हो उठे। वे जानना चाहते थे कि इस भूमा का आधार या नींव कहाँ है। उनकी जिज्ञासा का समाधान करते हुए सनत्कुमार ने कहा- “भूमा सांसारिक महानता नहीं है, जहाँ सब कुछ एक दूसरे पर अवलंबित है। वह सचमुच नीचे, ऊपर, पश्चिम, पूरब, दक्षिण और उत्तर या सर्वत्र है। यह वास्तव में अखिल विश्व है। सर्वव्यापक (Omnipresent) है। यह मेरा अहं, अथवा अहंता है, या आत्म-अनुभूति (Self-realization) है। यह अहं जो प्रत्येक व्यक्ति की अनुभूति है, वही भूमा है।”
आत्म-साक्षात्कार और परम मुक्ति (Self-Knowledge and Ultimate Liberation)
ऋषि सनत्कुमार का उत्तर सुनकर नारद के मुख-मण्डल पर एक प्रदीप्त सौम्यता व्याप्त हो गई। महर्षि नारद की समस्त जिज्ञासाएँ शांत हो गई थीं। अब सनत्कुमार ने नारद को ब्रह्म संबंधी आध्यात्मिक ज्ञान देना आरम्भ किया, जिसे जानने के बाद कुछ भी जानना शेष नहीं रहता।
सनत्कुमार ने कहा- “आत्मा ही ऊपर है, आत्मा ही पीछे है, आत्मा ही सामने है, आत्मा दक्षिण में है, आत्मा ही उत्तर में है, जो इस प्रकार देखता है, उसे आत्मा में सुख मिलता है, उसे आत्मा में आनन्द मिलता है, वह आत्मा में घुल मिल जाता है, परमानन्द (Supreme Bliss) को प्राप्त करता है, जो आत्मा में रहता है वह स्वाधिपति (Sovereign/Master of oneself) है, सम्राट है, जो इससे भिन्न हैं उन पर अन्य लोग शासन करते हैं। वे पराधीन हैं, वे क्षण भंगुर दुनिया में निवास करते हैं। जो कुछ भी विश्व में उद्भूत है वह ब्रह्म से ही प्रसूत है।”
इस दृष्टिकोण को और स्पष्ट करते हुए सनत्कुमार ने कहा — “जो आत्मा को देखता है वह मृत्यु, व्याधि (Disease) और दुख को नहीं देखता। जो इसे देख लेता है वह सब कुछ देख लेता है। सर्वकाल के लिए सब कुछ प्राप्त कर लेता है। वह एक होते हुए भी अनन्त का अनुभव करता है। यही आत्म-साक्षात्कार है। “
सनत्कुमार ने नारद को अन्तिम उपदेश देते हुए कहा- “जब आहार शुद्ध होता है तब चित्त (Mind/Consciousness) और उच्च बोध उदात्त और विमल होता है, स्मृति ध्रुव हो जाती है तब हृदय की जटिल ग्रंथियाँ (Knot of the heart/Ignorance) सुलझ कर संपूर्ण मुक्ति (Absolute Liberation) प्राप्त हो जाती है।”
इस प्रकार सनत्कुमार ने पंडित एवं जिज्ञासु नारद को अज्ञान के घोर तमस सागर (Ocean of darkness/Ignorance) से पार कर मुक्ति आनन्द एवं प्रबोध के प्रकाश रूपी किनारे पर पहुँचा दिया। सनत्कुमार को ठीक ही ” स्कंद ” (Skanda) कहा गया है, वे प्रज्ञावान विशिष्ट गुरु हैं। उनके उपदेश आज भी उतने ही सार्थक हैं, जितने महर्षि नारद के लिये थे। आध्यात्मिक जिज्ञासुओं के हृदय को प्रकाशित करने के लिए वे प्रज्ञा-प्रदीप्त दीपक हैं।
निष्कर्ष (Conclusion)
छान्दोग्य उपनिषद् के सप्तम अध्याय पर आधारित इस अमर उपनिषदिक आलेख का निष्कर्ष यह है कि केवल शास्त्र मनुष्य को विद्वान (Scholar) तो बना सकते हैं, परन्तु वे मन को पूर्ण शांति और शाश्वत आनंद प्रदान नहीं कर सकते। भौतिक और लौकिक ज्ञान ‘अल्प’ (Finite) है, और जो सीमित है, उसमें वास्तविक या स्थायी सुख नहीं है; वह केवल क्षणिक संतोष दे सकता है।
सच्चा और असीम सुख केवल ‘भूमा’ (The Infinite / असीम ब्रह्म) में है, जो सर्वव्यापक (Omnipresent) है और मनुष्य की अपनी अंतरात्मा का ही वास्तविक स्वरूप है। इसे आत्म-साक्षात्कार से ही जाना जा सकता है, किसी अन्य माध्यम से नहीं। जब मनुष्य बाह्य जगत से ध्यान हटाकर आत्मज्ञान (Self-knowledge) प्राप्त करता है, तब उसके हृदय की अज्ञान रूपी जटिल ग्रंथियाँ पूरी तरह सुलझ जाती हैं।
इस परम पद को प्राप्त करने के लिए आहार और विचार की शुद्धि अनिवार्य शर्त है। आत्म-साक्षात्कार (Self-realization) ही वह एकमात्र मार्ग है जो मनुष्य को मृत्यु, व्याधि, शोक और सांसारिक पराधीनता से मुक्त करके सच्चे अर्थों में ‘स्वाधिपति’ (अपना स्वयं का सम्राट) बनाता है।
प्रस्तुति- डॉ. मोहनलाल गुप्ता
डॉ. मोहनलाल गुप्ता राजस्थान साहित्य अकादमी की सरस्वती सभा के सदस्य रहे हैं।
