तमिल मंदिर वास्तुकला : इतिहास एवं सांस्कृतिक महत्व mohanlalgupta.com

तमिल मंदिर वास्तुकला : इतिहास एवं सांस्कृतिक महत्व

तमिल मंदिर वास्तुकला का इतिहास और उसका सांस्कृतिक महत्व एक दूसरे के पूरक हैं। तमिल मंदिर वास्तुकला में दक्षिण की पूरी संस्कृति समाई हुई है।

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तमिल मंदिर वास्तुकला का उद्भव (Emergence of Tamil Temple Architecture)

तमिल मंदिर वास्तुकला का इतिहास और उसका सांस्कृतिक महत्व एक दूसरे के पूरक हैं। तमिल मंदिर वास्तुकला में दक्षिण की पूरी संस्कृति समाई हुई है।

मंदिर को तमिल में ‘आलयम्’, ‘कोविल’ या ‘कोयिल’ कहते हैं। तमिलों के सामाजिक जीवन में धर्म का महत्त्व सर्वस्वीकृत बात है। प्रारम्भिक काल से ही यह प्रदेश धार्मिक भावना का मुख्य केन्द्र रहा है। तमिलों के नितप्रति जीवन में धर्म की आस्था देखी जा सकती है। जबसे इस प्रदेश में हिन्दू धर्म के ब्राह्मणवाद का प्रभाव देखा गया तबसे यहाँ धर्म का प्रबल प्रभाव देखा गया। हिन्दू ब्राह्मणवाद के इस प्रभाव के परिणामस्वरूप पुरोहितों एवं पुजारियों का सामाजिक जीवन में महत्त्व बढ़ने लगा।

इसे हम ढाई हज़ार वर्ष पूर्व के अर्थात् संगम युगीन समाज (Sangam Period) से ही महसूस करने लगते हैं। मगर चूँकि संगम साहित्य मानव एवं मानवता का लौकिक साहित्य, ‘सेक्यूलर’ (Secular) रहा अतः धर्म का महत्त्व उस युग के समाज में उतना प्रबल नहीं माना जाता। जनता में सामान्य रूप से धार्मिक चेतना पायी गयी। मानवता ही उनका धर्म रहा। रस्म-रिवाजों और धर्म-कर्म के प्रति जनता की उतनी आस्था नहीं देखी गयी जो परवर्ती भक्ति युग में परिलक्षित हुई। इस पृष्ठभूमि ने आगे चलकर तमिल मंदिर वास्तुकला के विकास के लिए एक सुदृढ़ आधार तैयार किया।

संगमकालीन धार्मिक आस्थाएँ और प्रारंभिक रूप (Religious Beliefs and Early Forms of the Sangam Period)

संगम काल (ई. पू. 500-300 ई.) में धर्म का सामान्य रूप तीन प्रकार से पाया गया:

  • (i) स्थानीय ग्रामीण देवी-देवताओं की पूजा-उपासना का सामान्य रूप।
  • (ii) हिन्दू पौराणिक देवताओं की उपासना।
  • (iii) गैर-हिन्दू धार्मिक विश्वास, आस्था तथा तदनुकूल अनेक कार्य।

ये तीनों समानान्तर तथा एक-साथ संगमकाल में धर्म के रूप में प्रचलित धार्मिक आस्था मानी जाती थी।

आदिकालीन तमिल लोग “टोटम” (Totem) या गणचिह्नों पर विश्वास प्रकट करते थे। इस प्रकार की प्रथा प्राचीन मिस्र देश के निवासियों में भी पायी जाती थी। अपने पुरखों या पूर्वजों की पूजा, टोटमिक उपासना दोनों आदिवासियों एवं ग्रामीणों के मध्य प्रचलित उपासना-पद्धति रही। यह आस्था या विश्वास ढाई हजार वर्ष पूर्व के संगम काल से भी बहुत पहले की बात है।

परवर्ती काल में आदिवासी तमिल लोग प्रकृति में विश्वास करते हुए पेड़ों, गुफाओं और प्रस्तर खण्डों (Stone Blocks) की पूजा करते थे। उनका विश्वास था कि पेड़ों में भगवान निवास करते हैं। फिर नागदेवता की पूजा प्रचलित रही। पुनर्जन्म (Reincarnation) पर विश्वास तथा स्वर्ग और नरक की कल्पना प्रचलित रही। वृक्ष-पूजा, प्रस्तर खण्ड की पूजा, जल पूजा, जानवरों की पूजा तत्पश्चात् सूर्य, चन्द्र और नक्षत्रों की पूजा का रूप पाया गया।

प्राचीन आदिवासी कुनबे के लोग जन्म की अपेक्षा मृत्यु के बारे में अधिक जानकारी रखते थे। उन्हें मृत्यु का भय सताता रहता था। पूर्वजन्म पर विश्वास, मरे हुए वीर पुरुष की पूजा, पत्थर की पूजा [तमिल में ‘नडुकल’] आदि बातें मृत्यु से संबन्धित विचार ही तो हैं। उनका विश्वास था कि हर मरे हुए व्यक्ति का पुनर्जन्म अवश्य होता है। इस प्रकार पुराकाल से ही तमिलों के मन में पुनर्जन्म का विश्वास घर कर गया।

संभवतः द्रविड़ लोगों के यहाँ आगमन का प्रभाव परवर्ती युग में उन पर पड़ा और यह प्रभाव आर्यों पर भी पड़ा होगा। वट-वृक्ष की पूजा-उपासना में उनकी बड़ी आस्था देखी गयी। अतः अमुक वृक्ष का संबन्ध अमुक देवता से जोड़ा गया। परवर्ती काल में जब तमिल मंदिर वास्तुकला और मंदिर संस्कृति का विकास होने लगा तब हर मंदिर में एक ‘स्थल वृक्ष’ (Sacred Tree) की पूजा-उपासना की पद्धति भी प्रचलित होने लगी।

पौराणिक देवताओं का समावेशन और तमिल मंदिर वास्तुकला (Inclusion of Mythological Deities and Tamil Temple Architecture)

‘तोलकाप्पियम्’ लक्षण ग्रंथ में, ‘कडवुळ’ शब्द पाया जाता है जिसका अर्थ है जो मनसा, वाचा, कर्मणा से भी बढ़कर श्रेष्ठ है। यह ईश्वर-विश्वास संबन्धी हमारा प्रगतिशील विचार माना जाता है। यह उपनिषद के ‘ब्रह्मन्’ शब्द से तुलनीय है। आगे तोलकाप्पियम् ग्रंथ स्थानीय देवताओं जैसे ‘मायोन्’ (तिरुमाल = विष्णु), ‘सेयोन्’ (मुरुगन), वेन्दन् (इन्द्र) और वरुणन् (वरुण देवता) का वर्णन करता है।

गोपालक लोग (तमिल में आयर लोग) मायोन् की उपासना करते थे जबकि आखेटक लोग सेयोन् की तथा कृषक लोग इन्द्र देवता तथा मछुआरे लोग (तमिल में भरतवर) वरुण देवता की पूजा करते थे। इन विभिन्न देवताओं के उत्सवों का भी उल्लेख पाया जाता है। ‘कोट्रेवै’- कालीदेवी भयंकरता का प्रतिरूप माना गया। युद्ध में जाने के पूर्व कोट्रेवै देवी की पूजा होती थी। इस सबके साथ सूर्योपासना एवं चन्द्रोपासना की प्रथा भी प्रचलित थी। ऐसा विश्वास है कि पुराकालीन द्रविड़ लोग सूर्योपासक थे।

साहित्य में शिवजी, मुरुगन, तिरुमाल, बलरामन् तथा इन्द्र देवता की उपासना का उल्लेख मिलता है। तमिल लोग विशेष रूप से मुरुगन की पूजा उपासना में अभिरुचि प्रकट करते थे। उल्लेखनीय है मुरुगन मंदिरों के नाम भी प्राप्त होते हैं – “तिरुप्परंकुन्द्रम्”, “तिरुचेन्दूर”, “पलनी”, “तिरुवेरकम” “पलमुरिर चोले” आदि। तमिलों का विश्वास है कि मुरुगन पर्वतवासी है, अतः समस्त मुरुगन मंदिर पहाड़ियों के ऊपर स्थित हैं।

मुरुगन के हाथ में ‘दंड’ होता है। परवर्ती युग में इन तमिल देवताओं के साथ आर्य-देवता भी मिल गये। उनका संस्कृत नामकरण हो गया जैसे मुरुगन कार्तिकेय हो गया, तिरुमाल विष्णु में परिवर्तित हुआ, कोट्रेवै काली पार्वती-उमादेवी बन गयीं। इन देव-स्वरूपों के स्थायित्व के लिए तमिल मंदिर वास्तुकला के प्रारंभिक ढांचों की आवश्यकता महसूस हुई।

मंदिर निर्माण के प्रारंभिक साहित्यिक एवं दार्शनिक प्रमाण (Early Literary and Philosophical Evidence of Temple Construction)

कालांतर में मंदिर निर्माण का कार्य प्रारंभ हुआ। तमिल में मंदिर के लिए ‘नगर’, ‘कोट्टम्’ ‘कोविल’, ‘अम्बलम्’ आदि अनेक शब्द प्रचलित हैं। वटवृक्ष के नीचे ध्यानमग्न मुद्रा में स्थित शिवजी का रूप “दक्षिणामूर्ति” (Dakshinamurthy) कहलाया। दक्षिणामूर्ति की उपासना एवं अवधारणा केवल द्रविड़ों में दक्षिण भारत में ही पायी जाती है। उत्तर भारत में शिवजी की दक्षिणामूर्ति की अवधारणा प्राप्त नहीं होती। तमिल में दक्षिणामूर्ति को ‘आलमर देवता’ (वटवृक्ष के नीचे शिवजी) मानते हैं। ‘मणिमेखलै’ प्रबन्ध-काव्य में इन्द्र देवता एवं इन्द्रोत्सव का वर्णन प्राप्त होता है। ‘शिल्प्पदिकारम्’ ग्रंथ में इन मंदिरों का पूरा वर्णन मिलता है। ब्राह्मण लोग अग्निदेवता की पूजा करते थे। ‘पेरिप्लूस’ ग्रंथ में इस बात का उल्लेख प्राप्त होता है कि कन्या कुमारी में देवी कन्याकुमारी का पवित्र सागर जल सारे पापों को धो डालने की शक्ति रखता है।

संगम-काल के अंतिम चरण तक आते-आते तमिल प्रदेश में शैव धर्म और कौमार (कार्तिकेय) धर्म पूर्ण रूप से स्थापित हो चुका था। तमिल लोग मूलरूप से शिवोपासक ही थे। यहाँ लिंग पूजा-लिंगोपासना मान्य प्रथा थी। आर्य लोग प्राचीन काल में लिंगोपासना के समर्थक नहीं थे। उनमें लिंगपूजा या लिंगोपासना वर्जित प्रथा थी। आर्य लोग लिंग को शिश्नदेवता मानकर उसकी उपेक्षा करते थे, दुत्कारते भी थे।

परवर्ती काल में द्रविड़ों का यह प्राचीन देवता आर्य देवता के रूप में स्वीकृत हो गया। शिवोपासना के बाद विष्णु की उपासना भी प्रचलित होने लगी। तमिल प्रदेश में आगम शास्त्र (Agama Shastra) का निर्माण हुआ। ई० सन् आठवीं-नौवीं शताब्दी में मंदिरों के देवी-देवताओं का पूजा-विधान, उपासना पद्धति, मूर्ति गढ़ने की पद्धति संबन्धी शास्त्र बने, जिन्होंने तमिल मंदिर वास्तुकला को शास्त्रीय नियम प्रदान किए।

हिन्दू धर्मशास्त्र के ये विधि विधान तथा आगम शास्त्र की पद्धति दोनों एक दूसरे के पूरक ही हैं, विरोधी नहीं। केवल श्रमण एवं बौद्ध धर्म को यहाँ हिन्दू लोग वेद विरोधी एवं निरीश्वरवादी धर्म के रूप में मानने लगे। ये दोनों ही धर्म नास्तिक धर्म माने गए। ध्यान देने की बात है कि श्रमण एवं बौद्ध संन्यासी दोनों लगभग तीन सहस्र वर्ष पूर्व ही उत्तर भारत से दक्षिण भारत-तमिल प्रदेश आ पहुँचे थे।

उत्सव, सामाजिक ताना-बाना और तमिल मंदिर वास्तुकला (Festivals, Social Fabric and Tamil Temple Architecture)

भारत में सभी धर्म-सम्प्रदायों में उत्सवों, एवं वार्थिकोत्सवों आदि का बड़ा महत्त्व माना गया है। छोटे बड़े मंदिरों में प्रतिवर्ष कोई-न-कोई उत्सव चलता ही रहता है। मध्ययुग तक आते आते तमिल लोग उत्सव धर्मी हो चले थे। तमिल में उत्सव को ‘विळा’ कहते हैं। मंदिरों का वार्षिकोत्सव बड़े धूमधाम से कुछ दिन तक चलता है। वार्षिकोत्सव को वे “ब्रह्मोत्सवम्” (Brahmotsavam) कहते हैं।

मदुरै मीनाक्षी मंदिर में चैत्र मास में लगातार दस दिन तक “चैत्रोत्सवम्” अर्थात् ब्रह्मोत्सवम् चलता है। उस अवसर पर देवी मीनाक्षी और सुन्दरेश्वर (शिव) का विवाह-महोत्सव बड़े पैमाने पर चलता है। इसे देखने के लिए आसपास के देहातों से ग्रामीण लोग बड़ी संख्या में मदुरै महानगर जी में जमा हो जाते हैं। सारा नगर उत्सव के परिवेश में परिणत हो जाता है। यह भव्य तथा बड़ा मनमोहक दृश्य लगता है। विदेशी यात्री भी इसे देखने के लिए पहुँच जाते हैं। इस तरह के आयोजनों के लिए तमिल मंदिर वास्तुकला में बड़े प्रांगणों और मंडपों का विशेष स्थान रखा गया।

संगमकालीन रचनाओं में मंदिरों के इन सब धार्मिक उत्सवों का अच्छा चित्रण प्राप्त होता है। इन रचनाओं में व्रतों, पर्वों, उपवासों का भी उल्लेख प्राप्त होता है। व्रत को तमिल में ‘नोन्बु’ कहते हैं। प्राचीन तमिल लोगों का यह बड़ा विश्वास था कि भगवान खंभों में भी वास करते हैं। इसी विश्वास पर आधारित प्रचलित पौराणिक कथा है कि भगवान नृसिंह प्रकट हुए और प्रह्लाद को दर्शन दिये।

तमिल में यह उक्ति प्रचलित है कि “कडवुळतुणिन्मुम इरुप्पार नुरुम्बिलुम इरुप्पार”, मतलब ईश्वर खंभे में भी वास करते हैं और तृण में भी। तमिल लोगों में यह उक्ति बहुप्रचलित है कि “कोयिल् इल्ला ऊरिल कुडि इरुक्कवेण्डाम्” अर्थात् जहाँ मंदिर नहीं वहाँ निवास न करें।

मध्ययुगीन मंदिरों के सामाजिक और आर्थिक सरोकार (Social and Economic Concerns of Medieval Temples)

धर्म के साथ-साथ कला के संदर्भ में भी मध्ययुग के मंदिरों का महत्त्व माना जाता है। पल्लव काल के पूर्व उनका वह रूप नहीं था जो मध्ययुग के मंदिरों का माना गया। मध्ययुग में उनकी शान और गौरवगरिमा पराकाष्ठा को पहुँच गयी थी। मध्ययुग में यूरोप में चर्च का जो महत्त्व माना गया उसी प्रकार तमिलनाडु के इतिहास में मंदिरों का सामाजिक जीवन में महत्त्वपूर्ण स्थान सर्वस्वीकृत है।

मंदिरों का आर्थिक कार्यकलाप (Economic Activity) भी जानने योग्य विषय है। मध्ययुग में तीन दृष्टियों से मंदिरों का महत्त्व स्वीकृत है अर्थात् धार्मिक दृष्टि से, कलात्मक सौन्दर्य की दृष्टि से तथा सामाजिक आर्थिक संबन्धों की दृष्टि से, इस प्रकार नैतिक, आध्यात्मिक, सौन्दर्यशास्त्र तथा उपयोगिता की दृष्टि से। तमिल मंदिर वास्तुकला की भव्यता इन आर्थिक गतिविधियों से भी पोषित होती थी।

तमिल प्रदेश के मंदिरों की अपनी प्रार्थना-पूजा-उपासना की पद्धति है और विधि-विधान भी है। मंदिर-निर्माण कला, शिल्पकला, मूर्तिगढ़ने की कला, चित्रकला, संगीत, नृत्य, नाटक आदि अनेक कलायें मंदिर के परिसरों एवं प्रांगणों में प्रचलित होने से मंदिरों की उपयोगिता एवं उनका महत्त्व भी बढ़ गया। उसके अनेक प्रकार के लौकिक कार्यकलाप भी होते हैं।

अनेक प्रकार की सेवाओं के निमित्त अनेक प्रकार के व्यक्तियों की नियुक्तियाँ होती थीं- आर्थिक कारोबार की उसकी छोटी सी भूमिका में हिसाब-किताब रखना, कर-वसूली, आमसभाओं की व्यवस्था, स्कूल चलाना, चिकित्सा की व्यवस्था, गरीबों-भूखों को अन्नदान देने की व्यवस्था, कभी कभार न्याय करने की सभा आदि बहुविध लौकिक कार्यकलापों के निमित्त मंदिर का उपयोग किया था।

राजा-महाराजा, धनी वणिक लोग इन मंदिरों के संरक्षक एवं पोषक होते थे जो मंदिरों की समुचित व्यवस्था के निमित्त धन दान के रूप में देकर अपना योगदान देते थे। अतः मंदिर को केवल पूजा-प्रार्थना मात्र का पुनीत स्थल समझना सही नहीं होगा। वह एक जटिल सामाजिक, धार्मिक एवं आर्थिक संस्था मानी जाती है। ऐतिहासिक दृष्टि से उसे समझना, सही परिप्रेक्ष्य में उसके महत्त्व को और उसके गौरव को आँकना उचित होगा।

राजवंशों का योगदान और तमिल मंदिर वास्तुकला का विकास (Contribution of Dynasties and Development of Tamil Temple Architecture)

पल्लवों के शासन काल के उपरान्त नौवीं शताब्दी के पश्चात् मंदिरों का विशेष निर्माण कार्य प्रारंभ होता है। चोल राजवंश (Chola Dynasty) के युग में मंदिर निर्माण कार्य विशेष रूप से बढ़ता गया। इसी भाँति पांड्य राजाओं के काल में भी उसका विस्तार हुआ। अनेक अवसरों पर हुए युद्धों में विजेता राजा विजित राजा से पर्याप्त मात्रा में सोना, चाँदी, हीरे जवाहरात धन आदि प्राप्त करते थे।

यह सारा धन राजमहल के कोषागार (Treasury) में जमा हो जाता था। यह सारा धन आर्थिक दृष्टि से गरीबों की गरीबी मिटाने के निमित्त खर्च नहीं हुआ अथवा आम जनता के जीवन-स्तर को ऊँचा उठाने के निमित्त खर्च नहीं किया गया। ऐसे विचार उस युग के राजा-महाराजाओं के मन में उठे ही नहीं, युद्ध में प्राप्त लूट की संपत्ति राजकोष में जमा हो जाती थी और वह राजा की निजी संपत्ति मानी जाती थी।

उसका उपयोग राजपरिवार के लोग, सेना के अधिपति, सभासद तत्पश्चात् कविगण एवं मंदिरों में बाँटने में होता था। कभी-कभी आम जनता के लिए भी थोड़ी-सी व्यवस्था की जाती थी। इस प्रचुर धन-संपदा ने तमिल मंदिर वास्तुकला के वैभव को सातवें आसमान पर पहुँचा दिया।

इस प्रकार राजकोष में जो अपार संपत्ति थी उसका अधिकांश उपयोग मंदिर-निर्माण के कार्यों में किया जाता था। गरीबी मिटाने का विचार उन शासकों के मन में उठा ही नहीं। केवल दान धर्म कर्म करके वे तृप्त हो जाते थे। इस कारण समाज में गरीबी पूरी तरह से मिट नहीं सकी। केवल समय-समय पर गरीबों को कुछ राहत दी जाती थी, बस इतना ही। एक प्रकार से मध्ययुगीन वह समाज एक खैराती समाज के रूप में चालित होता था। राजाओं के पास गरीबी मिटाने तथा जनता के जीवन स्तर को ऊपर उठाने की कोई कारगर योजना नहीं थी।

अगर संपत्ति का उपयोग उत्पादक कार्यों में लगा दिया गया होता तो उसकी वृद्धि होती और जनता आर्थिक दृष्टि से संपन्न भी होती। मगर ऐसा हुआ नहीं। आम लोगों की धार्मिक मानसिकता तथा अधिकारी वर्ग के अधिकारों को मानकर चलने की मनोवृत्ति लोगों में बनी रहती थी। उसी के परिणामस्वरूप आर्थिक दृष्टि से समाज में अभाव बना रहा। अतिरिक्त धन का उपयोग सामान्य जनों के जीवन स्तर को ऊँचा उठाने के उद्देश्य से किया गया होता तो तमिलों का सामाजिक जीवन बेहतर बनता, मगर ऐसा हुआ नहीं। इस धन का प्रवाह मुख्य रूप से तमिल मंदिर वास्तुकला के ढांचों को सुदृढ़ करने में ही लगा रहा।

देवताओं के मंदिर राजा-महाराजाओं के राजमहलों की भांति माने जाते थे। राजमहल को तमिल में ‘कोयिल’ (मंदिर) भी कहा करते थे। मंदिर के देवता को जिस प्रकार श्रद्धा-सम्मान की भावना से देखा जाता था और वही श्रद्धा के साथ उसकी सेवा की जाती थी उसी प्रकार के आदर-सम्मान एवं श्रद्धा भाव से राजा को मानने की मानसिकता बनी हुई थी। इस प्रकार ‘देवराज’ (God-King) की उपासना की परंपरा चालू हुई।

मंदिर के आंतरिक धार्मिक नियम और गर्भगृह की संरचना (Internal Religious Rules of the Temple and Structure of the Sanctum Sanctorum)

मध्यकाल में मंदिर की पूजा व्यक्तिगत रूप से होती थी। सामूहिक एवं सामुदायिक प्रार्थना की पद्धति यहाँ कभी प्रचलित नहीं थी। पुजारी अपना अलग कर्त्तव्य निभाता है, और प्रार्थना करनेवाले भक्त लोग अलग। पूजा करने के लिए पुजारी की सेवा चाहें तो ली जा सकती है, मगर वह कोई अनिवार्य शर्त नहीं। पुजारी के बिना भी भक्त भगवान की अर्चामूर्ति के सम्मुख भक्तिभाव से खड़े होकर प्रार्थना कर सकता है।

प्रमुख रूप से मंदिर आध्यात्मिक चिन्तन, याग-यज्ञ कर्म अथवा वैदिक वाद-विवाद या चर्चा का स्थान नहीं है, मगर ऐसा कार्य करने के लिए वहाँ कोई रोकथाम भी नहीं। भक्त का भगवान से सीधा संपर्क होता है। इस प्रकार भक्त और पुजारी एक दूसरे से स्वतंत्र हैं। ये आध्यात्मिक आयाम तमिल मंदिर वास्तुकला के स्थापत्य को प्रभावित करते थे।

मंदिर के मध्य भाग में, बीचों बीच गर्भगृह (Sanctum Sanctorum) बना रहता है जिसमें देवता की मूर्ति स्थापित रहती है। गर्भगृह के बाहर चारों ओर के गलियारे या मण्डप के चारों ओर भक्त लोग परिक्रमा (Circumambulation) करते हैं। मंदिर से बाहर आने पर मंदिर के गोपुर (प्रवेश द्वार) के बाहर खुले मैदान में दुकानें फैली रहती हैं जैसे शॉपिंग सेन्टर में देखा जाता है। मंदिर के अन्दर बड़े मण्डप में धार्मिक प्रवचन, पौराणिकों का कथावाचन, भजन मंडलियों का कार्यक्रम चलता है।

मंदिर का गोपुरम् प्रवेश द्वार होता है। वह बहुत विशाल एवं ऊँचा होता है। मंदिर के चारों ओर गोपुरम् बने रहते हैं। मदुरै आदि बड़े शहरों के गोपुरम् 200 फुट तक की ऊँचाई तक बने होते हैं। बड़ा हवादार एवं खुला हुआ अहाता होता है।

मदुरै मीनाक्षी मंदिर की एक रोचक और विशेष परंपरा है। मध्यकाल में यहाँ के राजा अपने को देवी मीनाक्षी का प्रतिनिधि मानकर राज्य का शासन करते थे। प्रतिदिन राजा मंदिर के अन्दर दर्शन के लिए आता, अपना राजदण्ड, तलवार दोनों को मीनाक्षी की भव्यमूर्ति के चरणकमलों में भक्तिभाव से रखकर देवी का आशीर्वाद पाने के उपरान्त ही देवी मीनाक्षी के नाम पर राज्य का संचालन करता था।

यह परंपरा युगों से चली आ रही थी। मदुरै के शासक तिरुमलै नायक के जमाने में भी यह प्रथा प्रचलित रही। मंदिर की हुंडी में जो धन जमा होता था उसका उपयोग मंदिर की व्यवस्था में तथा जनहित के कार्यों में लगाया जाता था। यह प्रथा, यह परंपरा आज तक निरंतर अटूट चली आ रही है।

तमिल प्रदेश के राजा-महाराजा जन-हितैषी, प्रजावत्सल एवं निरहंकारी शासक थे। तमिल इतिहास में कहीं भी निरंकुश राजा का उल्लेख प्राप्त नहीं होता। अतः यहाँ अत्याचारी, क्रूर शासक एवं निरंकुश राजा कोई नहीं रहा। इतिहास इस बात का साक्षी है।

मंदिर का समस्त कार्य आगम शास्त्र के विधि विधान पद्धति का अनुसरण करते चलते हैं। भक्त जनों का गर्भगृह के अन्दर प्रवेश मना है। गर्भगृह के बाहर ही खड़े होकर, दूर से ही दर्शन करने की परंपरा है। केवल पुजारी गर्भगृह के अन्दर प्रवेश कर सकता है। वही भगवान की स्थापित व अर्चामूर्ति को स्नापित कर सकता है, नये पोशाक से उसका अलंकार करता है, आभूषणों से उसे सजा सकता है, पुष्पमाला पहना सकता है और आरती उतार सकता है। मंदिर के शासन की व्यवस्था के निमित्त उच्चस्तरीय कमेटी बनी रहती है और उसके मार्गदर्शन में मंदिर के कार्य सुचारु रूप से चलते हैं।

देवदासी प्रथा और मंदिर केन्द्रित संस्कृति (Devadasi System and Temple Centered Culture)

मध्ययुग में मंदिरों में देवदासी प्रथा (Devadasi System) प्रचलित थी। वे भगवान की सेवा के निमित्त समर्पित कन्यायें, कुमारियाँ होती थीं। उन्हें देवकन्या के रूप में माना जाता था। वे नृत्य, गायन आदि ललित कलाओं (Fine Arts) में कुशल होती थीं। देवता की मूर्ति के सम्मुख उनका गायन, nartan आदि कार्यक्रम होते थे। मंदिर की अन्य प्रकार की सेवाओं के लिए भी उनकी सेवायें ली जाती थीं। जैसे कुएँ से पानी ले आना, फर्श पोंछना, रंगोली करना, पुष्प माला बनाना आदि अनेक प्रकार की सेवायें उनसे ली जाती थीं। कालान्तर में इस प्रथा में दोष आने लगे।

इतिहास कहता है कि इस प्रकार की देवदासी प्रथा सुमेर (Sumeria) में प्रचलित थी। द्रविड़ लोग जब वहाँ से चलकर इस प्रदेश में पहुँचे तो अपने साथ वहाँ की इस प्रथा को भी यहाँ प्रचलित किया था। मंदिर कभी कोई शरणालय (Sanctuary) नहीं माना जाता था जैसे पाश्चात्य चर्च में होता है। हिन्दू धर्म के अन्तर्गत समाज में मंदिर का प्रमुख स्थान बना रहा। तमिल संस्कृति मंदिर संस्कृति है। मंदिर केन्द्रित संस्कृति मानी जाती है। मंदिर अनार्य तथा अवैदिक (Non-Aryan and non-Vedic) संस्था मानी जाती है। द्रविड़ों की यह संस्कृति परवर्ती युगों में अन्य भागों में भी प्रचलित होने लगी। इस सांस्कृतिक चेतना का मूर्त रूप हमें तमिल मंदिर वास्तुकला में दिखाई देता है।

तमिल मंदिर वास्तुकला शैलियाँ (Styles of Tamil Temple Architecture)

ऐतिहासिक कालक्रम और शैलियों का वर्गीकरण (Evolutionary Timeline and Classification of Styles)

लगभग 1800 वर्षों का तमिल साहित्यिक प्रसंग, संदर्भ आदि हमें यहाँ के मंदिरों के बारे में बताता है। प्राचीन तमिल लोगों ने मंदिर निर्माण की व्यवस्था में विशेष ध्यान दिया था। ई० सन् 700 से लेकर ई० सन् 1600 तक के उनके धार्मिक कार्यों के संबन्ध में प्रमाण आज भी उपलब्ध होते हैं। जो मुख्य रूप से तमिल मंदिर वास्तुकला के क्रमिक विकास को दर्शाते हैं।

प्राचीन युग के पल्लवकालीन गुफा-मंदिरों (Cave Temples) को छोड़कर बाकी परवर्ती काल के मंदिर निर्माण आगम शास्त्र की पद्धति के अनुरूप ही निर्मित हैं। आगम शास्त्र के विधिविधान के अनुरूप निर्मित मंदिरों की बनावट लगभग एक समान है। फिर भी उनमें कुछ वैयक्तिकता और विशिष्टता परिलक्षित होती है। तीन प्रकार की कला प्रचलित थी।

एक उत्तर भारत की शैली (नागर शैली), दूसरी दक्षिणी (डेक्कन/वेसर) शैली और तीसरी दक्षिण भारतीय शैली जो तमिल लोगों की अपनी शैली मानी जाती है। इसे द्रविड़ वास्तुकला (Dravidian Architecture) मानते हैं। लगभग सातवीं शताब्दी में प्रारंभ होकर तेरहवीं-चौदहवीं शताब्दी तक यह प्रचलित रही और इसे विशुद्ध रूप से तमिल मंदिर वास्तुकला के रूप में पहचाना गया।

संगम साहित्य में (ई० पू० 500 से लेकर ई० सन् 200 तक का काल संगम युग कहलाता है) हमें मंदिर निर्माण संबन्धी अच्छी जानकारी मिलती है। उस युग में ईंट, गारे, चूना और लकड़ी से निर्मित मंदिर पाये जाते थे। उसके रूपाकार पर ही परवर्ती युग में प्रस्तर खण्डों से बने मंदिरों के नमूने मिलते हैं। इनमें शंख के आकार में बने गोपुरम् (प्रवेश द्वार) बड़े विशाल एवं ऊँचे होते थे।

गर्भगृह के ऊपरी भाग में गोलाकार गोपुरम् बना होता है। लकड़ी के बड़े-बड़े और ऊँचे रथ बने होते हैं। उत्सव, पर्व के अवसरों पर पंचधातुओं में बनी देव मूर्तियाँ उन रथों के बीच के मण्डप में स्थापित कर उन्हें मंदिर के बाहर की विशालकाय चौड़ी सड़कों पर चारों ओर शोभायात्रा (Procession) में ले जाते थे।

मंदिर का गोपुरम्, बाहरी प्रवेश द्वार को कहते हैं। बड़े विशाल एवं ऊँचे गोपुरम् बनाने की रीति प्रचलित थी। अनेक शताब्दियों पूर्व निर्मित तमिलनाडु के मंदिर आज भी शान से खड़े होकर अपनी गौरव गरिमा को प्रकट करते हैं। उनकी स्थिरता, मजबूती में आज तक कोई बाधा नहीं आयी। तमिलों की वास्तुकला कौशल को जानने-समझने के लिए इन विशालकाय गगनचुंबी मंदिरों का दर्शन करना आवश्यक होगा, जो तमिल मंदिर वास्तुकला के जीवंत गवाह हैं।

तमिल मंदिर वास्तुकला के विकास के प्रमुख सोपान (Major Stages of Development in Tamil Temple Architecture)

विगत चौहदा-पन्द्रह शताब्दियों में मंदिर-निर्माण की कला में तथा कौशल में पर्याप्त विकास एवं प्रगति परिलक्षित होती है। तमिल मंदिर वास्तुकला के विकासक्रम में हमें पाँच सोपान परिलक्षित होते हैं –

  • (1) पल्लव या पाण्ड्य राजाओं के शासन काल में निर्मित गुफा मंदिर जो सातवीं शताब्दी के हैं।
  • (2) पल्लवों एवं पाण्ड्य राजाओं के काल के संरचनात्मक इमारती मंदिर (Structural Temples)।
  • (3) एकल केन्द्रीय गोपुरम् के चोलकालीन प्रकार के मंदिर।
  • (4) पाण्ड्य राजाओं के शासनकाल के, अनेक प्रवेश द्वारों से युक्त गोपुरम् प्रकार के ऊँचे-ऊँचे मंदिर।
  • (5) आधुनिक शैली के विजयनगर शासकों की शैली के मंदिर।

इस बीच मंदिरों के निर्माण में सामान्य परिवर्तन हुए जो इतने महत्त्वपूर्ण नहीं हैं।

पल्लव काल से चोल काल तक पत्थरों का प्रयोग (Use of Stones from Pallava to Chola Period)

सातवीं शताब्दी के प्रारंभ से प्रमुख परिवर्तन लक्षित होता है। उसके रूपाकार तथा पद्धति में परिवर्तन लाये बिना यह परिवर्तन देखा गया। परिवर्तन इस प्रकार से रहा कि ईंट, गारा, चूना और लकड़ी की जगह पर प्रस्तर खण्ड (Stone Blocks) प्रयोग किये जाने लगे, जिसने तमिल मंदिर वास्तुकला को एक नया और स्थायी आयाम दिया। आठवीं और नौवीं शताब्दी से इस प्रकार के मंदिरों की बनावट में महत्त्वपूर्ण परिवर्तन परिलक्षित होते हैं।

सातवीं शताब्दी के महेन्द्र वर्मन् पल्लव शासक के ‘मण्डकम्-पट्टु शिलालेख’ (Mandagapattu Inscription) हमें बताते हैं कि गुफा मंदिर, इनके द्वारा ईंट गारे चूने लकड़ी या लोहे के बगैर बनाये गये शुद्ध प्रस्तर मंदिर हैं। अतः महेन्द्रवर्मन् को ‘विचित्र चित्तन्’ की उपाधि दी गयी। मंदिर निर्माण कला और कौशल में यह एक उल्लेखनीय परिवर्तन माना जायेगा।

एक ही वृहदाकार प्रस्तर खण्ड (Monolithic) के माध्यम से उनके पुत्र नरसिंह वर्मन् पल्लव (प्रथम) द्वारा, प्रस्तर के अनेक मंदिर निर्मित हुए। यह कला वातापी चालुक्यों को पहले से ही मालूम थी। अतः पल्लवों ने उस नयी कला का प्रयोग अपने यहाँ के मंदिरों के निर्माण के लिए किया था। एक शताब्दी के अन्दर ही पाण्ड्य राजाओं ने इसी शैली के गुफा मंदिर बनवाये थे। इस प्रकार मंदिर-निर्माण की कला में धीरे-धीरे परिवर्तन लक्षित हुए और इस प्रकार तमिल प्रदेश के कारीगरों का हस्तकौशल भवन निर्माण एवं मंदिर निर्माण कला में परिलक्षित होता है, जो तमिल मंदिर वास्तुकला की आधारशिला बना।

चोलकालीन वास्तुकला का चरमोत्कर्ष: तंजाऊर और गंगैकोण्ड चोलपुरम् (Climax of Chola Architecture: Thanjavur and Gangaikonda Cholapuram)

तंजाऊर का वृहदेश्वर मंदिर जिसे तमिल में तंजै पेरुउडैयार कोयिल कहते हैं वह तमिलों के मंदिर निर्माण के कला-कौशल का सर्वोत्तम नमूना पेश करता है और तमिल मंदिर वास्तुकला का उत्कृष्ट उदाहरण है। इतना विशालकाय कि आसमान के बादलों को भी चीरकर काटकर ऊँचा बढ़ता हो, ऐसा वृहदाकार मंदिर एवं गगनचुंबी गोपुरम् तमिलनाडु में आपको और कहीं देखने को नहीं मिलेगा। यह चोल चक्रवर्ती राजराज चोलन् (985-1014 ई.) के समय निर्मित हुआ। इस मंदिर के गर्भगृह का शिव-लिंग लगभग अठारह फुट ऊँचा है।

गर्भगृह के ठीक सामने बाहर के विशाल प्रांगण में एक वृहदाकार प्रस्तर खण्ड से बनी नन्दी की मूर्ति लेटी हुई अवस्था में अपनी भव्यता को प्रदर्शित करती हुई प्रतिष्ठित है जो दर्शकों का मुख्य आकर्षण है। गर्भगृह के मध्य भाग के ऊपरी हिस्से पर बने गोपुरम् (विमानम्) की ऊँचाई 200 फुट की है। संभवतः तमिलनाडु का यह सबसे ऊँचा और भव्य मंदिर माना जाता है।

इसी प्रकार का एक दूसरा भव्य एवं शानदार मंदिर गंगैकोण्ड चोलपुरम् में उनके पुत्र राजेन्द्र चोलन् ने निर्मित करवाया था। जो आज भी अपनी भव्यता, विशालता एवं कलात्मक सौन्दर्य को प्रदर्शित करता हुआ खड़ा है। तमिलनाडु की गौरव गरिमा उसके इस प्रकार के भव्य एवं वृहदाकार मंदिरों के कारण ही है। तमिल भूमि मंदिरों की भूमि है, तमिल संस्कृति मूलतः मंदिर केन्द्रित संस्कृति है और यहाँ की आत्मा तमिल मंदिर वास्तुकला में बसती है।

पाण्ड्य और विजयनगर काल की वास्तुकला (Architecture of Pandya and Vijayanagara Period)

मंदिर निर्माण-कला के विकास का अगला चरण प्रसिद्ध पाण्ड्य राजाओं के काल का माना जाता है। उनकी मंदिर-निर्माण कला की विशेषता इस बात में है कि मंदिर की चारों दिशाओं में ऊँचे-ऊँचे गोपुरम् बने होते है जो ऊँचे होने के साथ चौड़े और विशाल प्रवेश द्वार भी हैं। मदुरै के मीनाक्षी मंदिर तथा श्रीरंगम के श्रीरंगनाथ स्वामी के मंदिर में भी इसी प्रकार चारों दिशाओं में चार विशालकाय एवं ऊँचे प्रवेश द्वार (गोपुरम्) बने हुए मिलते हैं, जिस प्रकार मदुरै में प्राप्त हैं।

ये ऊँचे तथा विशालकाय भव्य गोपुरम् अपनी गंभीरता एवं कलात्मक सौन्दर्य को प्रदर्शित करते हैं और तमिल मंदिर वास्तुकला के इस काल की पहचान हैं। गर्भगृह के मण्डप के ऊपर ऊँचा ‘विमानम्’ बना हुआ होता है, जो स्वर्णपत्रों से मढ़ा हुआ होता है। चिदम्बरम् के नटराज मंदिर में भी इसी प्रकार की बनावट मिलती है।

मंदिर के अन्दर के विशाल प्रांगण में विशाल विस्तृत ऊँचे मण्डप बने होते है जिनका उपयोग अनेक प्रकार की धार्मिक कार्यों के लिए किया जाता है। विजयनगर शासकों के बाद नायक राजाओं ने मंदिर के विस्तार में तथा उनके पुनरुद्धार के कार्यों में विशेष अभिरुचि प्रदर्शित की। सहस्र खंभों का वृहदाकार विशाल मण्डप (1000 Pillared Hall) तथा ‘कल्याण मण्डपम्’ (Marriage Hall) इन मंदिरों की विशेषता मानी जाती है, जिसने तमिल मंदिर वास्तुकला को और अधिक भव्यता प्रदान की।

उस युग में मंदिर निर्माण के कार्यों ने अन्य अनेक प्रकार के अन्य निर्माण कार्यों की ओर कलाकारी का ध्यान आकर्षित किया। मदुरै का तिरुमलै नायक कर एवं तंजाऊर के मराठे शासकों द्वारा बनाया महल अद्भुत है। चैंजी, आर्काट, बन्दवासी, वेलूर नामक्कल, दिण्डुक्कल के किले और दुर्ग आज भी अपनी महत्ता को प्रदर्शित करते हुए शान से खड़े हैं।

निष्कर्ष: तमिल मंदिर वास्तुकला की कालजयी विरासत (Conclusion: The Timeless Legacy of Tamil Temple Architecture)

तमिलनाडु के मंदिरों के अद्भुत भित्तिचित्र (Frescoes), कलाकृतियाँ, मूर्तियाँ, अनागिनत शिलालेख (Inscriptions), ताम्रपट्ट (Copper Plates) हमें अद्भुत जानकारी और विवरण प्रदान करते हैं। इनमें रुचि रखने वालों के लिए ये मंदिर अद्भुत कोषागार हैं। भारत में ही नहीं, विश्वभर में ये मंदिर अपना सानी नहीं रखते। तमिल मंदिर वास्तुकला के ये बेजोड़ स्मारक वैश्विक धरोहर के रूप में प्रतिष्ठित हैं।

संक्षेप में, तमिल प्रदेश के मंदिरों के विकास क्रम के अध्ययन से यह स्पष्ट होता है कि यहाँ के जनजीवन और लोक संस्कृति से उनका अभिन्न संवर्धक संबन्ध है। आज के इस भौतिकतावादी एवं वैज्ञानिक युग में भी हमारे यहाँ के लोग अपने पूर्वजों द्वारा प्रवर्तित इस परंपरा का पालन करते आ रहे हैं, और तमिल मंदिर वास्तुकला की इस पावन धरोहर को अक्षुण्ण बनाए हुए हैं।

डॉ. मोहनलाल गुप्ता

आप इस आलेख को अंग्रेजी भाषा में भी पढ़ सकते हैं- Tamil Temple Architecture: History and Cultural Significance

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